सातों-आठूं 2026 कब है? उत्तराखंड के कुमाऊं और खासकर सीमांत पिथौरागढ़ क्षेत्र में मनाया जाने वाला प्रसिद्ध लोकपर्व सातों-आठूं (गौरा-महेश्वर पूजन) इस वर्ष 19 और 20 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। 19 अगस्त को सातों यानी सप्तमी और 20 अगस्त को आठूं यानी अष्टमी/दुर्वाष्टमी के रूप में पर्व की प्रमुख पूजा होगी। इससे पहले 17 अगस्त 2026 को बिरुड़ पंचमी से पर्व की तैयारियां शुरू होंगी। उपलब्ध पंचांग गणनाओं में 19 अगस्त को शुक्ल सप्तमी और 20 अगस्त को अष्टमी पड़ रही है।
उत्तराखंड के लोकपर्व केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें रिश्तों, प्रकृति, कृषि, लोकगीत, लोकनृत्य और सामुदायिक जीवन की सुंदर झलक दिखाई देती है। सातों-आठूं पर्व भी ऐसा ही अनूठा लोकपर्व है, जिसमें भगवान शिव और माता पार्वती को मानवीय रिश्ते में बांधकर भिनज्यू यानी जीजा और गमरा दीदी यानी बहन के रूप में पूजा जाता है।
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सातों-आठूं 2026 कब है?
सातों-आठूं पर्व 2026 की प्रमुख तिथियां इस प्रकार हैं:
- 17 अगस्त 2026 को बिरुड़ पंचमी
- 18 अगस्त 2026 को पर्व की तैयारियां
- 19 अगस्त 2026 को सातों मनाया जाएगा।
- 20 अगस्त 2026 को आठूं पर्व मनाया जाएगा।
19 अगस्त को सप्तमी तिथि और 20 अगस्त को अष्टमी तिथि पड़ रही है। क्षेत्रीय परंपराओं में पर्व की रस्मों और नामों में कुछ स्थानीय अंतर भी देखने को मिलते हैं।
सातों-आठूं क्या है?
सातों-आठूं उत्तराखंड के कुमाऊं के सीमांत क्षेत्रों, विशेषकर पिथौरागढ़ और आसपास के क्षेत्रों में मनाया जाने वाला प्रमुख लोकपर्व है। इसे कहीं सांतू-आंठू, कहीं सातों-आठूं, तो कहीं गौरा-महेश्वर पर्व और गमरा पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
‘सातों-आठूं’ नाम सप्तमी और अष्टमी से जुड़ा हुआ है। इस पर्व की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि इसमें भगवान शिव को भिनज्यू यानी जीजा और माता पार्वती को गमरा दीदी यानी बहन के रूप में देखा और पूजा जाता है।लोकमान्यता के अनुसार माता गौरा यानी पार्वती अपने पति महेश्वर यानी भगवान शिव से रूठकर मायके आती हैं। बाद में महेश्वर उन्हें मनाने और वापस ससुराल ले जाने आते हैं। इसी भाव को एक बेटी और दामाद के पारिवारिक रिश्ते की तरह मनाया जाता है।
यही वजह है कि सातों-आठूं केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भाई-बहन, बेटी-दामाद और मायके-ससुराल के रिश्तों की भावनाओं से जुड़ा लोकउत्सव भी है।
बिरुड़ पंचमी से शुरू होती है सातों-आठूं की तैयारी
सातों-आठूं पर्व की शुरुआत बिरुड़ पंचमी से मानी जाती है। वर्ष 2026 में बिरुड़ पंचमी 17 अगस्त को मनाई जाएगी। इस दिन विशेष रूप से बिरुड़ तैयार करने की परंपरा है। एक साफ तांबे के पात्र में गाय के गोबर से पंच चिह्न बनाए जाते हैं। इसके बाद दूब और अक्षत अर्पित कर उसमें पांच या सात प्रकार के अनाज भिगोए जाते हैं।
इन अनाजों में स्थानीय परंपरा के अनुसार गेहूं, चना, सोयाबीन, उड़द, मटर, गहत और क्ल्यू के बीज आदि शामिल किए जाते हैं। इन्हीं अनाजों को स्थानीय भाषा में बिरुड़ कहा जाता है। सातों के दिन इन्हें जलस्रोत पर धोया जाता है और आठूं के दिन गौरा-महेश्वर को अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
सातों के दिन सजाई जाती हैं गमरा दीदी
19 अगस्त 2026 यानी सातों के दिन महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा की तैयारियां करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं प्राकृतिक जलस्रोत या नौले-धारे पर जाकर बिरुड़ धोने की परंपरा निभाती हैं।
इस दौरान पांच स्थानों पर अक्षत अर्पित किए जाते हैं और मंगल गीत गाते हुए बिरुड़ को धोकर घर लाया जाता है।
इसके बाद गमरा दीदी यानी माता पार्वती का श्रृंगार किया जाता है। गमरा की आकृति तैयार करने के लिए धान के खेतों से सौं और धान के पौधे लाने की परंपरा है। इन पौधों से डलिया में गमरा दीदी को सजाया जाता है।
