हरेला 2026 की शुभकामना संदेश | हरेला की हार्दिक शुभकामनायें :- https://youtu.be/LHWXQFbtXRM जी रया, जागि रया, यो दिन बार भेटने रया! हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं, आपका जीवन हरियाली और समृद्धि से भरा रहे। प्रकृति की गोद में बसा हरेला पर्व आपके जीवन में खुशहाली लाए। हरेला की हार्दिक शुभकामनाएं! हरी-भरी फुलवारी, खुशियों की बहार, हरेला पर्व लाए आपके जीवन में अपार प्यार। जी रया, जागि रया! हरेला का पर्व लाए नई उमंग, सियार जैसी बुद्धि और गंगा जैसी पवित्रता और शेर जैसा बल हो , हरेला पर्व की शुभकामनाएं! इस हरेला, प्रकृति के प्रति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण का…
Author: Bikram Singh Bhandari
उत्तर भारत मे सावन 30 जुलाई 2026 से शुरू हो रहा है, और 28 अगस्त 2026 को खत्म होगा। तथा पक्षिम और दक्षिण भारत में सावन 13 अगस्त 2026 से 10 सितम्बर 2026 तक चलेगा। किन्तु उत्तराखंड में पहाड़ का सावन 16 जुलाई हरेला त्यौहार के दिन से शुरू होगा और 15 अगस्त 2026 तक चलेगा। उत्तराखंड में सावन का पहला सोमवार 21 जुलाई 2026 को आएगा। 16 अगस्त को सिंह सक्रांति से भाद्रपद शुरू हो जाएगा। उत्तराखंड पहाड़ी क्षेत्रों तथा नेपाल का सावन अलग और देश के अन्य भागों में सावन अलग अलग क्यों होता है ? उत्तराखंड में…
Harela Festival 2026: उत्तराखंड की संस्कृति और लोक परंपराओं में हरेला का विशेष स्थान है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती और हरियाली का उत्सव है। सदियों से उत्तराखंड के लोग इस पर्व के माध्यम से धरती, पेड़-पौधों और अच्छी फसल के लिए भगवान से प्रार्थना करते आए हैं। यही कारण है कि हरेला को उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और कृषि पर्व माना जाता है। https://youtu.be/LHWXQFbtXRM अगर आप जानना चाहते हैं कि हरेला 2026 कब है, हरेला कब बोया जाएगा और इसे कैसे मनाया जाता है, तो यहां आपको पूरी जानकारी मिलेगी। https://www.facebook.com/share/r/18pK3e1Nd हरेला 2026 कब है?…
उत्तराखंड की वीरभूमि ने देश को अनेक साहसी सैनिक दिए हैं। उन्हीं में से एक थे राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) के बहादुर कमांडो सूरजन सिंह भंडारी, जिन्होंने 2002 के अक्षरधाम आतंकवादी हमले के दौरान अदम्य साहस का परिचय दिया और देश की रक्षा करते हुए गंभीर रूप से घायल हो गए। सुरजन सिंह भंडारी चमोली जिले के गोचर क्षेत्र के रानो गांव के निवासी थे। वे भारतीय सेना की गढ़वाल स्काउट्स रेजिमेंट से वर्ष 2000 में एनएसजी के लिए चयनित हुए थे। 24 सितंबर 2002 को गुजरात के गांधीनगर स्थित अक्षरधाम मंदिर परिसर पर आतंकवादियों ने हमला कर दिया। हमले…
पहाड़ी अम्मा पहाड़ी अम्मा के किरदार में वायरल हो रहा अल्मोड़ा का ये लड़का :कहते हैं कि असली प्रतिभा को पहचान दिलाने के लिए किसी सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ती। अगर हुनर में दम हो तो लोग खुद उसे सिर आंखों पर बिठा लेते हैं। इन दिनों उत्तराखंड में वायरल हो रहा अल्मोड़ा का एक युवा कलाकार इसकी बेहतरीन मिसाल है। सोशल मीडिया पर “पहाड़ी अम्मा” के किरदार से लोगों को हंसाने वाला यह लड़का है अल्मोड़ा जिले के केस्ता (दौलाघट) का रहने वाला 21 वर्षीय आशु बिष्ट। खास बात यह है कि उसकी इस रचनात्मक यात्रा में सबसे बड़ी…
