Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

हिंदू धर्म में मां सरस्वती को विद्या, बुद्धि, वाणी, संगीत और कला की देवी माना जाता है। वे वेदों, पुराणों और उपनिषदों में प्रमुख स्थान रखती हैं। सरस्वती का नाम लेते ही एक दिव्य, श्वेत आभा में लिपटी देवी का स्वरूप सामने आता है, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, अक्षमाला और वरद मुद्रा होती है। उनकी उपासना से व्यक्ति को ज्ञान, विवेक, कला और वाणी की समृद्धि प्राप्त होती है। सरस्वती के विभिन्न स्वरूप : सनातन धर्मशास्त्रों में मां सरस्वती के दो प्रमुख रूपों का वर्णन मिलता है— 1. ब्रह्मा पत्नी सरस्वती वे मूल प्रकृति से उत्पन्न सतोगुण महाशक्ति हैं…

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कर्कोटक नागदेवता मंदिर भीमताल : उत्तराखंड के नैनीताल जिले में भीमताल कस्बे से 3 किलोमीटर पूर्वोत्तर दिशा में पांडेगांव के ऊपर एक प्राचीन नागदेवता कर्कोटक का पूजन स्थल स्थित है। यहां एक छोटा-सा मंदिर है । नागपंचमी के दिन इस मंदिर में स्थानीय लोग नागदेवता की पूजा करते हुए उन्हें दूध अर्पित करते हैं। कर्कोटक नागदेवता मंदिर भीमताल  से जुडी बेतिया सांप और साधु की कथा : इस स्थल से जुड़ी एक रोचक जनश्रुति है। प्राचीनकाल में यह क्षेत्र बेतिया नामक एक विशेष प्रजाति के छोटे और अत्यंत विषैले सांपों का गढ़ था। यह सांप जमीन से उछलकर व्यक्ति के…

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राधा बहिन भट्ट : समस्त उत्तराखंड के लिए गर्व की बात है कि ” पहाड़ की गांधी ” या पहाड़ की महिला गांधी के नाम से प्रसिद्ध 91 वर्षीय राधा बहिन भट्ट को देश के सम्मानित पुरस्कारों में से एक पद्मश्री पुरस्कार मिलने जा रहा है। पहाड़ों में 25 बाल मंदिरों के द्वारा लगभग 15000 बच्चों को शिक्षा का लाभ दिला चुकी हैं राधा बहिन भट्ट। इसके अतिरिक्त 1 लाख 60 हजार पेड़ लगाकर पर्यावरण संरक्षण की मसाल जला चुकी हैं राधा भट्ट। आइये एक संक्षिप्त लेख के माध्यम से जानते हैं राधा बहिन भट्ट का जीवन परिचय ( Biography…

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महाकुंभ स्पेशल: आजकल महाकुंभ चल रहा है ,यह महाकुंभ 144 साल बाद होता है। प्रति बारह वर्षों में एक कुम्भ होता है और 06 साल में एक अर्धकुम्भ होता है। आज कुंभ से जुड़ा पहाड़ का एक ऐतिहासिक किस्सा सुनाने जा रहे हैं ! https://youtu.be/ZyKNHThpU38?si=U0gxwYlE2KkZEUms उत्तराखंड के इतिहास में एक ऐसा किस्सा है जो राजाओं की भक्ति और उनकी शक्ति को दर्शाता है। यह कहानी है गढ़वाल के राजा “मेदिनीशाह” की, जिनके बारे में कहा जाता है कि गंगा नदी ने उनके लिए अपनी धारा बदल ली थी। यह घटना ऐतिहासिक है या पौराणिक, यह तो तय नहीं, लेकिन इसका…

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नैनीताल बनाम कानाताल: नैनीताल और कानाताल दोनों उत्तराखंड के बेस्ट हिल स्टेशन हैं। नैनीताल और कानाताल दोनों ही बेहतरीन जगहें हैं, लेकिन इनमें से कौन सा हिल स्टेशन घूमने फिरने के लिए बेहतर है, यह आपकी प्राथमिकताओं और रुचियों पर निर्भर करता है। आज इस लेख में नैनीताल और कानाताल के मध्य एक तुलनात्मक अध्ययन करने की कोशिश करेंगे – 1. स्थान और पहुँच – नैनीताल : उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित, नैनीताल झीलों का शहर है और रेलवे व बस सेवा से बेहतर जुड़ा हुआ है। कानाताल : टिहरी जिले में स्थित, यह ऋषिकेश और मसूरी के करीब…

