Khatarua Festival 2026:क्या खतड़वा सच में कुमाऊं की गढ़वाल पर जीत का त्योहार है?
यह सवाल इसलिए उठता है क्योंकि खतड़वा के साथ एक ऐसी कहानी लंबे समय से सुनाई जाती रही है, जिसमें कुमाऊं और गढ़वाल के दो सेनापतियों के बीच हुए युद्ध और जीत-हार का जिक्र मिलता है। लेकिन खतड़वा की पुरानी परंपराओं को करीब से देखें तो इसकी तस्वीर कुछ और नजर आती है।
Khatarua Festival 2026 में 17 सितंबर को मनाया जाएगा। यह दिन कन्या संक्रांति का है। कुमाऊं में मनाया जाने वाला यह लोकपर्व वर्षा ऋतु के समाप्त होने और शरद ऋतु के आगमन के समय आता है। इसकी परंपराओं में पशुओं की देखभाल, गोठ की सफाई, हरी घास खिलाना और अग्नि के जरिए अनिष्ट से बचाव की कामना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
इसलिए खतड़वा को केवल किसी पुरानी लड़ाई की जीत का पर्व मानना इसके व्यापक लोक अर्थ को सीमित कर देता है। यह पर्व पहाड़ के उस जीवन से जुड़ा दिखाई देता है, जहां मौसम बदलने के साथ इंसान के साथ-साथ उसके पशुधन की चिंता भी बदलती थी।
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Khatarua Festival 2026 कब है?
Khatarua Festival 2026 यानी खतड़वा पर्व 17 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।
यह कन्या संक्रांति का दिन है। उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में संक्रांतियों का संबंध मौसम और ऋतु परिवर्तन से भी रहा है। वर्षा ऋतु के बाद शरद और फिर धीरे-धीरे ठंड का मौसम आने लगता है। ऐसे समय में पशुओं के लिए चारे, रहने की जगह और स्वास्थ्य की चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती थी। खतड़वा इसी बदलते मौसम के बीच आने वाला लोकपर्व है।
खतड़वा को गैत्यार क्यों कहा जाता है?
कुमाऊं में खतड़वा को कुछ स्थानों पर गैत्यार या गाईत्यार भी कहा जाता है। इसका संबंध पशुओं से माना जाता है।
पर्व के दिन पशुओं की खास देखभाल की जाती है। उन्हें हरी और पौष्टिक घास खिलाई जाती है। गोठ की सफाई की जाती है और पशुओं के स्वस्थ रहने की कामना की जाती है। यह बात अपने आप में इस पर्व की प्रकृति समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है। अगर इसका मूल उद्देश्य सिर्फ किसी युद्ध की जीत का जश्न होता, तो पशुओं की देखभाल से जुड़ी इतनी सारी परंपराएं इसके केंद्र में क्यों होतीं?
खतड़वा के दिन क्या किया जाता है?
सुबह घर की सफाई से दिन की शुरुआत होती है। पशुओं के गोठ को भी साफ किया जाता है और उन्हें भरपेट हरा चारा दिया जाता है।
शाम को खतड़वा की परंपरा शुरू होती है। लंबी-पतली छड़ियों के सिरों पर कांस या दूसरे फूलों के गुच्छे बांधे जाते हैं। मशाल के साथ शाम को गाय के गौशाले कांस और फूल से बनी छड़ियों को घुमा कर लाया जाता है। इसके पीछे यह मान्यता होती है कि गाय के गौशाले में जो भी नकारात्मक शक्तियां होंगी वे कांस और फूल की छड़ी के साथ बाहर आ जाएंगी। फिर उन्हें रस्ते के तिराहे या चौराहे पर ले जाया जाता है । वहां पहले से घास फूस का ढेर रखा होता है। फिर उस घास-फूस से बने ढेर को आग लगाई जाती है।
आग जलने के बाद लोग उसके आसपास घूमते हैं, कांस ,फूल की छड़ियों से आग पर प्रहार किया जाता है। और भैलो खतडुवा भैलो ! गाय की जीत खतङुवा की हार की पंक्तियां गाई जाती हैं। हैं। आग बुझने के बाद उसे लांघने की परंपरा भी रही है। इसका अर्थ यह है कि ,कांस की डंडो के साथ जो भी नकारात्मक शक्तियां आई होती हैं उन्हें अग्नि में समर्पित करके खत्म कर दिया जाता है। और फिर उस आग को लांघ कर पैर से दबाने का सांकेतिक परंपरा निभाई जाती हैं। इसके पीछे यह विश्वास होता है कि, आने वाला जाड़ा परेशान नहीं करता है।
इसके बाद मौसम में मिलने वाले खास फल खीरे को तोड़कर परिवार और गांव के लोगों में बांटकर खाने की परंपरा है। पशुचारक समुदायों में खीरे को पशुओं को बांधने वाली लंबी खूंटी यानी दौंणी पर मारकर तोड़ने की परंपरा भी बताई जाती है।
आग और राख का क्या मतलब है?
