Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

काली कमली वाले बाबा- काली कमली वाले बाबा को उत्तराखंड में तीर्थ यात्रियों के लिए सुगम रास्ते और धर्मशालाओं के निर्माण के लिए जाना जाता है। इन्हें स्वामी विशुद्धानंद के नाम से भी जाना जाता है। इनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के गुजरांवाला जिले के जलालपुर किकना नामक स्थान में सन 1831 में हुवा था। ये  भिल्लङ्गन शैव सम्प्रदाय से संबंध रखने के कारण, ये और इनका परिवार भगवान भोलेनाथ की तरह काला कंबल धारण करते थे। मात्र 32 वर्ष की आयु में ये सन्यास लेकर बन गए श्री 1008 स्वमी विशुद्धानंद काली कमली वाले बाबा। सन्यास के उपरांत ये जब…

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ऋषिकेश उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित है। यह समुद्रतल से लगभग 356 मीटर की उचाई पर स्थित है। ऋषिकेश का क्षेत्रफल लगभग 1120 वर्ग किलोमीटर है। ऋषिकेश उत्तराखंड के साथ साथ पुरे देश का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहाँ की जलवायु समशीतोष्ण जलवायु है। गर्मियों में ऋषिकेश का तापमान 35 डिग्री से 40 डिग्री के आस आस रहता है। सर्दियों में यहाँ का मौसम 18 डिग्री से 32 डिग्री तक रहता है। वर्षा ऋतू में यहाँ औसतन 60 इंच बरिश होती हैं। ऋषिकेश में लगभगना  सत्यनारायण मंदिर से लेकर लक्ष्मण झूला तक है। किन्तु लक्ष्मण झूला मुनि की रेती आदि टिहरी जिले…

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एक गांव जिसका नाम था बाणसोलि वहां बचपन के दो परमप्रिय मित्र अपनी मित्रमंडली में जगतू और दीपक जो लगभग 12-14 वर्ष की आयु के थे उनकी दोस्ती की मिशाल बाणसोली गांव तो क्या दूर दूर तक के गावों में प्रसिद्ध थी। दोनों के ह्रदय में परोपकार की भावना थी लेकिन अंतर सिर्फ इतना था कि जगतू एक गरीब और दीपक अमीर परिवार से ताल्लुक रखता था इसलिए वे अपनी ओर से दूसरों की मदद भरपूर करते थे, जगतू तन और मन से अपनी ओर से हर संभव मदद निर्बल और असहायों की और दीपक धन और मन से पात्र लोगों…

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पहाड़ के एक गावँ में एक भयानक मसाण लग गया था। शाम ढलते ही, मशाण का गावँ में आगमन हो जाता था। और जो भी बाहर मिलता उसे उठा कर ले जाता लेता था। ऐसा करते करते उसने गावँ के बहुत सारे लोग गायब कर दिए थे। किसी को नही पता था, वो उन लोगों को कहाँ गायब करता था ? और उनके साथ क्या होता था ? धीरे धीरे उस गावँ में भय का माहौल बन गया ! सूरज ढलते ही लोग दरवाजे बंद करके अंदर दुबक जाते थे। फिर भी उस मसाण के हत्थे कोई न कोई चढ़…

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कुमाऊं में एक जगह का नाम है, बाराकोट, उसके पास कोठयार गावँ में एक लछुवा नाम का आदमी रहता था। लछुवा के सात बेटे थे। और सभी सात बेटे एक से बढ़कर एक मूर्ख थे। लछुवा कोठारी के बेटों के कई किस्से मशहूर हैं। उनमें से कुछ किस्से आज आपके सामने प्रस्तुत करते हैं। कहते हैं उनके कोठयार गावँ में कभी धूप नहीं आती थी। एक पर्वत सारे गावँ को ढक देता था। एक दिन लछुवा कोठारी के बेटों ने पर्वत को खोदने की ठानी, पर्वत खोदते, खोदते कई दिन बीत गए पर्वत टस से मस नही हुवा। फिर उन्होंने…

