स्यूरा प्यूरा : कुमाऊँ का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की लोकगाथाओं, गीतों और जनश्रुतियों में भी अतीत की अनेक स्मृतियाँ सुरक्षित हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध लोकगाथा “स्यूरा प्यूरा” है, जो आज भी कुमाऊँ के कई क्षेत्रों में सुनाई जाती है। इतिहासकारों और लोकविदों का मानना है कि स्यूरा प्यूरा की कथा में कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास, वीर परंपरा और लोकविश्वासों की झलक मिलती है।
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कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास और कत्यूरी शासन
उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार कुमाऊँ में सबसे पहले कत्यूरी राजवंश का शासन माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार पंडित बद्रीदत्त पांडे ने अपनी पुस्तक कुमाऊँ का इतिहास में कत्यूरी शासन का काल लगभग 2500 ईसा पूर्व से लेकर 700 ईस्वी तक बताया है। यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इस समय-सीमा पर अलग-अलग मत रखते हैं, फिर भी यह निर्विवाद है कि कत्यूरी राजाओं ने लंबे समय तक कुमाऊँ पर शासन किया।
कत्यूरी शासन के बाद चंद राजाओं का दौर आया और बाद में 1790 से 1815-17 के बीच गोरखाओं का शासन स्थापित हुआ। गोरखा सेनापति अमर सिंह थापा के नेतृत्व में गोरखा साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में कांगड़ा तक पहुँच गया था।
स्यूरा प्यूरा कौन थे?
कुमाऊँ के लोकगीतों में स्यूरा प्यूरा का नाम अत्यंत प्रसिद्ध है। विद्वान मनोरथ पांडे शास्त्री लिखते हैं कि स्यूरा प्यूरा के गीत पूरे कुर्मांचल क्षेत्र में लोकप्रिय हैं।
कुछ विद्वानों का मत है कि स्यूरा और प्यूरा क्रमशः सिकंदर (Alexander) और पोरस (Porus) के अपभ्रंश रूप हो सकते हैं। हालांकि यह केवल एक लोकमान्यता है, जिसके पक्ष में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
दूसरी ओर, स्थानीय परंपरा स्यूरा प्यूरा को कुमाऊँ की खस जाति के वीर योद्धा मानती है। लोकगाथाओं में उनका वर्णन साहसी, पराक्रमी और जननायक के रूप में मिलता है। यही कारण है कि स्यूरा प्यूरा आज भी लोकस्मृति में जीवित हैं।
दिल्ली और कुमाऊँ के राजाओं की कथाएँ :
पंडित बद्रीदत्त पांडे ने अपने ग्रंथ में कुछ रोचक ऐतिहासिक उल्लेखों का वर्णन किया है। उन्होंने पुरातत्वविद् कनिंघम द्वारा उद्धृत एक हस्तलिखित ग्रंथ “राजावली” का उल्लेख किया है। इस ग्रंथ में दिल्ली के राजवंशों का वर्णन मिलता है तथा यह भी कहा गया है कि किसी समय कुमाऊँ के राजा ने दिल्ली के राजा को पराजित किया था।
इसी संदर्भ में राजा पुरु (पोरस) और दिल्ली के राजा दिल्लू की कथा का भी उल्लेख मिलता है। हालांकि इतिहासकार इन कथाओं की ऐतिहासिक सत्यता पर एकमत नहीं हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि कुमाऊँ की लोकपरंपरा अपने राजाओं को अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी मानती रही है।
फिरिश्ता के विवरण में कुमाऊँ :
मध्यकालीन इतिहासकार फिरिश्ता ने अपने विवरण में उल्लेख किया है कि लगभग 440-470 ईस्वी के बीच दिल्ली के राजा रामदेव राठौर ने दिग्विजय अभियान चलाया। इस दौरान कुमाऊँ के एक शक्तिशाली राजा ने उनका विरोध किया।
वर्णन के अनुसार दोनों पक्षों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें अनेक सैनिक घायल हुए। अंततः कुमाऊँ का राजा पराजित हुआ और अपने हाथियों तथा खजाने के साथ पर्वतीय क्षेत्रों की ओर लौट गया।
हालांकि फिरिश्ता ने उस राजा का नाम नहीं लिखा, लेकिन कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि वह कत्यूरी वंश का शासक हो सकता है। यदि ऐसा था, तो यह कत्यूरी साम्राज्य की शक्ति और प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा सकता है।
कत्यूरी राजाओं की राजधानी कहाँ थी?
कत्यूरी राजाओं की राजधानी को लेकर इतिहासकारों में लंबे समय से चर्चा होती रही है। पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम के अनुसार कत्यूरी राजाओं की राजधानी लखनपुर या विराटपट्टन नामक स्थान में थी, जो रामगंगा नदी के किनारे स्थित था।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपने यात्रा-वृत्तांत में ब्रह्मपुर और लखनपुर का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा कि वहाँ ब्राह्मण और बौद्ध दोनों समुदाय निवास करते थे। लोग शिक्षा, धर्म और कृषि से जुड़े हुए थे।
कई विद्वान मानते हैं कि यही क्षेत्र कत्यूरी राजाओं का प्रमुख केंद्र रहा होगा। लोकगाथाओं में भी लखनपुर का उल्लेख मिलता है, जो इसकी ऐतिहासिक महत्ता को और मजबूत करता है।
लोकगीतों में लखनपुर की स्मृति :
कुमाऊँ के भड़ (लोकगायक) आज भी एक प्रसिद्ध पंक्ति गाते हैं—
“आसन वाका, वासन वाका, सिंहासन वाका,
बाका ब्रह्म, बाका लखनपुर।”
यह लोकपंक्ति दर्शाती है कि लखनपुर केवल एक नगर नहीं था, बल्कि कत्यूरी शासन की गौरवशाली राजधानी के रूप में लोकस्मृति में सुरक्षित रहा।
कुछ इतिहासकार “आसन” और “वासन” को कत्यूरी राजाओं के नाम मानते हैं, जबकि अन्य विद्वान इन्हें प्रतीकात्मक शब्द बताते हैं। फिर भी इस गीत से यह स्पष्ट होता है कि लखनपुर का स्थान कुमाऊँ की ऐतिहासिक चेतना में अत्यंत महत्वपूर्ण था।
स्यूरा प्यूरा की लोकगाथा का महत्व :
स्यूरा प्यूरा केवल दो वीर पात्रों की कहानी नहीं है, बल्कि यह कुमाऊँ की सामूहिक स्मृति का हिस्सा है। इन लोकगीतों में प्राचीन युद्धों, वीरता, स्वाभिमान और क्षेत्रीय पहचान की झलक दिखाई देती है।
लोकसाहित्य की यही विशेषता है कि वह इतिहास की उन परतों को भी संरक्षित रखता है, जो कभी-कभी लिखित इतिहास में दर्ज नहीं हो पातीं। स्यूरा प्यूरा की गाथा भी कुमाऊँ के लोगों के लिए अपने गौरवशाली अतीत से जुड़ने का एक माध्यम है।
स्रोत: कुमाऊँ का इतिहास , लेखक : पंडित बद्रीदत्त पांडे, अल्मोड़ा बुक डिपो, अल्मोड़ा।
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