खतड़वा की आग से जुड़ी मान्यता भी काफी दिलचस्प है। आग को शांत करने के बाद इस्तेमाल की गई छड़ियों को जलाकर पशुओं के रहने के स्थान के आसपास घुमाया जाता है। लोकविश्वास था कि इस तरह पशुओं को होने वाले रोग और उन्हें नुकसान पहुंचाने वाली बुरी शक्तियां दूर हो जाएंगी।
कई इलाकों में बूढ़ी और बूढ़े की परंपरा भी मिलती है। कांस के फूलों से बनाई गई बूढ़ी को खतड़वा के साथ जलाया जाता है। बाद में उसकी राख का तिलक लगाया जाता है और पशुओं के माथे पर भी राख लगाई जाती है। मान्यता थी कि बूढ़ी और खतड़वा के साथ पशुओं के सारे अनिष्ट भी भस्म हो गए।
आज इन मान्यताओं को हम लोकविश्वास के रूप में देखते हैं, लेकिन इनमें उस पुराने पहाड़ी समाज की चिंता साफ दिखाई देती है , पशु स्वस्थ रहें और बदलते मौसम में सुरक्षित रहें।
लोकगीतों में छिपी है खतड़वा की असली तस्वीर
खतड़वा के साथ जुड़े लोकगीत इस पर्व को समझने में खास मदद करते हैं महिलाओं के गीतों में गायों के लिए अलग-अलग तरह की मुलायम और पौष्टिक घास लाने का जिक्र मिलता है। औंसू, बेटुलो और गरगिलो जैसी घासों के नाम लेकर गाय के लिए अच्छा चारा जुटाने की बात कही जाती है। साथ ही घर के स्वामी की लंबी उम्र और परिवार के सुख-समृद्धि की कामना भी की जाती है।
इससे पता चलता है कि खतड़वा सिर्फ शाम को आग जलाने का पर्व नहीं था। इसके पीछे पूरे दिन चलने वाली पशुधन की देखभाल और परिवार की खुशहाली की कामना जुड़ी हुई थी।
क्या Khatarua Festival कुमाऊं की जीत का उत्सव है?
खतड़वा के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल को लेकर होती है। एक प्रचलित कहानी के अनुसार कुमाऊं के सेनापति गैड़ा सिंह ने गढ़वाल के सेनापति खतड़ सिंह को युद्ध में हरा दिया था। कहा जाता है कि इसी विजय की खुशी में खतड़वा पर्व शुरू हुआ।
लेकिन इस कहानी को खतड़वा की मूल उत्पत्ति मानने के लिए ऐतिहासिक प्रमाण स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए इसे निश्चित इतिहास की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।
यह संभव है कि किसी समय इस तारीख के आसपास हुई कोई युद्ध संबंधी घटना बाद में लोककथा के रूप में पर्व से जुड़ गई हो। लेकिन खतड़वा की मूल परंपराओं को देखें तो उनका संबंध पशुधन, अग्नि, ऋतु परिवर्तन और स्वास्थ्य से ज्यादा दिखाई देता है।
प्राचीन समय में अलग-अलग पहाड़ी रियासतों और राजाओं के बीच युद्ध होते रहे। किसी युद्ध में हुई जीत को बाद में किसी लोकपर्व से जोड़ दिया जाना संभव है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उस पर्व का मूल उद्देश्य ही आपसी वैमनस्य रहा हो।
खतड़वा का संबंध ऋतु परिवर्तन से क्यों माना जाता है?