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हम लोग जो भी पहाड़ से संबंध रखते हैं, वो चुथरोल को अच्छी तरह से पहचानते हैं। यहाँ पहाड़ से मेरा मतलब उत्तराखंड से है। हालांकि यह जीव अन्य हिमालयी राज्यों में भी पाया जाता है। लेकिन इसका नाम वहां की स्थानीय भाषा में कुछ और होगा। चुथरोल को इंग्लिश में येलो थ्रोटेड मार्टिन कहते हैं। जिसे आप पीले गले वाला मार्टिन भी कह सकते हैं। एक अन्य भाषा में इसे खरजा भी कहते हैं। येलो थ्रोटेड मार्टिन का वैज्ञानिक नाम Martes  flavigula है। यह जीव मस्टेलिडे परिवार से सम्बंधित है। इस परिवार और छोटे मांसाहारी जैसे बेजर ,बीजल और ऊदबिलाव…

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उत्तराखंड के पहाड़ो में एक कंटेनुमा झाड़ी पर उगने वाला , नीला लाल फल ,जिसको  स्थानीय भाषा में किलमोड़ा या किनगोड़ा कहते हैं ,इसे हिंदी में दारुहल्दी कहते है। और संस्कृत में दारुहरिद्रा कहते हैं।  अप्रेल से जून के मध्य होने वाले इस दिव्य फल का आनंद सभी पहाड़ वाली बड़े चाव से लेते है। किलमोड़ा का बैज्ञानिक नाम बेरवेरीज एरिस्टाटा है। किनगोड़ा की लगभग 450 प्रजातियां पुरे संसार में पाई जाती हैं। यह उत्तराखंड के 1400 से 2000 मीटर तक की उचाई पर मिलता है। इसका पौधा लगभग 2  से 3 मीटर तक ऊँचा होता है। इसके फल नील…

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आजकल खुशी जोशी दिगारी और नीरज चुफाल का एक कुमाउनी झोड़ा, अल्मोड़ा अंग्रेज आयो टैक्सी में, उत्तराखंड में काफी पसंद किया जा रहा है। इस पारम्परिक झोड़े को संगीत दिया है, गोविंद दिगारी ने और इसकी रिकॉडिंग हुई है। वैदेही स्टूडियो हल्द्वानी में। जो कि खुशी जोशी दिगारी और गोविंद दिगारी का अपना स्टूडियो है। यह पारम्परिक झोड़ा नीरज चुफाल के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध है। इस गीत पर असंख्य रील और सोशल मीडिया पर कई मीम बन चुके हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है, कि यह गीत उत्तराखंड में कितना लोकप्रिय हो चुका है। अभी हाल ही मे,…

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उत्तरकाशी का त्रिशूल:- हिमालय की रमणीय घाटी में उत्तरकाशी एक ऐसा मनोहारी स्थल है, जहाँ स्वंय महादेव भोलेनाथ निवास करते हैं। माँ गंगा जहाँ असि -वरुणा से अठखेलियां करती हैं। यहां के शांत और निश्छल वातावरण में मानव ह्रदय अभूतपूर्व शांति का अनुभव करता है। उत्तरकाशी  को कलयुग की काशी और मुक्तिक्षेत्र कहा गया है। यहाँ ब्रह्मा विष्णु महेश तीनो देव निवास करते हैं।   काशी  की तरह उत्तरकाशी में भी विश्वनाथ मंदिर है। और इसी विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में माँ पार्वती का शक्ति मंदिर है। और इस शक्ति मंदिर में स्थापित है ,एक आदिकालीन दिव्यास्त्र  त्रिशूल , पौराणिक कथाओं…

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उत्तराखंड वीर भड़ों का राज्य है। जितना यह प्राकृतिक रूप से सुंदर है, उतने ही वीर, मेहनती, साहसी यहाँ के निवासी होते है। उत्तराखंड के इतिहास में अनेक वीरों ने जन्म लिया जिनकी वीरता की गाथाएं आज हम पढ़ते है। वीरता के मामले में , उत्तराखंड में महिलाएं भी पुरुषों से कम नही रही। तीलू रौतेली, रानी कर्णवती, रानी जियारानी और रानी धना की वीरता की गाथाएं ,उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों मे लिखी हैं। आज हम अपने इस लेख में कुमाऊं की वीरांगना रानी धना की कहानी का उल्लेख कर रहें हैं। रानी धना कुमाऊं में अस्कोट के…

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