उत्तराखंड के इतिहास में गोरखा शासन का काल एक ऐसे दौर के रूप में याद किया जाता है, जिसने यहाँ की जनता को अनेक कठिनाइयों और अमानवीय व्यवस्थाओं का सामना करने पर मजबूर किया। कुमाऊँ और गढ़वाल में लगभग 25 वर्षों तक चला यह शासन स्थानीय लोगों के बीच आज भी “गोरख्याणी” के नाम से जाना जाता है। इस काल की सबसे चर्चित और भयावह बात थी गोरखा शासन की अन्यायपूर्ण गोल दीप, तराजू दीप न्याय परंपरा, जिसमें न्याय का आधार तर्क और साक्ष्य नहीं बल्कि भाग्य, अंधविश्वास और क्रूर परीक्षाएँ हुआ करती थीं। उत्तराखंड में गोरखा शासन की स्थापना…
स्यूरा प्यूरा : कुमाऊँ का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की लोकगाथाओं, गीतों और जनश्रुतियों में भी अतीत की अनेक स्मृतियाँ सुरक्षित हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध लोकगाथा “स्यूरा प्यूरा” है, जो आज भी कुमाऊँ के कई क्षेत्रों में सुनाई जाती है। इतिहासकारों और लोकविदों का मानना है कि स्यूरा प्यूरा की कथा में कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास, वीर परंपरा और लोकविश्वासों की झलक मिलती है। कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास और कत्यूरी शासन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार कुमाऊँ में सबसे पहले कत्यूरी राजवंश का शासन माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार पंडित बद्रीदत्त…
जुठो-पिठो : उत्तराखंड की लोक संस्कृति अपनी समृद्ध परंपराओं, रीति-रिवाजों और वैवाहिक संस्कारों के लिए जानी जाती है। यहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और सामाजिक संबंधों का भी उत्सव होता है। उत्तराखंड की विवाह परंपरा में अनेक ऐसी रस्में देखने को मिलती हैं जो प्रेम, अपनत्व, हास्य और सामाजिक सौहार्द का संदेश देती हैं। इन्हीं में से एक है “जुठो-पिठो”, जो कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में प्रचलित एक अत्यंत रोचक लोकाचार है। यह रस्म विवाह के मुख्य अनुष्ठानों के पूर्ण होने के बाद सम्पन्न की जाती है और नवविवाहित जोड़े के बीच सहजता,…
कठउतार: कुमाऊँ की मृत्यु-संस्कार परंपरा : उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की लोकसंस्कृति में जीवन के प्रत्येक संस्कार से जुड़ी अनेक विशिष्ट परंपराएँ देखने को मिलती हैं। जन्म, विवाह और मृत्यु जैसे अवसरों पर निभाई जाने वाली ये परंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि समाज में पारस्परिक सहयोग, सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भी प्रकट करती हैं। ऐसी ही एक रोचक और कम चर्चित परंपरा है “कठउतार”, जो शवयात्रा में सम्मिलित होने वाले लोगों से जुड़ी हुई है। क्या है कठउतार ? कुमाऊँ क्षेत्र में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले…
उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति में प्रकृति, खेती और देवताओं का गहरा सम्बन्ध रहा है। यहाँ के पर्वतीय समाज ने अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को किसी न किसी लोकदेवता से जोड़ा है। इन्हीं लोकदेवताओं में एक महत्वपूर्ण नाम है — भदाण देवता। यह गढ़वाल क्षेत्र का एक प्रसिद्ध कृषकीय देवता माना जाता है, जिसकी पूजा विशेष रूप से खेती और जल से जुड़े स्थानों पर की जाती है। लोकमान्यता के अनुसार भदाण देवता भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई हलधर बलराम का ही लोक रूप हैं। भदाण देवता का स्वरूप गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में भदाण देवता को खेतों और कृषि की…

