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हिलजात्रा 2026 कब है? :
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध लोकपर्व हिलजात्रा 2026 में 24 अगस्त को मनाया जाएगा। कुमाऊं की लोकसंस्कृति में हिलजात्रा केवल नृत्य और मनोरंजन का आयोजन नहीं है, बल्कि इसमें पहाड़ की कृषि परंपरा, ग्रामीण जीवन, लोकविश्वास, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत एक साथ दिखाई देती है। इस उत्सव का सबसे आकर्षक पक्ष इसके पारंपरिक मुखौटे, अलग-अलग पात्रों के स्वांग और अंत में होने वाला लखियाभूत का प्रवेश है।
हिलजात्रा क्या है?
हिलजात्रा उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले की सोरघाटी का प्रमुख लोकउत्सव है। यह मुख्य रूप से सोर क्षेत्र के कई गांवों और बस्तियों में पारंपरिक तरीके से मनाई जाती है। बजेटी, कुमौड़, बराल गांव, थरकोट, बलकोट, चमाली, पुरान, देवथल, सेरी और रसैपाटा जैसे क्षेत्रों में हिलजात्रा की अपनी-अपनी स्थानीय परंपराएं देखने को मिलती हैं।
हिलजात्रा का स्वरूप कृषि प्रधान होने के कारण इसमें पहाड़ के पारंपरिक खेती-किसानी वाले जीवन को अभिनय और नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यहां खेत में हल चलाने वाला किसान, बैलों की जोड़ी, ग्वाला, खेत में काम करने वाली महिलाएं, मेड़ बनाने वाला किसान और कई अन्य ग्रामीण पात्र दिखाई देते हैं। इस तरह पूरा आयोजन पुराने पहाड़ी गांव के जीवन की एक जीवंत तस्वीर सामने रख देता है।
सोरघाटी के अलावा कुछ अलग रूपों और परंपराओं के साथ यह लोकनृत्य हरिण चित्तल नृत्य के नाम से अस्कोट और कनालीछीना क्षेत्रों में भी देखने को मिलता है।
हिलजात्रा को क्यों कहा जाता है मुखौटा नृत्य?
हिलजात्रा की सबसे खास पहचान इसके पारंपरिक लकड़ी के मुखौटे हैं। उत्सव में अलग-अलग पशुओं और पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार अपने चेहरे पर इन मुखौटों को धारण करते हैं। यही कारण है कि हिलजात्रा को उत्तराखंड के प्रमुख मुखौटा लोकनृत्यों में गिना जाता है।
इन मुखौटों के जरिए बैल, घोड़ा, हिरन और दूसरे पात्रों को दर्शाया जाता है। कलाकारों की वेशभूषा भी सामान्य नहीं होती। कई पात्र शरीर पर सफेद मिट्टी पोतकर उसके ऊपर काली-सफेद धारियां और विभिन्न आकृतियां बनाते हैं। आधे शरीर पर पारंपरिक कच्छा और शरीर पर मिट्टी से बनाया गया विशेष रंग-रूप उनके पात्र को और प्रभावशाली बना देता है।
हिलजात्रा के दौरान यह वेशभूषा और मुखौटे केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि इनके माध्यम से ग्रामीण जीवन और स्थानीय लोकपरंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने का काम भी होता है।
हिलजात्रा का आयोजन कैसे होता है?
