सौकार और सौन्याई / स्योंकार और स्योंनाई: कुमाऊंनी जागर परंपरा में सम्मान के पारिभाषिक शब्द
कुमाऊं की लोकपरंपराओं में जागर केवल लोकदेवताओं की आराधना का माध्यम नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ी अपनी एक विशिष्ट पारिभाषिक भाषा भी है। जागर के दौरान डंगरिया, यानी देवता के अवतरण का माध्यम माने जाने वाले व्यक्ति द्वारा आराधक परिवार के कुछ सदस्यों को विशेष संबोधन दिए जाते हैं। इन्हीं संबोधनों में स्योंकार, स्योंनाई, सौकार और सौन्याई जैसे शब्द प्रमुख हैं।
इन शब्दों का प्रयोग मुख्य रूप से उस परिवार के वरिष्ठतम दंपती को संबोधित करने के लिए किया जाता है, जिसके घर में जागर का आयोजन किया जा रहा हो। कुमाऊंनी लोकमान्यता में इन्हें सामान्य संबोधन की तरह नहीं, बल्कि देवता की सेवा और आराधना से जुड़े सम्मानसूचक शब्दों के रूप में देखा जाता है।
लोकव्युत्पत्ति के अनुसार स्योंकार’ का अर्थ सेवा करने वाला और ‘स्योंनाई’ का अर्थ देवता की सेवा करने वाली महिला माना जाता है। इसलिए इन संबोधनों में केवल उम्र या पारिवारिक वरिष्ठता का भाव नहीं, बल्कि देवता की सेवा और आराधना से जुड़ी भूमिका का संकेत भी मिलता है।
हालांकि इन शब्दों का प्रयोग केवल जागर कराने वाले परिवार के सदस्यों तक सीमित नहीं रहता। जागर के दौरान यदि कोई व्यक्ति अपने घर से लाए हुए चावल, जिन्हें ‘दानी’ कहा जाता है, डंगरिया के सामने रखकर अपने रोग, कष्ट, शोक या किसी अन्य परेशानी के कारणों के बारे में जानना चाहता है, तो ऐसे जिज्ञासुओं के लिए भी इन संबोधनों का इस्तेमाल किया जाता है।
जागर की पारंपरिक प्रक्रिया में दानी के रूप में लाए गए चावल को डंगरिया के सामने प्रस्तुत करना एक महत्वपूर्ण लोकाचार माना जाता है। मान्यता यह होती है कि इनके माध्यम से व्यक्ति अपनी समस्या या कष्ट से जुड़े कारणों के बारे में देवता से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहता है। इसके बाद डंगरिया के माध्यम से समस्या के कारण और उसके निवारण से जुड़े उपाय बताए जाने की लोकपरंपरा रही है।
इस तरह स्योंकार और स्योंनाई केवल कुमाऊंनी भाषा के सामान्य शब्द नहीं हैं। ये जागर की उस पारंपरिक शब्दावली का हिस्सा हैं, जिसमें देवता, डंगरिया, आराधक परिवार और अपनी समस्याओं का समाधान जानने आए लोगों के बीच संबंधों को संबोधित करने का एक विशेष तरीका विकसित हुआ है।
इन शब्दों के पीछे कुमाऊं की लोकभाषा, धार्मिक आस्था और जागर की सामाजिक परंपरा तीनों एक साथ दिखाई देती हैं। यही कारण है कि कुमाऊं के पारंपरिक जागरों को समझने के लिए उनके गीतों और अनुष्ठानों के साथ-साथ ऐसी लोक शब्दावली को समझना भी जरूरी है।
कुमाऊनी जागर परंपरा के बारे में जानिए विस्तार से।
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