कुमाऊनी संस्कृति पर लेख || उत्तराखंड के रीती रिवाज || पहाड़ी जीवन || पहाड़ की बातें || Kumaoni sanskriti in hindi || UTTRAKHAND CULTURE

दोस्तों आज हम आपके लिए कुमाऊनी संस्कृति की कुछ दिल को छू लेने वाली बातें , जिसे पढ़कर आपकी पुराने ज़माने की यादें ताज़ा हो जाएँगी।  अगर नहीं पता तो आपका कुमाऊनी ज्ञान कोष बढ़ जायेगा।  और पहाड़ी जीवन की ये बातें अच्छी लगी हों तो दोस्तों साइड में लगे वहट्सप्प बटन से हमारे इस कुमाऊनी संस्कृति पर लिखे लेख को शेयर करें। (Kumaoni sanskriti in hindi )

क्या आपको पता है ,कि पहाड़ में पहले जमाने में धन्यवाद नहीं बोलते थे।  अपितु ये बोले कि कुमाऊनी भाषा में धन्यवाद शब्द है ही नहीं।  अगर हमारी कोई मदद कर  देता था तो , उसको बोलते थे , “तुमर भल है जो ‘आपका कल्याण हो। “तुमर नानतिन जी रो ” अर्थात आपके बाल बच्चे जीयें ,खुश रहें। तुमर खूटन कान झन बूड़ो आपको काटा चुभने के बराबर  दर्द न हो। यदि किसी ने दिल ज्यादा ही खुश कर दिया तो दिल से बोलते थे ,” महाराज तुम्हारी जै जै कारी है जो ” आपकी जय हो। धन्यवाद शब्द तो आजकल की देन ठैरी ,जब से लोग दिल्ली जाने वाले हुए तबसे  सीखे ठैरे धन्यवाद बोलना।  पहले पहले लोग दिल्ली से गांव आते थे , तो वो शहर की शान में आकर धन्यवाद देते थे तो गांव के लोग ,उनकी मजाक बनाते थे ,’‘ यो धणियोपात के भौय ” 

अब बात करते हैं खुशखबरी की, हमारे पहाड़ में कोई भी खुशखबरी होती थी तो उसमे भी हम ,धन्यवाद और बधाई हो शब्दों का प्रयोग नहीं करते थे। जैसे – किसी का लड़का पास हो गया तो उसको बोलते थे , “पास हैगो बलि तुमर च्योल ,गुड़ खवावो  पे अब ” और सामने वाले का जवाब रहता था -“होइ हैगो पे तुमर आशीर्वादल ,घर आया पे एक आंगू  पीठा लगे लिजाया ,एक घुटुक चाहा पी जाया , और गुड़ ले खाई जाया ”  किसी के लड़के की शादी तय हो गई तो ,उसको बोलते थे , भल भय  तुमर च्योलेक बया ठहर गो  , और जवाब वही आता था, ” होइ ठहर गो  पे तुमर आशीर्वादल “अब आप खुद समझ  लीजिये उपरोक्त वार्तालाप में कही भी बधाई हो या ,धन्यवाद शब्द का प्रयोग नहीं हुवा। और  इन दो पल्ला छुटाने वाले शब्दों की जगह जो वार्तालाप का प्रयोग हुवा ,उससे एक दूसरे के साथ आत्मीय सम्बन्ध प्रगाढ़ होते थे। ये विशेषता है कुमाऊनी संस्कृति की। (Kumaoni sanskriti in hindi )

कुमाऊनी संस्कृति

आज भौतिकता के जाल ,और आधुनिकता की चकाचौंध में इतना खो गए की अपनी संस्कृति को भूल कर ,शहरी  संस्कृति या विदेशी संस्कृतिं  के आधीन हो गए हैं। जैसे आज किसी की संतान होती है ,तो बोलते हैं ,बधाई हो पार्टी कब दे रहे हो ? शाम को कहाँ मिले ? क्या पिलाओगे ? अब आते हैं अपनी कुमाऊनी संस्कृति में , हमारे वहां जब किसी के घर बच्चा होता  है तो बोलते हैं ,” हिटो रे फलां वा भौ है रो , भौ देखिबेर ऊल। नौ मनखी मुखड़ देखिबेर ऊल ” तब जिस घर में बच्चा हुवा रहता, वह जाकर बोलते हैं,”भल होये तुमर नाती हैरो , तुमर चयलक रोटी बची गे। घर में द्वार उघाड़नी वाल एगो ” फिर उनके घर के कामो में मदद करते है । औरते चूल्हे और गोठ  और चूल्हे में मदद करती और आदमी लोग बैठ कर चर्चा करते हैं ,”नामकन में कदु आदिम खवाला ” हमर हाथक काम बताया हाँ ? उसी बीच बीच में मी चाहा आते रूल “

हमारी कुमाऊनी संस्कृति में लड़की का पैदा होना शकुनि माना जाता था।  उसकी पीठ पर  गुड़ की भेली फोड़ी जाती थी। इसी जब प्रकार जब किसी घर में शादी होती है  , तो ४ दिन पहले से निमंतरण शुरू हो  जाता है। जैसे आज सामान लाने का न्योता है , कल चावलों की सफाई का न्योता है। बड़े बूढ़े बड़े उत्त्साह से ये कहते हुए ,पहुंच जाते थे , काम म्यरकैल  के हु ,फिर ले एक आंगू पिठ्यॉँ लगे ल्यूल। फिर अपने अनुभव से लड़को को काम बता कर सारा काम सिद्ध करा देते थे। गांव में सबको शादी से पहले काम  दिया जाता था ,फिर गांव क लोग नियत समय पर आकर सारा काम फट्या  देते थे। काम शुरू होने पर कहते थे , “ऐ  बेर निभे जाया ” और काम निभ जाने पर ,” तुमुल ऐ बेर काम निभे दे ,नतर हमुकेल के हुची ”  और बिदाई के समय ,एक आंगु पिठ्या और एक गोला ,न अहसान ना नाराजी। ( Kumaoni sanskriti in hindi )

इसे  भी पढ़े -बेतालघाट के  चमत्कारी नकुवा बुबु की कहानी। .

अंत में – मित्रों  हमारी कुमाऊनी संस्कृति के रीती रिवाज बनाये गए ,कुछ इस प्रकार बनाये गए हैं, जिनसे लोगो के बीच आत्मीयता बढ़े और एक दूसरे के साथ सम्बन्ध प्रगाढ़ हो और एक दूसरे की मदद की भावना सबके दिल में आये। आज के व्यस्त और भौतिकवादी युग में हम , परंपराओं  को थोड़ा भी जीवित रख सकें तो बड़ी होगी। (Kumaoni sanskriti in hindi )

इसे भी पढ़े – पहले पहाड़ो में रात को ट्वॉल चलते थे , अब पता नहीं कहाँ विलुप्त हो गए।

 देवभूमी दर्शन के वाह्ट्सअप ग्रुप में जुड़ने के लिए यहाँ क्लीक करें।

Pahadi Products

Related Posts