हिलजात्रा के आयोजन की शुरुआत भी अपने आप में खास होती है। कुमौड़ में इसका प्रारंभ कोट से, जबकि बजेटी में बिरखमचौक से किया जाता है। यहां से कलाकार और ग्रामीण पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन के साथ मुख्य उत्सव स्थल की ओर बढ़ते हैं।
ढोल-नगाड़ों की आवाज के बीच घोड़े, बैलों की जोड़ी, हिरन और अड़ियल बैल जैसे पात्रों का प्रवेश होता है। कलाकार अपने विशेष मुखौटे और वेशभूषा में लोगों के बीच पहुंचते हैं। कई कलाकार हाथ में सफेद मिट्टी लेकर दर्शकों के चेहरे पर मिट्टी लगाते हुए आगे बढ़ते हैं। इस पूरी शोभायात्रा के साथ स्थानीय लोकगायक दुतारी और हुड़किया बौल की परंपरा से जुड़े गीत और वादन करते हैं।
मुख्य मैदान में पहुंचने के बाद कृषि और ग्रामीण जीवन से जुड़े अलग-अलग दृश्यों का अभिनय शुरू होता है। खेती की तैयारी से लेकर धान की रोपाई और खेत में काम करने वाले लोगों की दिनचर्या तक को हास्य, नृत्य और स्वांग के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
कुमौड़ में हिलजात्रा का प्रमुख आयोजन
कुमौड़ गांव की हिलजात्रा विशेष रूप से प्रसिद्ध मानी जाती है। यहां गांव के मैदान में स्थित करीब सौ वर्ष पुराने विशाल झूले के आसपास उत्सव का प्रमुख आयोजन होता है। इस दौरान गांव और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक आयोजन देखने पहुंचते हैं।
कुमौड़ की हिलजात्रा में धार्मिक आस्था का पक्ष भी बेहद महत्वपूर्ण है। यहां लखियाभूत को विशेष श्रद्धा के साथ देखा जाता है। लोकमान्यता में लखियाभूत को भगवान शिव के गण वीरभद्र का स्वरूप या उनका अवतार माना जाता है। इसलिए इसके दर्शन के समय श्रद्धालु फूल और अक्षत लेकर उपस्थित रहते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।
स्वांग के जरिए दिखता है पहाड़ का पुराना जीवन
हिलजात्रा का एक बड़ा आकर्षण इसमें प्रस्तुत किए जाने वाले स्वांग हैं। दोपहर के समय सबसे पहले गांव के मुखिया और बुजुर्ग लोग देवताओं के चिह्नों से सजे लाल झंडों तथा स्थानीय वाद्य यंत्रों के साथ कोट से मुख्य उत्सव स्थल तक पहुंचते हैं।
इसके बाद अलग-अलग पात्रों का रूप धारण किए युवक मैदान में प्रवेश करते हैं। कोई बैल बनता है तो कोई ग्वाला, धोबी, नाई, व्यापारी या मछुआरे का रूप धारण करता है। कलाकार अपने अनोखे हाव-भाव, मजेदार संवाद और ऊटपटांग हरकतों से वहां मौजूद लोगों को खूब हंसाते हैं।
इन स्वांगों में केवल हास्य ही नहीं होता, बल्कि पुराने समय के ग्रामीण समाज की झलक भी दिखाई देती है। उस दौर में गांव के अलग-अलग पेशों और सामाजिक भूमिकाओं को किस तरह देखा जाता था, उसका मनोरंजक रूप इन पात्रों के माध्यम से सामने आता है।
खेत में धान की रोपाई करती महिलाओं का अभिनय
हिलजात्रा में पहाड़ की कृषि संस्कृति को जिस तरह प्रस्तुत किया जाता है, उसका सबसे जीवंत दृश्य धान की रोपाई से जुड़ा है। महिला पात्र घुटनों तक धोती समेटकर खेत में काम करने वाली महिलाओं का अभिनय करती हैं। पुतरिया यानी धान के पौधों को रोपने का दृश्य इस आयोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।
महिलाएं मिट्टी के ढेले तोड़ती हुई खेत में काम करती दिखाई देती हैं। बीच-बीच में वे खेत के किनारे जाकर अपने बच्चों को स्तनपान कराने और उन्हें सुलाने का अभिनय भी करती हैं। इस दृश्य के माध्यम से पहाड़ की उन महिलाओं के जीवन को दिखाया जाता है, जो घर की जिम्मेदारियों के साथ खेती के कठिन काम में भी बराबर भागीदारी निभाती थीं।
इसी बीच हलिया अपने बैलों को छोड़कर हुक्का पीने बैठ जाता है। महिलाएं कलेवा लेकर खेत में आती हैं और काम कर रहे लोगों को भोजन देती हैं। इन छोटे-छोटे दृश्यों में ग्रामीण जीवन की सहजता और हास्य दोनों दिखाई देते हैं।
हरिण चित्तल भी करता है मनोरंजन
हिलजात्रा के दौरान हरिण चित्तल का पात्र भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रहता है। यह पात्र मैदान में उछल-कूद और अपनी विशेष गतिविधियों से दर्शकों का मनोरंजन करता है।
कृषि कार्यों के गंभीर और मेहनत भरे दृश्यों के बीच हरिण चित्तल और दूसरे स्वांग वातावरण में हास्य और उत्साह भर देते हैं। यही हिलजात्रा की खासियत है कि इसमें धार्मिक आस्था, कृषि संस्कृति और मनोरंजन तीनों एक साथ चलते हैं।
कब होता है लखियाभूत का प्रवेश?
