Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

सुरकंडा देवी मंदिर उत्तराखंड राज्य में टिहरी जिले के ,विकासखंड जौनपुर के ग्राम कद्दूखाल के पास सुरकूट नामक ऊँचे पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर समुद्रतल से 3030 मीटर ऊँचाई पर स्थित है। https://youtu.be/2Sh8dq4UgNM सुरकंडा माता का यह प्रसिद्ध सिद्धपीठ मसूरी से लगभग 40 किलोमीटर और चंबा से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सुरकंडा देवी ,उत्तराखंड के सबसे ऊँचे शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है।इस मंदिर से उत्तर में त्रिशूल पर्वत, चौखंबा, नंदादेवी,बद्री केदार और गंगोत्री यमुनोत्री के शिखरों के भव्य दर्शन होते हैं। यहाँ से दून घाटी, मसूरी , नई टिहरी, चम्बा,कुंजापुरी,और चन्द्रबदनी के दर्शन भी होते…

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देहरादून में 4 सिद्ध प्रसिद्ध हैं। और इन 4 सिद्धों के चार मंदिर या पीठ देहरादून के 4 कोनो में स्थापित हैं। देहरादून के 4 सिद्धों में , लक्ष्मण सिद्ध , कालू सिद्ध, मानक सिद्ध, मांडुसिद्ध हैं। इनमें से इस लेख में हम लक्ष्मण सिद्ध  के बारे में बताएंगे। देहरादून से 12 किलोमीटर दूर ऋषिकेश मार्ग पर स्थित लक्ष्मण सिद्ध मंदिर , लक्ष्मण बाबा के भक्तों के लिए आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। ऐसी मान्यता है, कि भगवान दत्तात्रेय ने लोककल्याण के लिए अपने 84 शिष्य बनाये थे। और उन्हें अपनी सभी शक्तियां प्रदान की थी। कालांतर में…

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यदि आप  बेस्ट कुमाऊनी गीत ढूढ़ रहे हैं तो, टीम घुघुती जागर का यह गीत बेस्ट कुमाऊनी गीत के सभी मापदंडों पर खरा उतरता है। सिंतबर 2021, में ओहो रंगमंच के मंच से रिलीज हुवा यह गीत आज भी  लोगों को काफी पसंद है। अभी तक यूटयूब में ऐसे लाखों लोग अपना प्यार दे चुके हैं। आपूण मन मा पहाड़ ल्या रायूं, जी हां दोस्तों टीम घुघुती जागर का बहुप्रतीक्षित कुमाऊनी गीत आज ओहो रेडियो स्टेशन से रिलीज हो गया। इस लेख में हम आपको टीम घुघुती जागर के इस शुद्ध गीत के बारे में बताएंगे और इस गीत का…

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दोस्तो हमारी कुमाउनी संस्कृति, पहाड़ी संस्कृति और पहाड़ी परम्पराओ का मूल आधार आपसी एकता और सहयोग की भावना है। इसी भावना से निहित होकर हम अपनी सांस्कृतिक परम्पराओ का निर्वहन करते हैं। विगत समय मे हमारी कुमाउनी संस्कृति, पहाड़ी संकृति में एकता आपसी सहयोग और मिलजुल कर रहने के व्यवहार में कमी आ रही है। जिसका मूल कारण, शहरी समाज के रहन सहन को अपनाना और उससे भी बड़ा कारण पलायन है। अल्मोड़ा विश्वनाथ घाट के भूत और अनेरिया गावँ के लोगो की रोचक कहानी। दगड़ियों कुमाउनी या पहाड़ी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि हम पहाड़ी लोगों…

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प्रस्तुत लेख में हम कोशिश करेंगे कि बेतालघाट के पूजनीय लोकदेवता एवं बेतालघाट के क्षेत्रपाल नकुवा बुबु जी की रोचक कहानी एवं जानकारी का सम्पूर्ण वर्णन कर सकें। यदि कोई सुझाव हों त्रुटि हो तो, हमारे फसेबूक पेज देवभूमी दर्शन पर msg या कॉमेंट में दे सकते हैं। उत्तराखंड के नैनीताल जिले में बसी एक सुंदर घाटी बेतालघाट। यह घाटी प्राकृतिक सुंदरता के बीच जितना सुंदर लगती है, उतनी ही रहस्यमयी भी है। सबसे ज्यादा रहस्यमयी है, इसका नाम बेतालघाट। इस स्थान का नाम बेतालघाट यहां के रक्षक यहां के लोकदेवता बेताल के नाम से पड़ा है। जैसा कि हमने बिक्रम…

