Harela Festival 2026: उत्तराखंड की संस्कृति और लोक परंपराओं में हरेला का विशेष स्थान है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, खेती और हरियाली का उत्सव है। सदियों से उत्तराखंड के लोग इस पर्व के माध्यम से धरती, पेड़-पौधों और अच्छी फसल के लिए भगवान से प्रार्थना करते आए हैं। यही कारण है कि हरेला को उत्तराखंड का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और कृषि पर्व माना जाता है।
अगर आप जानना चाहते हैं कि हरेला 2026 कब है, हरेला कब बोया जाएगा और इसे कैसे मनाया जाता है, तो यहां आपको पूरी जानकारी मिलेगी।
https://www.facebook.com/share/r/18pK3e1NdW/
Table of Contents
हरेला 2026 कब है? ( Harela Festival 2026 dates) https://www.facebook.com/share/r/18pK3e1NdW/
वर्ष 2026 में हरेला पर्व 16 जुलाई, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस दिन पूरे उत्तराखंड में लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं तथा पर्यावरण संरक्षण का संकल्प लेते हैं।
हरेला 2026 बोने की तिथियां:
- 06 जुलाई 2026 – 11 दिन वाला हरेला बोया जाएगा।
- 07 जुलाई 2026 – 10 दिन वाला हरेला बोया जाएगा।
- 08 जुलाई 2026 – 9 दिन वाला हरेला बोया जाएगा।
- 16 जुलाई 2026 – हरेला पर्व मनाया जाएगा।
हरेला क्या है?
‘हरेला’ का अर्थ है हरियाली। यह पर्व नई फसल, सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है। उत्तराखंड में यह त्योहार सावन मास की कर्क संक्रांति पर मनाया जाता है। इसी समय से सूर्य दक्षिणायन होते हैं और सावन का शुभारंभ माना जाता है।
हरेला क्यों मनाया जाता है?
हरेला पर्व प्रकृति और कृषि से जुड़ा हुआ है। यह पर्व अच्छी फसल, परिवार की खुशहाली और भगवान शिव की कृपा की कामना के लिए मनाया जाता है। साथ ही यह लोगों को पेड़ लगाने और पर्यावरण की रक्षा करने का संदेश भी देता है।
हरेला कैसे बोया जाता है?
हरेला पर्व से 9, 10 या 11 दिन पहले घर में शुद्ध मिट्टी तैयार की जाती है। इसके बाद किसी लकड़ी की पट्टी, टोकरी या मिट्टी के पात्र में गेहूं, जौ, धान, मक्का, उड़द, गहत, तिल और भट्ट जैसे पांच या सात प्रकार के बीज बोए जाते हैं।
इन बीजों पर प्रतिदिन हल्का पानी छिड़का जाता है। कुछ दिनों बाद जब हरे-हरे अंकुर निकल आते हैं, तो इन्हें हरेला कहा जाता है।
हरेला कैसे मनाया जाता है?
हरेला वाले दिन सुबह परिवार के सभी सदस्य स्नान करके पूजा करते हैं। भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा के बाद हरेला काटा जाता है। इसके बाद घर के बड़े-बुजुर्ग परिवार के सदस्यों के सिर पर हरेला रखते हुए आशीर्वाद देते हैं। वे कहते हैं—
“जी रये, जागी रये, यो दिन यो बार भेटने रये।”
इसका अर्थ है कि आप स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों और हर वर्ष यह शुभ दिन देखने का सौभाग्य प्राप्त करें।
हरेला को कुलदेवताओं और मंदिरों में भी चढ़ाया जाता है। कई स्थानों पर लोग इसे अपने कानों के पीछे लगाते हैं, जिसे शुभ माना जाता है।
डिकारे बनाने की परंपरा
हरेला पर्व पर कई घरों में चिकनी मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती, श्रीगणेश और उनके परिवार की मूर्तियां बनाई जाती हैं। इन्हें डिकारे कहा जाता है। पूजा के बाद इन डिकारों को हरेला के साथ स्थापित किया जाता है। यह उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला का सुंदर उदाहरण है।
हरेला का महत्व:
आज के समय में हरेला केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने वाला अभियान भी बन चुका है। इस अवसर पर पूरे उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाता है। यह पर्व हमें प्रकृति से प्रेम करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली बचाने की प्रेरणा देता है।
निष्कर्ष
हरेला उत्तराखंड की संस्कृति, प्रकृति और कृषि से जुड़ा एक अनूठा लोकपर्व है। यह हमें सिखाता है कि प्रकृति का सम्मान करना और उसकी रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है। यदि आप भी इस वर्ष हरेला मना रहे हैं, तो पूजा के साथ-साथ कम से कम एक
पौधा अवश्य लगाएं। यही हरेला पर्व का सबसे सुंदर संदेश है।
हरेला पर कविता : उत्तराखंड के प्रसिद्ध लोकपर्व पर एक कविता