हिलजात्रा के अंतिम चरण में माहौल अचानक बदल जाता है। नगाड़ों की आवाज तेज होने लगती है और दर्शकों को संकेत मिल जाता है कि अब उत्सव का सबसे महत्वपूर्ण पात्र लखियाभूत मैदान में प्रवेश करने वाला है।
लखियाभूत के आने से पहले मैदान को खाली कर दिया जाता है। रोपाई करने वाली महिला पात्रों को छोड़कर लगभग सभी दूसरे पात्र मैदान से बाहर चले जाते हैं। इसके बाद नगाड़ों की गूंज के साथ लखियाभूत का प्रवेश होता है।
लखियाभूत का यह प्रवेश हिलजात्रा के सबसे महत्वपूर्ण और धार्मिक क्षणों में से एक माना जाता है।
कौन है लखियाभूत?
लखियाभूत हिलजात्रा का प्रमुख धार्मिक पात्र है। कुमाऊं में प्रचलित लोकमान्यताओं के अनुसार इसे भगवान शिव का अंश अथवा उनका प्रमुख गण माना जाता है। कई लोग इसे भगवान शिव के गण वीरभद्र का स्वरूप भी मानते हैं।
लखियाभूत का रूप बाकी पात्रों से बिल्कुल अलग होता है। वह काले वस्त्र धारण करता है, उसके लंबे काले बाल होते हैं और हाथों में काले चंवर होते हैं। गले में मोटी रुद्राक्ष की माला होती है। उसके कमर में रस्से बांधे जाते हैं, जिन्हें दो वीर पकड़कर उसके साथ चलते हैं।
जब लखियाभूत मैदान में प्रवेश करता है तो श्रद्धालु उसके सामने फूल और अक्षत अर्पित करते हैं। लोग उससे सुख-समृद्धि और मंगल की कामना करते हैं। मान्यता है कि लखियाभूत अपने आशीर्वाद से लोगों के जीवन में खुशहाली लाता है।
कुछ समय तक मैदान में रहने और श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देने के बाद लखियाभूत बाहर निकल जाता है। इसके साथ ही हिलजात्रा के मुख्य आयोजन का समापन माना जाता है।
हिलजात्रा की शुरुआत कैसे हुई?