महिलाएं लोकगीत गाते हुए गमरा को उस स्थान पर ले जाती हैं, जहां सामूहिक पूजा का आयोजन होता है। बिरुड़ से गौरा की पूजा की जाती है। सुहागिन महिलाएं अखंड सौभाग्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं पीली डोर धारण करती हैं।पूजा के साथ-साथ कुमाऊंनी लोकगीत, झोड़ा, चांचरी और अन्य लोकनृत्यों का आयोजन भी होता है।
आठूं के दिन भिनज्यू महेश्वर आते हैं गमरा दीदी को मनाने
20 अगस्त 2026 यानी आठूं के दिन सातों-आठूं पर्व का सबसे भावनात्मक चरण आता है। इस दिन खेतों से सौं और धान के पौधे लाकर भिनज्यू महेश्वर यानी भगवान शिव की आकृति तैयार की जाती है। लोकगीतों और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ महेश्वर को गमरा दीदी के साथ स्थापित किया जाता है लोकमान्यता है कि इस दिन महेश्वर अपनी रूठी हुई पत्नी गौरा को मनाने उनके मायके आते हैं।
पूजा के दौरान बिरुड़ अर्पित किए जाते हैं और कई स्थानों पर महिलाओं द्वारा बिरुड़ अष्टमी की कथा सुनाई जाती है।यह पूरा आयोजन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य स्वरूप को एक पारिवारिक रिश्ते में देखने की उत्तराखंड की अनूठी लोकपरंपरा को दर्शाता है।
बिरुड़ अष्टमी की प्रसिद्ध लोककथा :
सातों-आठूं से जुड़ी बिरुड़ अष्टमी की कथा भी इस पर्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोककथा के अनुसार एक गांव में एक बुजुर्ग दंपति रहते थे। उनके सात पुत्र और सात बहुएं थीं, लेकिन किसी भी बहू को संतान नहीं थी। एक दिन बुजुर्ग व्यक्ति ने कुछ महिलाओं को बिरुड़ धोते हुए देखा। पूछने पर उसे पता चला कि वे गौरा-महेश्वर के लिए बिरुड़ की पूजा की तैयारी कर रही हैं। वह घर लौटकर अपनी पत्नी को सातों-आठूं और बिरुड़ अष्टमी की पूरी जानकारी देता है। इसके बाद घर में भी बिरुड़ का विधान करने का निर्णय लिया जाता है।
एक-एक करके बहुओं को बिरुड़ भिगोने के लिए बुलाया जाता है, लेकिन किसी न किसी कारण से सभी से पूजा-विधान में गलती हो जाती है। अंत में सबसे छोटी और उपेक्षित सातवीं बहू को बुलाया जाता है। वह स्नान करके पूरे विधि-विधान से बिरुड़ तैयार करती है। लोककथा में आगे बताया जाता है कि कुछ समय बाद वह बहू गर्भवती होती है और उसे पुत्र की प्राप्ति होती है।
लेकिन सास उससे नाराज रहती है। वह बच्चे के भविष्य को लेकर एक पंडित से पूछने के बहाने गलत बात कहलवाती है और बच्चे को अशुभ बताकर उसके पति को भी भ्रमित कर देती है। आखिरकार बच्चे को एक नौले में छोड़ दिया जाता है।
उधर बहू अपने मायके से लौटते समय रास्ते में सरसों के दाने डालती जाती है और लोकविश्वास के अनुसार वे हरे हो जाते हैं। नौले के पास पहुंचने पर जब वह पानी में उतरती है, तो उसका बच्चा सातों-आठूं की पीली डोर पकड़ लेता है। वह अपने बच्चे को सुरक्षित वापस लेकर ससुराल लौट आती है। जब सास को इस चमत्कार का पता चलता है तो उसे अपनी गलती का एहसास होता है। वह बहू से क्षमा मांगती है। इस कथा का मूल संदेश सच्चे कर्म, श्रद्धा, भलाई और विश्वास की शक्ति से जुड़ा हुआ है।
कथा समाप्त होने के बाद बिरुड़ पकाकर प्रसाद बनाया जाता है। इसे पहले गौरा-महेश्वर को अर्पित किया जाता है और फिर परिवार तथा आसपास के लोगों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
सातों-आठूं में होती है लोकगीत और लोकनृत्य की धूम
सातों-आठूं पर्व की खूबसूरती केवल पूजा में नहीं बल्कि इसके सामूहिक उत्सव में भी दिखाई देती है। पर्व के दौरान गांवों में शाम के समय महिलाएं और पुरुष एकत्र होते हैं। कुमाऊंनी लोकगीत, झोड़ा, चांचरी और अन्य पारंपरिक लोकनृत्यों के साथ पूरा वातावरण उत्सवमय हो जाता है।
इन गीतों में देवी-देवताओं के साथ-साथ मायके, ससुराल, भाई-बहन, बेटी और दामाद के रिश्तों की भावनाएं भी दिखाई देती हैं। इस तरह सातों-आठूं नई पीढ़ी को अपनी लोकभाषा, लोकगीत, लोकनृत्य और सामाजिक परंपराओं से जोड़ने का भी काम करता है।
