पहाड़ी अम्मा पहाड़ी अम्मा के किरदार में वायरल हो रहा अल्मोड़ा का ये लड़का :कहते हैं कि असली प्रतिभा को पहचान दिलाने के लिए किसी सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ती। अगर हुनर में दम हो तो लोग खुद उसे सिर आंखों पर बिठा लेते हैं। इन दिनों उत्तराखंड में वायरल हो रहा अल्मोड़ा का एक युवा कलाकार इसकी बेहतरीन मिसाल है। सोशल मीडिया पर “पहाड़ी अम्मा” के किरदार से लोगों को हंसाने वाला यह लड़का है अल्मोड़ा जिले के केस्ता (दौलाघट) का रहने वाला 21 वर्षीय आशु बिष्ट। खास बात यह है कि उसकी इस रचनात्मक यात्रा में सबसे बड़ी…
Author: Bikram Singh Bhandari
उत्तराखंड के इतिहास में गोरखा शासन का काल एक ऐसे दौर के रूप में याद किया जाता है, जिसने यहाँ की जनता को अनेक कठिनाइयों और अमानवीय व्यवस्थाओं का सामना करने पर मजबूर किया। कुमाऊँ और गढ़वाल में लगभग 25 वर्षों तक चला यह शासन स्थानीय लोगों के बीच आज भी “गोरख्याणी” के नाम से जाना जाता है। इस काल की सबसे चर्चित और भयावह बात थी गोरखा शासन की अन्यायपूर्ण गोल दीप, तराजू दीप न्याय परंपरा, जिसमें न्याय का आधार तर्क और साक्ष्य नहीं बल्कि भाग्य, अंधविश्वास और क्रूर परीक्षाएँ हुआ करती थीं। उत्तराखंड में गोरखा शासन की स्थापना…
स्यूरा प्यूरा : कुमाऊँ का इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और साम्राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ की लोकगाथाओं, गीतों और जनश्रुतियों में भी अतीत की अनेक स्मृतियाँ सुरक्षित हैं। ऐसी ही एक प्रसिद्ध लोकगाथा “स्यूरा प्यूरा” है, जो आज भी कुमाऊँ के कई क्षेत्रों में सुनाई जाती है। इतिहासकारों और लोकविदों का मानना है कि स्यूरा प्यूरा की कथा में कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास, वीर परंपरा और लोकविश्वासों की झलक मिलती है। कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास और कत्यूरी शासन उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार कुमाऊँ में सबसे पहले कत्यूरी राजवंश का शासन माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार पंडित बद्रीदत्त…
जुठो-पिठो : उत्तराखंड की लोक संस्कृति अपनी समृद्ध परंपराओं, रीति-रिवाजों और वैवाहिक संस्कारों के लिए जानी जाती है। यहां विवाह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि दो परिवारों और सामाजिक संबंधों का भी उत्सव होता है। उत्तराखंड की विवाह परंपरा में अनेक ऐसी रस्में देखने को मिलती हैं जो प्रेम, अपनत्व, हास्य और सामाजिक सौहार्द का संदेश देती हैं। इन्हीं में से एक है “जुठो-पिठो”, जो कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में प्रचलित एक अत्यंत रोचक लोकाचार है। यह रस्म विवाह के मुख्य अनुष्ठानों के पूर्ण होने के बाद सम्पन्न की जाती है और नवविवाहित जोड़े के बीच सहजता,…
कठउतार: कुमाऊँ की मृत्यु-संस्कार परंपरा : उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की लोकसंस्कृति में जीवन के प्रत्येक संस्कार से जुड़ी अनेक विशिष्ट परंपराएँ देखने को मिलती हैं। जन्म, विवाह और मृत्यु जैसे अवसरों पर निभाई जाने वाली ये परंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि समाज में पारस्परिक सहयोग, सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भी प्रकट करती हैं। ऐसी ही एक रोचक और कम चर्चित परंपरा है “कठउतार”, जो शवयात्रा में सम्मिलित होने वाले लोगों से जुड़ी हुई है। क्या है कठउतार ? कुमाऊँ क्षेत्र में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले…
उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति में प्रकृति, खेती और देवताओं का गहरा सम्बन्ध रहा है। यहाँ के पर्वतीय समाज ने अपने जीवन के प्रत्येक कार्य को किसी न किसी लोकदेवता से जोड़ा है। इन्हीं लोकदेवताओं में एक महत्वपूर्ण नाम है — भदाण देवता। यह गढ़वाल क्षेत्र का एक प्रसिद्ध कृषकीय देवता माना जाता है, जिसकी पूजा विशेष रूप से खेती और जल से जुड़े स्थानों पर की जाती है। लोकमान्यता के अनुसार भदाण देवता भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई हलधर बलराम का ही लोक रूप हैं। भदाण देवता का स्वरूप गढ़वाल के ग्रामीण क्षेत्रों में भदाण देवता को खेतों और कृषि की…
उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की संस्कृति केवल त्योहारों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ जीवन के हर चरण से जुड़ी अनेक लोकमान्यताएँ और परंपराएँ सदियों से प्रचलित रही हैं। इन्हीं में से एक बेहद रोचक और भावनात्मक लोकविश्वास है — “अछौत”या “औछा”। कुमाऊँनी भाषा में इसे अवच्छादन भी कहा जाता है। यह परंपरा शिशु जन्म और परिवार की महिलाओं के प्रसव से जुड़ी हुई है, जिसे पहाड़ के लोग आज भी किसी न किसी रूप में याद करते हैं। क्या होता है अछौत या औछा? लोकमान्यता के अनुसार यदि एक ही परिवार में किसी प्रसूता की देवरानी, जेठानी,…
उत्तराखण्ड की लोकसंस्कृति केवल देवी-देवताओं, मेलों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ के जनजीवन में अनेक ऐसे पारंपरिक विश्वास भी प्रचलित रहे हैं जो प्रकृति, वास्तु और दैनिक जीवन से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन्हीं लोकविश्वासों में एक महत्वपूर्ण शब्द है “बेध” अथवा “भेद”। यह शब्द उत्तराखण्ड के ग्रामीण समाज में लंबे समय से प्रचलित है और आज भी कई क्षेत्रों में लोग इसे गंभीरता से मानते हैं। क्या होता है “बेध” या “भेद” ? “बेध” शब्द का सामान्य अर्थ होता है ,भेदना या आर-पार होना। किन्तु लोकविश्वासों में इसका लक्ष्यार्थ “अनिष्टकारी प्रभाव” माना जाता है। अर्थात…
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति केवल देवी-देवताओं, मेलों और लोकगीतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां की परंपराओं में वीरता, संघर्ष और सामूहिक चेतना भी गहराई से समाई हुई है। इन्हीं अनोखी परंपराओं में से एक है पिथौरागढ़ जनपद की चौंदास घाटी में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध कंडाली महोत्सव। यह ऐसा अद्भुत लोक उत्सव है जिसे हर वर्ष नहीं बल्कि पूरे बारह वर्ष के अंतराल में मनाया जाता है। धारचूला के निकट काली नदी के किनारे बसे चौंदास क्षेत्र में आयोजित होने वाला यह उत्सव महिलाओं के शौर्य, परंपरा और सामूहिक शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यहां महिलाएं युद्ध मुद्रा में…
गंगा दशहरा पूरे देश मे मनाया जाता है। गंगा दशहरा जेष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। जेष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा माता स्वर्ग से पृथ्वी लोक को आगमन हुआ था। माँ गंगा के धरती के आगमन के उपलक्ष्य में इस दिन को मनाया जाता हैं। उत्तराखंड कुमाउनी लोग इस दिन अपने द्वार पर विशेष अभिमंत्रित पत्र लगाते हैं। जिसे गंगा दशहरा द्वार पत्र कहते हैं। गंगा दशहरा द्वार पत्र के बारे में विस्तार वीडियो देखिए यहां : https://youtu.be/3RcdJ1hZiS8 गंगा अवतरण की कथा जेष्ठ शुक्ल दशमी के दिन भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने मा गंगा…

