उत्तराखंड के इतिहास में गोरखा शासन का काल एक ऐसे दौर के रूप में याद किया जाता है, जिसने यहाँ की जनता को अनेक कठिनाइयों और अमानवीय व्यवस्थाओं का सामना करने पर मजबूर किया। कुमाऊँ और गढ़वाल में लगभग 25 वर्षों तक चला यह शासन स्थानीय लोगों के बीच आज भी “गोरख्याणी” के नाम से जाना जाता है। इस काल की सबसे चर्चित और भयावह बात थी गोरखा शासन की अन्यायपूर्ण गोल दीप, तराजू दीप न्याय परंपरा, जिसमें न्याय का आधार तर्क और साक्ष्य नहीं बल्कि भाग्य, अंधविश्वास और क्रूर परीक्षाएँ हुआ करती थीं।
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उत्तराखंड में गोरखा शासन की स्थापना :
सन् 1790 ईस्वी में नेपाल की गोरखा सेना ने कुमाऊँ पर आक्रमण किया। चैतरिया बहादुर शाह, काजी जगजीत पांडे, अमरसिंह थापा और सूरवीर थापा के नेतृत्व में हुई इस लड़ाई में चंद वंश के अंतिम शासक महेंद्र चंद पराजित हुए। इसके बाद कुमाऊँ में गोरखा शासन स्थापित हो गया।
कुछ वर्षों बाद सन् 1804 में खुड़बुड़ा के युद्ध में गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह की हार हुई और गढ़वाल भी गोरखाओं के अधीन आ गया। इस प्रकार सम्पूर्ण कुमाऊँ-गढ़वाल क्षेत्र पर गोरखा शासन का विस्तार हो गया।
न्याय व्यवस्था पर सेना का नियंत्रण :
चंद राजाओं के समय न्याय पंचायतों के दल महरा और फर्त्यालों द्वारा दिया जाता था । गंभीर अपराधों में ही राजा द्वारा मृत्युदंड दिया जाता था। लेकिन गोरखा शासन में न्याय का पूरा अधिकार सुब्बा (गोरखा प्रशासक) के हाथों में था।
सुब्बा को इतना अधिकार प्राप्त था कि वह देशद्रोह, हत्या, व्यभिचार अथवा सामाजिक नियमों के उल्लंघन जैसे मामलों में सीधे मृत्युदंड दे सकता था। यहाँ तक कि निम्न जाति के किसी व्यक्ति द्वारा उच्च वर्ग के व्यक्ति के हुक्के से तंबाकू पी लेना भी प्राणदंड का कारण बन सकता था।
कठोर और अमानवीय दंड व्यवस्था
गोरखा शासनकाल में दंड व्यवस्था अत्यंत कठोर थी। अपराधियों को पेड़ों पर लटकाकर फाँसी दी जाती थी। कई मामलों में नाक, कान या हाथ काट दिए जाते थे और घावों पर नमक-मिर्च छिड़क दी जाती थी।
व्यभिचार के आरोप में महिलाओं की नाक काटने जैसी सज़ाएँ आम थीं। यदि कोई पति अपनी पत्नी को किसी अन्य पुरुष के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लेता, तो उसे दोनों की हत्या करने की छूट थी और उसके लिए कोई दंड निर्धारित नहीं था। हालांकि ये वाली कुप्रथा चंद शासन में भी थी , और अंग्रेज़ शासन में बंद हुई ।
इतना ही नहीं, आत्महत्या करने वाले व्यक्ति के परिवार को भी आर्थिक दंड भुगतना पड़ता था। यह व्यवस्था उस समय की कठोर सामाजिक मानसिकता को दर्शाती है। मृत्यु दण्ड की सजायप्ता भारी अर्थदंड देकर मुक्त हो सकता था।
गोरखा शासनकाल में न्यायिक मामलों का निपटारा अपेक्षाकृत शीघ्र किया जाता था और निर्णयों में अधिक विलंब नहीं होने दिया जाता था। किसी भी विवाद के प्रारंभिक चरण में दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने का प्रयास किया जाता था। इस प्रक्रिया के दौरान वादी, प्रतिवादी तथा गवाहों से सत्य बोलने की पुष्टि के लिए महाभारत के ‘हरिवंश’ ग्की शपथ दिलाई जाती थी।
इसके अतिरिक्त मंदिर, अपनी संतान अथवा विवाद से संबंधित वस्तु को न्याय के देवता का प्रतीक मानते हुए उसकी शपथ लेने की भी परंपरा प्रचलित थी, जिसे सत्यता और न्याय सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता था।
गोरखा शासन की अन्यायपूर्ण गोल दीप, तराजू दीप न्याय परंपरा
