Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

दोस्तों आज आपके लिए अपने इस ब्लॉग में लाएं है। एक सदाबहार कुमाउनी गीत मेरी दुर्गा हरे गे के बोल और वीडियो। यह गीत गाया है, उत्तराखंड के प्रसिद्ध गायक स्वर्गीय श्री पाल बाबू गोस्वामी जी ने। मेले पहले जमाने मे पहाड़ो में मेल मिलाप और खुशियां मनाने के प्रमुख साधन होते थे। पहले शिक्षा व संचार साधनों के अभाव में कई लोग मेलों में खो भी जाते थे। इसलिए लोगों के मन मे एक भय यह भी रहता था,कि मेलों में जाकर हम कही खो न जाये। स्वर्गीय श्री गोपाल बाबू जी ने जनता के इसी भय पर एक चुटीला…

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सोसती सिरी सरबोपमा – सिरीमान ठाकुर जसोतसिंह नेगी, गाँव प्रधान – कमस्यारी गाँव में, बड़े पटबाँगणवाला मकान, खुमानी के बोट के पास पता ऊपर लिखा, पोस्ट बेनीनाग, पासपत्न ठाकुर उन्हीं जसोतसिंह नेगी को जल्द-से-जल्द मिले – भेजने वाला, उनका बेटा रतनसिंह नेगी। हाल मुकाम – मिलीटर क्वाटर, देहरादून। पोस्ट-जिला -वही। कियरोफ फिप्टी सिक्स ऐ.पी.ओ. बटैलन नंबर-के-बी-2, थिरी-थिरी नायन। सिपोय नंबर भेजने वाले के पते में से कई शब्द कटे हुए थे। पाने वाला का पता इस तरह लिखा गया था कि केवल टिकट ही पते की लिखावट से बचे थे, जो लिफाफे पर जगह-जगह चिपकाए गए थे। पोस्टमैन ने हँसकर,…

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वर्षों पुरानी बात है जब आज ही की तरह बैसाख और जेठ के महीने हमारे उत्तराखंड में एक विशेष फल जो आज भी होता है ,जिसकी मात्रा अब चाहे कितनी भी न्यून हो चुकी हो। वह फल काफल के नाम से इन्ही दो महीनों के वर्चस्व में पककर के रक्तवर्ण से कुछ काले काले से रंग का अपनी डालियों में हो जाता था। उस पुराने समय में दो पंछी एक जो हमारा राज्यपक्षी मोनाल है और दूसरी चीणा नाम की चिड़िया उड़ उड़कर एक शोणितपुर नाम के गांव की ओर चली जाती थी, और अपनी मीठी मीठी बोली में गांव…

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उत्तराखंड के आभूषण – भारत की अन्य संस्कृतियों की तरह उत्तराखंड के पहाड़ी समाज की महिलाएं और बच्चे सजने सवरने के लिए पारम्परिक आभूषणों का प्रयोग करती हैं। उत्तराखंड के आभूषण आज अपनी एक अलग पहचान बना रहे हैं। इन्हे उत्तराखंड की महिलाएं ही नहीं बल्कि अन्य संस्कृतियों की महिलाएं भी बड़ी शौक से धारण करती हैं। सिर के आभूषण शिशफुल: यह फूल की तरह सिर पर रखा जाने वाला आभूषण हैं।  सुहागिन महिलाएं  गहना  जंजीर और हुक की सहायता से पहनती हैं। मांगटीका: यह महिलाओं के सुहाग का प्रतीक हैं। जंजीर से जुड़ा यह वृताकार आभूषण मांग से माथे…

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प्रस्तुत लेख में उत्तराखंड के देवी देवता  में उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल में पूजे जाने वाले लोक देवताओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी संकलित की है। यह जानकारी अच्छी लगे तो ,सोशल मीडिया बटनों का प्रयोग करके शेयर अवश्य करें। और किसी त्रुटि में सुझाव के लिए हमारे फेसबुक पेज देवभूमि दर्शन पर सन्देशभेज कर  हमे बता सकते हैं। आपके सकारात्मक सुझाओं का स्वागत है। उत्तराखंड के देवी देवता कठपुड़िया देवी: ये देवी कुमाऊं मंडल के पूर्वी शौका जनजाति द्धारा पथ रक्षिका देवी के रूप मे पूजित है। कठिन पहाड़ी रास्तों पर और विशेषकर दरों में इसकी स्थापना की जाती हैं। कंडारदेव:…