सातों-आठूं में होती है फौल फटकना की रस्म
सातों-आठूं की पारंपरिक रस्मों में फौल फटकना भी विशेष महत्व रखता है।इस रस्म में एक बड़े कपड़े के बीच बिरुड़ और फल रखे जाते हैं। कपड़े को दोनों तरफ से पकड़कर ऊपर उछाला जाता है। विवाहित महिलाएं और कुंवारी कन्याएं अपना आंचल फैलाकर इन फलों और बिरुड़ को समेटने का प्रयास करती हैं। लोकविश्वास के अनुसार जिसके आंचल में फल या प्रसाद आता है, उसके लिए इसे सौभाग्य और संतान सुख का शुभ संकेत माना जाता है। यह रस्म पर्व के आनंद और सामूहिक सहभागिता को और बढ़ा देती है।
गमरा और महेश्वर की होती है विदाई :
सातों-आठूं के उत्सव के बाद वह भावुक समय आता है जब गमरा दीदी और भिनज्यू महेश्वर की विदाई की जाती है। जिस तरह बेटी और दामाद के ससुराल लौटने पर मायके में भावुक माहौल होता है, उसी तरह लोकगीतों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के बीच गौरा-महेश्वर को विदा किया जाता है।
कई स्थानों पर गौरा-महेश्वर की प्रतिमाओं को स्थानीय परंपरा के अनुसार विसर्जित किया जाता है। इसे कुछ क्षेत्रों में सिवाना या सिला देना जैसी रस्मों से भी जोड़ा जाता है। इस विदाई में एक ओर बेटी के मायके से जाने का भाव होता है, तो दूसरी ओर अगले वर्ष फिर गमरा दीदी के मायके आने की प्रतीक्षा भी रहती है। पिथौरागढ़ के कुछ क्षेत्रों में सातों-आठूं के बाद हिलजात्रा जैसे लोकपर्वों का आयोजन भी देखने को मिलता है।
सातों-आठूं पर्व का धार्मिक और सामाजिक महत्व :
सातों-आठूं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देवी-देवताओं को केवल पूजनीय शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि अपने परिवार के सदस्य और रिश्तेदार के रूप में देखा जाता है। माता पार्वती को बेटी या दीदी और भगवान शिव को भिनज्यू यानी जीजा मानकर उनका स्वागत, श्रृंगार, पूजा और विदाई की जाती है। इससे पर्व में धार्मिक आस्था के साथ-साथ मानवीय रिश्तों की आत्मीयता भी जुड़ जाती है।
बिरुड़ में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न अनाज इस पर्व को कृषि और प्रकृति से भी जोड़ते हैं। खेतों से धान और सौं के पौधे लाना, प्राकृतिक जलस्रोत पर बिरुड़ धोना और स्थानीय अनाजों को प्रसाद के रूप में ग्रहण करना उत्तराखंड की कृषि संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
उत्तराखंड की संस्कृति में क्यों खास है सातों-आठूं?
उत्तराखंड के लोकपर्वों की सबसे बड़ी खूबी उनकी सामुदायिक भावना है। सातों-आठूं भी गांव के लोगों को एक साथ जोड़ने वाला पर्व है। इसमें महिलाएं प्रमुख भूमिका निभाती हैं और पूजा के साथ लोकगीत तथा लोकनृत्य के माध्यम से अपनी संस्कृति को जीवंत रखती हैं। आज जब पहाड़ों से बड़ी संख्या में लोग रोजगार और शिक्षा के लिए दूसरे शहरों में जा रहे हैं, ऐसे लोकपर्व अपनी जड़ों, लोकभाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने का माध्यम भी बन रहे हैं। सातों-आठूं हमें यह संदेश देता है कि हमारी संस्कृति केवल मंदिरों और धार्मिक ग्रंथों में नहीं, बल्कि हमारे रिश्तों, गीतों, खेतों, जलस्रोतों और सामूहिक जीवन में भी जीवित रहती है।
सातों-आठूं 2026 की शुभकामनाएं :
गौरा दीदी और भिनज्यू महेश्वर का आशीर्वाद सभी के जीवन में सुख, समृद्धि, सौभाग्य और खुशियां लेकर आए। सातों-आठूं के इस पावन लोकपर्व पर सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
उत्तराखंड की यह अनूठी परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक इसी तरह जीवंत रहे और हमारी लोकसंस्कृति, लोकभाषा, लोकगीत और लोकनृत्य हमेशा समृद्ध होते रहें। जय गमरा दीदी। जय भिनज्यू महेश्वर। सातों-आठूं पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
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