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गिरीश चंद्र तिवारी “गिर्दा ” जनकवि ,पटकथा लेखक ,गीतकार,गायक, निर्देशक एवं उत्तराखंड संस्कृति की तथा उत्तराखंड राज्य के सच्चे हितेषी थे। गिर्दा का प्रारंभिक जीवन गिरीश तिवारी गिर्दा का जन्म 10 सिंतबर 1945 को उत्तराखंड, अल्मोड़ा जिले के हवालबाग ब्लॉक में ज्योली नामक गाँव मे हुवा था। गिरीश तिवारी जी के पिता का नाम हंसादत्त तिवारी था। और माता जी का नाम जीवंती देवी था। गिर्दा की आरंभिक शिक्षा अल्मोड़ा से पूर्ण की। और 12वी की परीक्षा नैनिताल से (व्यक्तिगत) पूर्ण की ।तत्कालीन संस्कृति कर्मी, रंगकर्मी मोहन उप्रेती और बृजेन्द्र लाल शाह इनके प्रेरणा श्रोत बने। गिर्दा, घर से निकल…

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अब पहाड़ भी शहरों की तरह विकसित हो गए हैं। गावों में मोबाइल टावर लग चुके हैं। लोगो का मिलकर बैठ के आणा कथा बन्द हो गई है। बारिश में सफेद भट्ट भून कर खाने का रिवाज बन्द हो गया है। पहाड़ो की कई पहचानों के साथ विलुप्त हो गए पहाड़ों में मशाल लेकर एकाकी चलने वाली आत्माएं जिन्हें ट्वॉल कहते थे। आइये चलते हैं, उस स्वर्णिम काल मे जब हम इतने विकसित नही थे, लेकिन रिश्तों, संवेदना,और प्यार के क्षेत्र में हम धनाढ्य थे। उस समय शाम को, ईजा और काकी खाना बनाती थी । और मैं अपने दादा…

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खतड़वा पर्व उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में पशुओं की रक्षा पर्व के रूप में मनाया जाता है। स्थानीय जानकारी के अनुसार 2025 में खतडुवा पर्व  16 सिंतबर 2025 के दिन मनाया जाएगा। जैसा कि हम अपने पिछले लेख घी संक्रांति में बता चुके हैं कि ,उत्तराखंड में लगभग प्रत्येक संक्रान्ति (जिस दिन सूर्य भगवान राशी परिवर्तन करते हैं) के दिन त्यौहार मनाने की परम्परा है। स्थानीय भाषा मे इसे सग्यान भी कहते है। इसी क्रम में आश्विन मास की संक्रांति के दिन उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल के लोग खतडुवा लोक पर्व मनाते हैं। अश्विन संक्रांति को  कन्या संक्रांति भी कहते हैं…

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ऐड़ी देवता उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र के लोक देवता हैं। उन्हें वन देवता के रूप में पूजा जाता है। कहते हैं कि ऐड़ी देवता अपने क्षेत्र में रात्रि को ,अपने दल बल के साथ शिकार के लिए निकलते हैं। और रात्रि में बुरी शक्तियों से अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में ऐरी देवता के बारे में अनेक कथाएं एवं मान्यताएं प्रचलित हैं। और चंपावत और नैनीताल जिले के बीच मे ब्यानधुरा नामक स्थान पर ,ऐड़ी देवता का प्रसिद्ध मंदिर है। यह एक अनोखा मंदिर है, जहां लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर धनुष बाण चढ़ावे…

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चल तुमड़ी बाटै बाट.. उत्तराखंड की यह प्रसिद्ध लोक कथा कुमाऊँ मंडल में सुनाई जाती है। पहले हमारे दादा दादी ने हमको यह कथा सुनाई थी,आज हम आपको डिजिटल माध्यम से उत्तराखंड की लोक कथा सुनाते हैं। दूर जंगल के पास गाव में , रामी नामक एक बुजुर्ग औरत रहती थी। रामी बुढ़िया की एक ही लड़की थी, जिसकी शादी हो चुकी थी। उसका ससुराल बहुत दूर भयानक जंगल के पार था। पहले जमाने मे गाड़ी और संचार की कोई व्यवस्था नही थी। तब घर पर पैदल जाकर ही कुशलक्षेम ली जाती थी। एक दिन रामी बुढ़िया को अपनी बेटी…

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