Thursday, July 18, 2024
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गंगा दशहरा द्वार पत्र | Ganga dussehra dwar patra

गंगा दशहरा पूरे देश मे मनाया जाता है । गंगा दशहरा जेष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। जेष्ठ शुक्ल दशमी के दिन  गंगा माता स्वर्ग से पृथ्वी लोक को आगमन हुआ था। माँ गंगा के धरती के आगमन के उपलक्ष्य में इस दिन को मनाया जाता हैं। उत्तराखंड कुमाउनी लोग इस दिन अपने द्वार पर विशेष अभिमंत्रित पत्र लगाते हैं। जिसे गंगा दशहरा द्वार पत्र कहते हैं।

जेष्ठ शुक्ल दशमी के दिन भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ,ने मा गंगा को धरती पर अवतरण के आदेश पर माँ गंगा धरती पर अवतरण के लिए तैयार हो गई, लेकिन समस्या यह थी, माँ गंगा का वेग बहुत तीव्र था, और धरती पर सीधे मा गंगा का वेग आने का मतलब था,कि धरती की तबाही।

फिर ब्रह्म देव के आदेशानुसार , भगीरथ जी ने भगवान शिव की आराधना की , तब भगवान शिव ने अपनी जटाएं खोल कर अपने सिर पर , गंगा मैया के वेग को रोका और फिर छोटी छोटी जल धाराओं के रूप में छोड़ा।

उसके बाद भगीरथ जी ने मा गंगा की जल धारा से ,अपने पूर्वज सगर के पुत्रो को मुक्ति दिलाई । महाराज सगर के पुत्र , महर्षि कपिल मुनि के श्राप से भस्म हो गए थे। उनको मुक्ति दिलाने के लिए महाराज भगीरथ तपस्या करके , गंगा मैया को धरती पर लाये। इसलिये गंगा मैया का एक नाम भागीरथी भी है।

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यह दिन समस्त भारत मे गंगा दशहरा के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लोग   इस दिन श्री गंगा दशहरा द्वार पत्र अपने दरवाजो पर चिपकाते हैं। इस दिन स्नान , दान का विशेष महत्व माना जाता हैं।

“2024 में गंगा दशहरा का त्योहार जेष्ठ शुक्ल दशमी , यानी 16 जून 2024 को होगा। “

गंगा दशहरा का महत्व –

2024  में गंगा दशहरा जेष्ठ शुक्ल की दशमी 16 जून 2024  को मनाया जाएगा। हर वर्ष हर बार गंगा दशहरा का विशेष महत्व होता है । गंगा दशहरा के दिन स्न्नान दान का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन माँ गंगा का अवतरण हुवा था, इसलिए इस दिन स्नान  और दान का विशेष महत्व है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार माँ गंगा की पूजा में प्रयुक्त होने वाली सभी चीजें 10 की संख्या में होनी चाहिए। जैसे – दस प्रकार के फूल, दस नैवेद्ध, दस दीपक, दस पान के पत्ते , दस प्रकार के फल आदि।

स्कन्द पुराण में  गंगा दशहरा के महत्व को विस्तार से समझया गया है।  स्न्नान के बाद यदि संभव हो गंगा श्रोत पढ़ा जाय। वर्तमान परिस्थितियों में गंगा नदी या तालाब में तो संभव नही हो पायेगा। घर के मंदिर में बैठ कर आप श्री गंगा श्रोत का पाठ कर सकते हैं। इससे रोग , पाप कष्टों से मुकि मिलेगी।

ततपश्चात आप कुछ दान भी कर सकते हैं ,तो जरूर करें, क्योंकि गंगा दशहरा के दिन या सनातन धर्म के हर पर्व के दिन , दान का विशेष महत्व है।सरल शब्दों में कहें तो सनातन धर्म मे दान का सर्वाधिक महत्व बताया है। इस दिन सूती वस्त्र ,जूते चप्पल, आदि चीजे दान करनी चाहिए। दान पुण्य के लाभ के रूप में आपको सुख शांति और निरोगी काया का लाभ मिलेगा।

गंगा दशहरा द्वार पत्र  –

प्रति वर्ष जेष्ठ शुक्ल दशमी को समस्त भारत वर्ष के साथ साथ उत्तराखंड के कुर्मांचल कुमाऊँ  अंचलों में , गंगा दशहरा को बड़े हर्ष उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है।  इस दिन पहाड़ो के लोग स्नान एवं घर की सफाई करके , अपने द्वार पर एक विशेष पत्र चिपकाते हैं । जिसे गंगा दशहरा द्वार पत्र कहा जाता है। इस पत्र में देवी देवताओं की तस्वीरों के साथ , एक विशेष श्लोक लिखा रहता है। यह पत्र प्रत्येक वर्ष जेष्ठ शुक्ल दशमी से पूर्व पंडित अपने यजमानों को देते हैं । बदले में यजमानों से निसरो ( दक्षिणा ) ग्रहण करते हैं। गंगा दशहरा उत्तराखंड कुमाऊँ का एक सांस्कृतिक त्योहार हैं।