हिलजात्रा की शुरुआत किसने की थी? इस सवाल का जवाब इतिहास से ज्यादा स्थानीय जनश्रुतियों और लोककथाओं में मिलता है। पिथौरागढ़ की सोरघाटी में प्रचलित मान्यता के अनुसार हिलजात्रा का संबंध नेपाल में मनाई जाने वाली कुछ पारंपरिक यात्राओं से रहा है।
नेपाल में होने वाली इन्द्रजात्रा, गाईजात्रा, महेन्द्रनाथ रथजात्रा, पंचाली भैरवजात्रा, गुजेश्वरी जात्रा, चकन देवजात्रा, घोड़ाजात्रा और बालजूजात्रा जैसी परंपराओं को हिलजात्रा की पृष्ठभूमि से जोड़ा जाता है।
स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार पिथौरागढ़ में हिलजात्रा की शुरुआत राजा पिथौराशाही के समय नेपाल की इन्द्रजात्रा से लौटे चार महर भाइयों ने कुमौड़ गांव में की थी।
कहा जाता है कि चारों महर भाई बेहद वीर थे। उन्होंने क्षेत्र में आतंक मचा रहे एक नरभक्षी शेर का अंत किया था। उनकी वीरता से प्रभावित होकर राजा ने उन्हें पुरस्कार स्वरूप भूमि प्रदान की।
लोककथा के अनुसार सबसे बड़े भाई कुंवर सिंह कुरमौर को कुमौड़, चहज सिंह को चेंसर, जाखन सिंह को जाखनी और बिण सिंह को बिण क्षेत्र दिया गया। माना जाता है कि इन क्षेत्रों के नाम भी इन्हीं महर भाइयों से जुड़े हुए हैं।
नेपाल की इन्द्रजात्रा से जुड़ी दिलचस्प लोककथा
हिलजात्रा के इतिहास से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथाओं में नेपाल की इन्द्रजात्रा की कहानी भी शामिल है।
कहा जाता है कि एक बार चारों महर भाई नेपाल की इन्द्रजात्रा में शामिल होने गए। वहां बलि के लिए एक बहुत विशाल भैंसा लाया गया था। उसका आकार इतना बड़ा था कि उसकी गर्दन एक ही वार में काटना संभव नहीं हो पा रहा था।
महर भाइयों ने अपनी वीरता और कौशल का परिचय देते हुए नेपाल के राजा से अनुमति मांगी। अनुमति मिलने के बाद उन्होंने कुशलता से भैंसे की गर्दन काट दी।
महर भाइयों की इस वीरता से राजा बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने प्रसन्न होकर उनसे पुरस्कार में अपनी इच्छा के अनुसार कुछ भी मांगने को कहा। लोकमान्यता के अनुसार महर भाइयों ने धन या संपत्ति मांगने के बजाय हिलजात्रा मनाने की अनुमति और पारंपरिक मुखौटे मांगे।
राजा ने उनकी मांग स्वीकार कर ली। इसके बाद कुमौड़ में हिलजात्रा की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है। लोकश्रुति में यह भी माना जाता है कि तभी से आठूं पर्व के अगले दिन हिलजात्रा मनाई जाने लगी।
हिलजात्रा क्यों है खास?
हिलजात्रा की खासियत यह है कि इसमें उत्तराखंड के पहाड़ी जीवन का शायद ही कोई ऐसा पहलू हो, जिसकी झलक न मिलती हो। खेती, पशुपालन, ग्रामीण श्रम, महिलाओं की भूमिका, स्थानीय पेशे, हास्य, लोकगीत, पारंपरिक वाद्य, मुखौटा कला और धार्मिक विश्वास—इन सभी को एक ही आयोजन में देखा जा सकता है।
यह पर्व कुमाऊं की उस पुरानी सामुदायिक संस्कृति को भी सामने लाता है, जहां गांव के लोग मिलकर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन करते थे। कलाकारों के स्वांग और कृषि आधारित अभिनय केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी पुरानी जीवनशैली और परंपराओं से भी परिचित कराते हैं।
आज जब पहाड़ों का पारंपरिक ग्रामीण जीवन तेजी से बदल रहा है, ऐसे में हिलजात्रा जैसी लोकपरंपराएं उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। पिथौरागढ़ की सोरघाटी में हर वर्ष होने वाला यह आयोजन कुमाऊं की लोककला और लोकविश्वास की ऐसी विरासत है, जिसे पीढ़ियों से सहेजकर रखा गया है।
हिलजात्रा 2026 में भी पिथौरागढ़ की धरती पर ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक मुखौटे, कृषि जीवन के स्वांग और अंत में लखियाभूत के दर्शन इस अनूठी लोकपरंपरा को फिर से जीवंत करेंगे।
संदर्भ
उत्तराखंड ज्ञानकोष — प्रो. डी.डी. शर्मा
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