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सरयू नदी, जिसे घाघरा नदी भी कहा जाता है, भारत के उत्तर भाग की ए प्रमुख नदी है। यह उत्तराखण्ड के बागेश्वर ज़िले से उत्पन्न होकर उत्तर प्रदेश और बिहार होते हुए गंगा में विलय होती है। इस नदी का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है, खासकर अयोध्या के पवित्र नगर के पास बहने वाली सरयू नदी को लेकर। https://youtu.be/hUT_Ha2Yomk?si=7bWewUC7p0hR0gPP सरयू नदी की उत्पत्ति : पौराणिक कथाओं के अनुसार, सरयू नदी भगवान विष्णु के नेत्रों से उत्पन्न हुई थी। शंखासुर नामक दैत्य ने वेदों को चुराकर समुद्र में डाल दिया था, और भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप में उसका वध…

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देहरादून: उत्तराखंड वक्फ बोर्ड ने ऐलान किया है कि आगामी शैक्षिक सत्र, जो मार्च या अप्रैल में शुरू होगा, से उत्तराखंड के मदरसों में रामायण और संस्कृत की शिक्षा दी जाएगी। इसके साथ ही, शारीरिक शिक्षा के प्रशिक्षक के रूप में पूर्व रक्षा कर्मियों की नियुक्ति भी की जाएगी ताकि छात्रों की शारीरिक फिटनेस और अनुशासन सुनिश्चित किया जा सके। उत्तराखंड के मदरसों में रामायण ,संस्कृत का उद्देश्य “शिक्षा को आधुनिक बनाना, व्यापक शैक्षिक अवसर प्रदान करना – इस पहल का उद्देश्य “शिक्षा को आधुनिक बनाना, व्यापक शैक्षिक अवसर प्रदान करना और राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ावा देना” है। वक्फ…

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महाकुंभ 2025 : धर्म और अध्यात्म की दुनिया में महिलाओं की उपस्थिति को लेकर कई बार सवाल उठते हैं, लेकिन नागा साधु बनने की परंपरा में महिलाओं की भागीदारी एक अद्वितीय और प्रेरणादायक पहलू है। महिला नागा साधुओं को नागिन, अवधूतनी, या माई कहा जाता है। इनमें से कई साध्वी केसरिया वस्त्र धारण करती हैं, जबकि कुछ चुनिंदा साध्वी भभूत को ही अपने वस्त्र का प्रतीक मानती हैं। https://youtu.be/6GFUnlr8UmU?si=_bbD0vVuSIFC05sk महाकुंभ 2025 : महिला नागा साधु और अखाड़ों का संबंध :- भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन अखाड़ा, जूना अखाड़ा ,महिला नागा साधुओं का प्रमुख केंद्र है। यह परंपरा 2013 में…

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कुमाऊंनी समाज में ‘चालोसिया’ एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट पद था, जिसका कार्य राजा या शासक के आसपास होने वाले षडयंत्रों पर निगरानी रखना था। ‘चाला’ शब्द का अर्थ होता है षडयंत्र या चालबाजी, और ‘चालोसिया’ का अर्थ हुआ ‘चालों पर नजर रखने वाला व्यक्ति’। यह शब्द उस समय के प्रशासनिक तंत्र के एक अहम हिस्से के रूप में उभरा, जब कुमाऊं क्षेत्र में चन्द शासनकाल के दौरान राजघरानों और प्रशासन में षडयंत्रों का बोलबाला था। उस समय कुमाऊं के शाही दरबार में रात-दिन विभिन्न प्रकार के षडयंत्र चलते रहते थे। ऐसे में राजा को हमेशा सतर्क और चौकस रहना पड़ता…

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जौ संक्रांति उत्तराखंड का एक प्रमुख कृषक ऋतु उत्सव है, जो उत्तराखंड के संक्रांति उत्सवों  से जुड़ा हुआ है। यह पर्व प्रकृति और कृषि के प्रति धन्यवाद व्यक्त करने और आगामी फसल के लिए शुभकामनाएं मांगने का प्रतीक है। हालाँकि अब इसे बसंत पंचमी या श्री पंचमी के साथ जोड़ा जाने लगा है, लेकिन इसका वास्तविक स्वरूप इसे एक मौलिक संक्रांति पर्व के रूप में स्थापित करता है। जौ संक्रांति का कृषि और ऋतु से संबंध जौ त्यार बसंत ऋतु के आगमन और जौ (बाली) की फसल के अंकुरण का उत्सव है। इस समय खेतों में लहलहाते जौ के अंकुर…

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