गंगा दशहरा द्वार पत्र

गंगा दशहरा के शुभ दिन कुमाऊँ के कई गांवों में गांव के भूमिया देवता को भोग लगाने की परंपरा भी है। भूमिया को भोग लगाने की परंपरा में, नए अनाज यानी रवि की फसल का पहला भोग गांव के भूमिया देवता को लगाया जाता है।

पहले प्रिंटिंग प्रेस नही हुआ करते थे, तो पंडित जी , कागजो में बच्चों की स्केच पेन खुद ही , गंगा दशहरा द्वार पत्र बनाते थे। ये पंडित जी के लिए काफी मेहनत भरा काम होता था।क्योंकि उस समय पलायन नही था तो हर एक पंडित जी के पास कम से कम 100 जजमान तो होते ही थे। तो उन सभी के लिए मैनुवली (स्वरचित)  100 पेपर बनाने होते थे। और कुमाऊँ के कुछ क्षेत्रो में लगभग 90 साल पहले एक सपाट पत्थर या स्लेट पर उल्टी आकृति में चित्र एवं श्लोक को बना कर, उसमे काली स्याही लगाकर मशीन से दबाकर दशहरा द्वार पत्र बनाते थे।

वर्तमान में प्रिटिंग प्रेस होने के कारण, एवं आधुनिक सुविधाएं होने के कारण, श्री गंगा दशहरा द्वार पत्र , सुंदर और आकर्षक मिलते हैं। दशहरा द्वार पत्रों में , भगवान शिव , गंगा मैया , हनुमान जी, सरस्वती माँ आदि देवी देवताओं के सुंदर चित्र छपे होते हैं।

गंगा दशहरा द्वार पत्र श्लोक , मंत्र

जेष्ठ शुक्ल दशमी को माँ  गंगा का अवतरण दिवस समस्त देश के साथ उत्तराखंड के कुर्मांचल ( कुमाऊँ ) में भी विशेष उल्लास से मनाया जाता है। इस दिन कुमाऊँ क्षेत्र के लोग पंडित जी द्वारा दिया एक पत्र चिपकाते हैं जिसमे एक श्लोक लिखा रहता है, जो निम्न है –

अगस्त्यश्च पुलस्त्यश्च वैशम्पायन एव च ।
र्जैमिनिश्च सुमन्तुश्च पञ्चैते वज्रवारका: ।।
मुनेःकल्याणमित्रस्य जैमिनेश्चाऽनुकीर्तनात् ।
विद्युदग्नि भयं नास्ति लिखितं गृहमण्डले ।।
यत्रानुपायी भगवान् दद्यात्ते हरिरीश्वरः।
भङ्गो भवति वज्रस्य तत्र शूलस्य का कथा ।।

यह शुद्ध रक्षा श्लोक है। जिसमे वज्रपात , आदि व्याधियों से रक्षा का संकल्प मंत्र लिखा है। यह शुद्ध श्लोक है। कुछ दशहरा द्वार पत्र में आजकल गलत श्लोकों की प्रिंटिंग  कि जा रही है । जो बिल्कुल भी क्षम्य नही हैं।

गंगा दशहरा द्वार पत्र का महत्व –

कुमाऊँ उत्तराखंड की कुमाउनी भाषा में इस त्योहार को दसर, दशोर ,दशे नामो भी जाना जाता है। गंगा दशहरा द्वार पत्र का कुमाऊं क्षेत्र में बहुत महत्व माना जाता है। कहाँ जाता है कि इस द्वार पत्र को द्वार पर लगाने ने , वज्रपात , आंधी तूफान आदि प्राकृतिक आपदाओं के साथ नकारत्मक शक्तियों से भी रक्षा होती है। बीमारियों से एवं , चोर डकैतों, व जंगली जानवरों से भी यह द्वार पत्र रक्षा करता है , ऐसी मान्यता है कुमाऊँ मंडल उत्तराखंड में।

सरल शब्दों में कहें तो , “गंगा दशहरा द्वार पत्र वास्तु दोष निवारक पत्र माना जाता है।”

गंगा दशहरा द्वार पत्र की शुरुआत कैसे हुई ? या सर्वप्रथम किसने श्री गंगा दशहरा द्वार पत्र बनाया ?

प्रसिद्ध पंडित बसंत बल्लभ जी के अनुसार , ” जब पतित पावनी माँ गंगा स्वर्ग से पृथ्वी आई , तब सप्त ऋषि कुर्मांचल ( कुमाऊँ ) क्षेत्र में तपस्या कर रहे थे। माँ गंगा के पृथ्वी आगमन पर सप्तऋषियों ने उनकी पूजा की , आश्रम में जल छिड़ककर  अपने आश्रमो के द्वार पर द्वार पत्र लगाए। तभी से कुर्मांचल ( कुमाऊँ ) क्षेत्र में द्वार पर गंगा दशहरा द्वार पत्र लगाने की परम्परा है।

निवेदन – 

मित्रों उपरोक्त पोस्ट में हमने आपको  गंगा दशहरा 2024 पर जानकारी देने की कोशिश की है, यदि अच्छा लगे तो, हमे हमारे फेसबुक पेज देवभूमि दर्शन पर  या कमेंट्स अवश्य बताए।

गंगनाथ देवता की कहानी पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें ……..

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
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