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पहाड़ी भाषा में नजर लगने को क्या कहते हैं?
हम आम बोलचाल में किसी को नजर लगने की बात अक्सर सुनते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में भी नजर लगने को लेकर कई तरह की मान्यताएं रही हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहाड़ी भाषा में नजर लगने को क्या कहा जाता है? कुमाऊं में नजर लगने के लिए ‘डीठ’शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि ‘डीठ’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘दृष्टि’ शब्द से हुई है। कुमाऊं में इसे ‘चखा’ भी कहा जाता है, जबकि गढ़वाल के कुछ क्षेत्रों में नजर लगने के लिए ‘दाग’ शब्द प्रचलित है।
पुराने समय में पहाड़ों में यह मान्यता थी कि कुछ लोगों की नजर बुरी होती है और उनकी कुदृष्टि का असर इंसान, पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों या फसलों पर भी पड़ सकता है। जैसे किसी स्वस्थ और सुंदर बच्चे के अचानक बीमार पड़ने, पशु का दूध कम हो जाने, फलदार पेड़ के फल खराब होने या खेत की फसल सूखने जैसी घटनाओं को कई बार नजर लगने से जोड़कर देखा जाता था। नजर से बचाने के लिए भी पहाड़ों में कई पारंपरिक तरीके अपनाए जाते थे। छोटे बच्चों के माथे पर काला टीका लगाया जाता था। पशुओं के गले में चमड़े का टुकड़ा बांधा जाता था और कई बार बच्चों या युवक-युवतियों को गंडे-ताबीज भी पहनाए जाते थे।
अगर किसी को नजर लगने की आशंका होती, तो उसे उतारने के लिए भी पारंपरिक तरीके अपनाए जाते थे। इनमें राई, लाल मिर्च और नमक को व्यक्ति के सिर के ऊपर से घुमाकर अंगारों में डालना जैसी लोक परंपराएं शामिल थीं। मान्यता थी कि अगर मिर्च की धसक महसूस न हो, तो व्यक्ति को ‘डीठ’ लगी है।
आज नजर लगने की इन बातों को मुख्य रूप से लोकविश्वास और पारंपरिक मान्यता के रूप में देखा जाता है। इन मान्यताओं के पीछे वैज्ञानिक प्रमाण अलग विषय है, लेकिन ‘डीठ’, ‘चखा’ और ‘दाग’ जैसे शब्द उत्तराखंड की स्थानीय बोलियों और लोकजीवन का हिस्सा रहे हैं।
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