गोरखा काल की सबसे चर्चित व्यवस्था विभिन्न प्रकार के “दीप” या “दिव्य” थे। इनका प्रयोग तब किया जाता था जब किसी मामले में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं होते थे। इन परीक्षाओं के आधार पर दोषी और निर्दोष का निर्णय किया जाता था।
1. गोल दीप
गोल दीप को कई स्थानों पर गोला दीप भी कहा जाता था। इसमें वादी और प्रतिवादी को गर्म लोहे की छड़ हाथ में पकड़कर कुछ दूरी तक चलना पड़ता था।जिस व्यक्ति का हाथ अधिक जल जाता, उसे दोषी माना जाता था। स्पष्ट है कि गर्म लोहे को पकड़ने पर हाथ का जलना स्वाभाविक था, इसलिए यह परीक्षा पूरी तरह अन्यायपूर्ण थी।
2. कढ़ाई दीप
इस परीक्षा में उबलते तेल से भरी कढ़ाई में हाथ डालना पड़ता था। जिसका हाथ जल जाता, उसे अपराधी घोषित कर दिया जाता था। यह न्याय से अधिक शारीरिक यातना का माध्यम प्रतीत होता है।
3. तराजू दीप
तराजू दीप न्याय परंपरा गोरखा काल की सबसे विचित्र व्यवस्थाओं में से एक थी। इसमें आरोपी को पत्थरों के साथ तराजू में तौला जाता था और उन पत्थरों को सुरक्षित रख लिया जाता था। अगले दिन उन्हीं पत्थरों से दोबारा तौल की जाती थी। यदि व्यक्ति का वजन कम निकलता तो उसे दोषी और यदि अधिक निकलता तो निर्दोष माना जाता था।
वास्तविकता यह है कि एक दिन में किसी व्यक्ति के वजन में इस प्रकार का परिवर्तन होना असामान्य है, इसलिए यह व्यवस्था न्याय की बजाय अंधविश्वास पर आधारित थी।
4. जल दीप
इसे “बौं काटि हारया दीप” भी कहा जाता था। यह संभवतः सबसे क्रूर परीक्षा थी। इसमें दोनों विवादित पक्षों के ऐसे बच्चों को पानी में डुबाया जाता था जिन्हें तैरना नहीं आता था। जिस पक्ष का बच्चा अधिक देर तक जीवित रहता, उसे विजयी माना जाता था। यह व्यवस्था निर्दोष बच्चों को दंडित करने जैसी अमानवीय सोच का उदाहरण थी।
5. कालो हल्दो दीप या जहर दीप
इस परीक्षा में काली हल्दी अथवा विष खाने को दिया जाता था। जो व्यक्ति जीवित बच जाता, उसे निर्दोष मान लिया जाता था। स्पष्ट है कि इसमें जीवन और मृत्यु पूरी तरह भाग्य के भरोसे छोड़ दी जाती थी।
6. तीर दीप
इस विधि में आरोपी का सिर पानी में डुबाकर रखा जाता था। उसी समय दूसरा व्यक्ति एक छोड़े गए तीर तक जाकर वापस आता था। यदि तब तक आरोपी जीवित रहता तो उसे निर्दोष माना जाता था। अन्यथा दोषी समझा जाता था।
7. घात दीप
यह परीक्षा स्थानीय देवताओं जैसे ग्वेल, भैरव, भूमिया, नरसिंह और गड़देवी के थानों में कराई जाती थी। अभियुक्त को देवता के सामने रखी विवादित वस्तु ( जिस चीज के लिए दोनो के बीच विवाद हुवा़, जैसे जमीन की मिट्टी इत्यादि ) उठानी होती थी। यदि अगले छह महीनों तक उसके परिवार में कोई अनहोनी नहीं होती तो उसे निर्दोष माना जाता था।
8. मंदिर दीप
मंदिर दीप में दोनों पक्षों के नाम अलग-अलग पर्चियों पर लिखकर मंदिर में रखे जाते थे। पुजारी द्वारा उठाई गई पहली पर्ची में जिसका नाम आता, उसे निर्दोष घोषित कर दिया जाता था। यह पूरी प्रक्रिया भाग्य पर आधारित थी, जिसमें वास्तविक साक्ष्यों का कोई महत्व नहीं था।
क्या यह वास्तव में न्याय था?
यदि इन सभी परीक्षाओं को आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि इनमें से अधिकांश का न्याय से कोई संबंध नहीं था। गर्म लोहे की छड़ पकड़ना, खौलते तेल में हाथ डालना, जहर खाना या बच्चों को पानी में डुबाना—ये सभी प्रक्रियाएँ क्रूरता और अंधविश्वास का प्रतीक थीं।
विशेष रूप से गोरखा शासन की अन्यायपूर्ण गोल दीप, तराजू दीप न्याय परंपरा यह दर्शाती है कि उस समय कई मामलों में निर्णय तर्क और साक्ष्य के बजाय संयोग और भय के आधार पर लिए जाते थे।
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