प्रोफेसर देवीदत्त शर्मा ने उत्तराखंड ज्ञानकोष में खतड़वा को मूल रूप से पशुचारक वर्ग का ऋतुपर्व माना है। उनके अनुसार संक्रांति के दिन इसका आयोजन, पशुओं के रहने के स्थान पर इसका मनाया जाना और अग्नि से वहां झाड़ा किए जाने जैसी परंपराएं इसे वर्षाकाल की समाप्ति और शीतकाल के आगमन से जोड़ती हैं।
यानी खतड़वा को समझने के लिए पहाड़ के पुराने पशुपालक जीवन को समझना जरूरी है।
बरसात में पशुओं को कई तरह की परेशानियां होती थीं। मौसम बदलने के साथ उनके रहने की जगह की सफाई, चारे की व्यवस्था और स्वास्थ्य का ध्यान रखना जरूरी था। ऐसे में एक ऐसा लोकपर्व विकसित होना स्वाभाविक था, जिसमें पशुधन की सलामती के लिए सामूहिक रूप से कामना की जाए।
इसी तरह के पर्व नेपाल और नेपालियों से जुड़े क्षेत्रों के अलावा दार्जिलिंग और सिक्किम में भी मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। यह बात भी खतड़वा को केवल कुमाऊं-गढ़वाल के किसी पुराने संघर्ष से जोड़कर देखने के बजाय उसके व्यापक हिमालयी संदर्भ को समझने की ओर इशारा करती है।
Khatarua Festival Wishes 2026 –
खतड़वा सिर्फ एक पुरानी परंपरा की याद नहीं है। आज भी यह उन लोगों के लिए भावनाओं से जुड़ा पर्व है, जिनका रिश्ता पहाड़, पशुधन और अपनी लोकसंस्कृति से है।
इस Khatarua Festival 2026 पर अपने परिवार, दोस्तों और पहाड़ से जुड़े लोगों को आप इस तरह शुभकामनाएं दे सकते हैं—
“खतड़वा की पावन अग्नि आपके घर-आंगन से हर अनिष्ट दूर करे। पशुधन स्वस्थ रहे, खेत-खलिहान हरे-भरे रहें और आपके परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे। आप सभी को Khatarua Festival 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं।”
या फिर एक छोटी शुभकामना:
“प्रकृति, पशुधन और पहाड़ की लोकपरंपरा को समर्पित खतड़वा पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। भगवान सभी के घर में सुख, शांति और समृद्धि बनाए रखें। Happy Khatarua Festival 2026!”
खतड़वा की आग में जीत-हार से बड़ी कहानी है।
खतड़वा के साथ जुड़ी कुमाऊं-गढ़वाल वाली कहानी अपनी जगह एक लोककथा हो सकती है, लेकिन इसे ही इस पर्व का पूरा सच मान लेना शायद ठीक नहीं होगा।
इस पर्व की पुरानी परंपराएं कुछ और कहती हैं।
यहां पशुओं को हरी घास खिलाई जाती है।
गोठ साफ किया जाता है।
अग्नि जलाई जाती है।
पशुओं के स्वास्थ्य की कामना की जाती है।
और बदलते मौसम का स्वागत किया जाता है।
इसलिए Khatarua Festival 2026 को सिर्फ किसी की जीत और किसी की हार की कहानी से जोड़ने के बजाय इसे पहाड़ के उस जीवन की परंपरा के रूप में देखना ज्यादा सार्थक है, जहां इंसान और पशुधन एक-दूसरे के सहारे थे।
खतड़वा की आग शायद किसी इंसान के खिलाफ नहीं थी। वह उन बीमारियों, अनिष्ट और कठिनाइयों को दूर करने की लोककामना थी, जिनसे पहाड़ का परिवार और उसका पशुधन आने वाले मौसम में बचा रहे।
इसी भावना के साथ—
खतड़वा पर्व 2026 की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
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