कठउतार: कुमाऊँ की मृत्यु-संस्कार परंपरा : उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल की लोकसंस्कृति में जीवन के प्रत्येक संस्कार से जुड़ी अनेक विशिष्ट परंपराएँ देखने को मिलती हैं। जन्म, विवाह और मृत्यु जैसे अवसरों पर निभाई जाने वाली ये परंपराएँ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि समाज में पारस्परिक सहयोग, सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को भी प्रकट करती हैं। ऐसी ही एक रोचक और कम चर्चित परंपरा है “कठउतार”, जो शवयात्रा में सम्मिलित होने वाले लोगों से जुड़ी हुई है।
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क्या है कठउतार ?
कुमाऊँ क्षेत्र में किसी व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले लोगों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए जिस परंपरा का पालन किया जाता है, उसे कठउतार कहा जाता है। यह परंपरा मृतक के परिवार और शवयात्रा में शामिल लोगों के बीच सामाजिक और भावनात्मक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम मानी जाती है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, अंतिम यात्रा में सम्मिलित होकर लोग मृतक और उसके परिवार के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हैं। इसलिए परिवार पर उनका एक प्रकार का ऋण माना जाता है, जिसे उतारना आवश्यक समझा जाता है। इसी ऋण-मुक्ति की भावना से “कठउतार” की परंपरा विकसित हुई है।
कठउतार की प्रक्रिया
जब शवदाह संपन्न हो जाता है और शवयात्री स्नान आदि करके लौटते हैं, तब उन्हें गुड़, मिठाई या अन्य मिष्ठान दिया जाता है। यह केवल प्रसाद नहीं होता, बल्कि शवयात्रा में शामिल होने के लिए सम्मान और आभार का प्रतीक माना जाता है।यदि कोई व्यक्ति उस समय मिष्ठान ग्रहण नहीं कर पाता, तो उसके लिए यह अपेक्षा की जाती है कि वह मृतक की शुद्धि के अवसर पर आयोजित होने वाले बारहवें दिन के पीपलपानी संस्कार में अवश्य सम्मिलित हो।
पीपलपानी और कठउतार
कुमाऊँ में मृत्यु के बारहवें दिन संपन्न होने वाले शुद्धिकरण संस्कार को पीपलपानी कहा जाता है। इस अवसर पर विशेष भोजन बनाया जाता है और सामाजिक रूप से मृतकाशौच की समाप्ति मानी जाती है।
कई क्षेत्रों में एक विशेष परंपरा का पालन किया जाता है, जिसमें पीपलपानी के दिन बने हुए हलवे को पत्ते में रखकर उन सभी घरों तक पहुँचाया जाता है, जिनके सदस्य शवयात्रा में शामिल हुए थे। कहीं-कहीं हलवे के स्थान पर बूंदी का एक लड्डू दिया जाता है।
विशेष बात यह है कि यह प्रसाद केवल वही व्यक्ति ग्रहण करता है जिसने शवयात्रा में भाग लिया था। परिवार के अन्य सदस्य इसे नहीं खाते। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह परंपरा सीधे उस व्यक्ति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए है जिसने अंतिम यात्रा में सहभागिता की थी।
कठउतार के पीछे की लोकमान्यता –
कठउतार के पीछे एक गहरी सामाजिक धारणा कार्य करती है। माना जाता है कि शवयात्रा में सम्मिलित होने वाले लोगों का मृतक के परिवार पर एक नैतिक ऋण होता है। अंतिम संस्कार जैसे कठिन समय में समाज का साथ देना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए परिवार इस सहयोग के प्रति अपना आभार व्यक्त करने के लिए कठउतार करता है।
यह परंपरा कुमाऊँ की उस सामुदायिक संस्कृति को दर्शाती है जिसमें सुख-दुःख को साझा करना सामाजिक जीवन का अनिवार्य अंग माना जाता है।
काठडाली और कठेरू: स्थानीय शब्दावली
कुमाऊँ की इस परंपरा से जुड़े कुछ विशिष्ट स्थानीय शब्द भी प्रचलित हैं।
- काठडाली – शव की चिता में अर्पित किए जाने वाले लकड़ी के टुकड़ों को काठडाली कहा जाता है।
- कठेरू– शवयात्रा में सम्मिलित होने वाले व्यक्तियों को स्थानीय भाषा में कठेरू कहा जाता है।
इन्हीं शब्दों से “कठउतार” शब्द की उत्पत्ति मानी जाती है, जिसका अर्थ है शवयात्रा में शामिल लोगों के प्रति कृतज्ञता और सामाजिक दायित्व का निर्वहन करना।
सांस्कृतिक महत्व –
आज के समय में जब पारंपरिक लोकरीतियाँ धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं, तब कठउतार जैसी परंपराएँ हमें कुमाऊँ की सामुदायिक चेतना और मानवीय संवेदनाओं की याद दिलाती हैं। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि समाज में परस्पर सहयोग, सम्मान और संबंधों की मजबूती का प्रतीक है।
कठउतार हमें यह सिखाता है कि जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी समाज व्यक्ति और परिवार के साथ खड़ा रहता है, और उस सहयोग का सम्मान करना हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
निष्कर्ष
कठउतार कुमाऊँ की लोकसंस्कृति की एक अनूठी परंपरा है, जो अंतिम संस्कार से जुड़े सामाजिक दायित्वों और मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती है। शवयात्रा में शामिल लोगों के प्रति आभार व्यक्त करने की यह प्रथा न केवल कुमाऊँ की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है, बल्कि समाज में सहयोग और आत्मीयता की भावना को भी जीवित रखती है। यही कारण है कि कठउतार आज भी कुमाऊँ की लोकपरंपराओं में एक विशेष स्थान रखता है।
शौशकार देना या अंतिम हयोव देना ,कुमाउनी मृतक संस्कार से संबंधित परंपरा