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चैत्र का महीना, हिन्दू धर्म के लोगो के लिए खास होता ही है, मगर यह महीना उत्तराखण्डी लोगों के लिए बेहद खास होता है। इस महीने में पहाड़ियों की जिंदगी बसंत की तरह खुशियों का आगमन होता है। होली, झोड़ा ,चाचरी की धूम होती है। बहिनों की भिटौली आती है। प्रकृति अपने सबसे बेहतरीन रूप में होती है। इधर कुमाऊं के द्वारहाट नगर में विषुवत संक्रांति (जिसे कुमाऊं में बिखोति त्यौहार के नाम से मनाते हैं)के दिन मेला लगता है। जिसे स्याल्दे बिखोति का मेला कहते हैं। प्रस्तुत गीत , ओ भिना कसीके जानू द्वारहाटा एक पारंपरिक और पुराना सदाबहार…

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गढ़ देवी या गड़देवी उत्तराखंड की प्रमुख देवी है। यह देवी सम्पूर्ण उत्तराखंड में नाथपंथी देवताओं के साथ अलग अलग रूप में पूजी जाती है। इन्हे सभी देवताओं की धर्म बहिन माना जाता है। कई लोग बताते हैं कि , भगवान गोरिया के साथ ये अन्यारी देवी के रूप में पूजी जाती हैं। इनका निवास  पहाड़ों के गाढ़ गधेरों में माना जाता है।  इसलिए इनका नाम गढ़ देवी कहते हैं। इन्हे माँ काली का अवतार माना जाता है। इस देवी के  एक नहीं बाईस  रूपों की पूजा होती है।  इन्हे बाईस बहिनें गढ़ देवी के नाम से भी जाना जाता है।…

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तीन तीतरी तीन तीन लोक कथा – मित्रों उत्तराखंड की सम्रद्ध प्रकृति में विचरण करने वाले पक्षियों की ध्वनि से उत्तराखंड की कोई न कोई लोक कथा अवश्य जुड़ी है। इसे एक दिव्य संयोग समझे या उत्तराखंड के पहाड़ों पर निवास करने वालो की उच्च कल्पनाशीलता, जो प्रकृति से इतना प्यार करते है कि ,प्रकृति की ध्वनि को अपने जीवन के दुख, सुखों से जोड़कर देखते हैं। गर्मी के मौसम में उत्तराखंड के पहाड़ों एक चिड़िया तीन तीतरी तीन -तीन का करुण स्वरवादन करती है। कौन है ये चिड़िया ? और इतने मार्मिक स्वर में तीन तीतरी तीन तीन क्यों…

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काफल उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध जंगली फल है। यह फल हिमालयी पहाड़ो में प्रतिवर्ष अप्रैल और मई में होता है। कई दिब्यगुणो को अपने आप मे समेटे यह फल,उत्तराखंड की एक अलग पहचान को दर्शाता है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध गीत “बेडु पाको बारोमासा, काफल पाको चैत” में भी इस फल का वर्णन है। प्रकृति के चितेरे कवि चंद्रकुंवर बर्तवाल ने भी काफल पाको पर एक गीत /कविता की रचना की है। इसके साथ- साथ उत्तराखंड की एक प्रसिद्ध लोक कथा है, “काफल पाको मैं नि चाखो” इसका हिंदी में अर्थ होता है, काफल पक गए, किन्तु मैंने नही चखे। यह…

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झोड़ा उत्तराखंड का लोकनृत्य झोड़ा उत्तराखंड का एक लोकनृत्य गान है। यह उत्तराखंड के कुमाउनी क्षेत्र में गाया औऱ प्रदर्शित किया जाता है। लोकनृत्य गान इसलिए बोला,यह एक ऐसा लोक नृत्य है, जिसमे स्थानीय लोग सामुहिक रूप से हाथ पकड़ कर वृत्ताकार ,पदताल मिलाते हुए नाचते हैं। और साथ – साथ लोक गीत भी गाते हैं। https://youtu.be/g8hCs1wiuQU?si=vUY6QFdmXp7eTk1B बीच मे एक वाद्य यंत्र बजाने वाला होता है। जो पद बोलता है, और गोल घेरे में हाथ पकड़ कर ,एक विशेष चाल में नाचने वाले स्त्री पुरूष उन पदों को दोहराते हैं। और कहीं -कही स्त्री दल एक पद की शुरुआत करते…

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