Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

कुमाऊनी होली गीत (Kumaoni Holi Geet lyrics) | कुमाऊनी होली लिरिक्स – देश की प्रसिद्ध होलियों में से एक है कुमाऊनी होली (Kumaoni Holi)। डेढ़ से दो महीने तक चलने वाला यह त्यौहार उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। कुमाऊनी होली के इतिहास पर आधारित यह विडियो देखें : https://youtu.be/iN2Jb8y6swQ पौष माह से बैठकी होली (Baithki Holi) और रंग एकादशी से खड़ी होली (Khadi Holi) की रौनक शुरू हो जाती है। कुमाऊनी खड़ी होली (Kumaoni Khadi Holi) ब्रज और कुमाऊनी मिश्रित भाषा में गाई जाती है, जबकि बैठकी होली (Baithki Holi) में उर्दू का…

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लोक संस्कृति दिवस – संस्कृति का अर्थ है सम्यक रूप से किया जाने वाला आचार ,व्यवहार ! सामान्य व्यवहार या बोलचाल में संस्कृति का अर्थ होता है सुन्दर ,रुचिकर और कल्याणकारी परिस्कृत व्यवहार। श्री देव सिंह पोखरिया अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लोक संस्कृति के विविध आयाम में संस्कृति की सरल शब्दों में परिभाषा देते हुए लिखते हैं ,” परम्परा से प्राप्त किसी मानव समूह की निरंतर उन्नत मानसिक अवस्था ,उत्कृष्ट वैचारिक प्रक्रिया ,व्याहारिक शिष्टता ,आचरण पवित्रता , सौंदर्याभिरुचि आदि की परिस्कृत , कलात्मक तथा सामुहिक अभिव्यक्ति ही संस्कृति है। संस्कृति पुरे समाज का प्रतिबिम्ब होती है। कोई जन्मजात सुसंस्कृत नहीं होता…

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भगवद् गीता के दशम स्कंध के नवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं— “पत्रं पुष्पं फलं तोय यो मे भक्त्या प्रयच्छति, तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।” अर्थात, यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा और शुद्ध चित्त से मुझे पत्ता, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार ही नहीं करता—उसका भोग भी लगाता हूं। यही भाव शिव महापुराण में भी प्रतिध्वनित होता है, जहां भगवान शिव को धतूरा, हरसिंगार, नागकेसर के श्वेत पुष्प, सूखे कमल गट्टे, कनेर, आक, कुश आदि अतिप्रिय बताए गए हैं। संदेश साफ है—ईश्वर धन, ऐश्वर्य या छप्पन भोग के नहीं, भाव के भूखे हैं। विस्तार इस…

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उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित सिद्धबली मंदिर, कोटद्वार से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर खोह नदी के बाएँ तट पर एक ऊँचे टीले पर स्थित है। तीजों और रंगों की छटा से आच्छादित यह स्थान केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर एक प्राचीन तपोभूमि है। यह मंदिर श्री सिद्धबाबा के तपोस्थान के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ भक्तों का विश्वास है कि हनुमानजी सदैव उपस्थित रहते हैं और अपने भक्तों का कल्याण करते हैं। खोह नदी का प्राचीन महत्व — कौमुदती नदी का पुराणों में वर्णन – स्थानीय रूप…

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Kalika mata mandir uttarakhand : कालिंका मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के बिरोनखाल ब्लॉक में स्थित कालिंका मंदिर का पहाड़ी मंदिर गढ़वाल–कुमाऊँ सीमांत संस्कृति, लोकआस्था और इतिहास का एक अनोखा संगम है। समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर अल्मोड़ा जिले की सीमा के बिल्कुल निकट आता है और देवी काली को समर्पित है। कालिंका मंदिर सदियों से अस्तित्व में रहा है, हालांकि पिछले दशक में इसकी संरचना को दो बार नए स्वरूप में पुनर्निर्मित किया गया। कई बार इसे बूंखाल कालिंका से भ्रमित किया जाता है, जो थलीसैंण क्षेत्र के मलुंड गाँव के…

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पाला बिसाऊ परंपरा: उत्तराखंड के ऐतिहासिक पन्नों, विशेषकर टिहरी रियासत के कालखंड में कई ऐसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं का जिक्र मिलता है, जो आज के समय में अकल्पनीय लगती हैं। इनमें से एक सबसे चर्चित और दमनकारी व्यवस्था थी— ‘पाला बिसाऊ परंपरा’ (Pala Bisau Tradition)। यह केवल एक कर (Tax) नहीं था, बल्कि शोषण का एक ऐसा माध्यम था, जिससे पहाड़ की भोली-भाली जनता वर्षों तक त्रस्त रही। आइए जानते हैं कि आखिर पाला बिसाऊ परंपरा क्या थी और इसने आम जनजीवन को कैसे प्रभावित किया। पाला बिसाऊ परंपरा क्या थी? (What was Pala Bisau Tradition?) – ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार,…

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बूढ़ी दिवाली 2025 – हिमालयी क्षेत्रों में दीपावली एक से अधिक बार मनाने की परम्परा है। उत्तराखंड से लेकर हिमाचल प्रदेश तक पहाड़ी इलाकों में बूढ़ी दिवाली मनाने की परम्परा है। यह बूढ़ी दिवाली हिमालयी क्षेत्रों में अपनी अपनी सुविधानुसार मनाई जाती है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र और गढ़वाल के कुछ हिस्सों में  में हरिबोधनी एकादशी के दिन बूढ़ी दिवाली इगास और बूढ़ी दिवाली के रूप में मनाई जाती है। इसके बाद मुख्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद जौनपुर उत्तरकाशी की गंगाघाटी में मंगसीर बग्वाल के रूप में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। वहीं रवाई घाटी में बूढी दीवाली देवलांग…

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पांडव नृत्य उत्तराखंड – पाण्डव नृत्य उत्तराखण्ड के साथ पांडवों का दीर्घकालीन व्यापक सम्बन्ध माना जाने के कारण सम्पूर्ण उ.ख. में जहां पर्वत शिखरों, स्थाननामों, तीर्थस्थलों, जलस्रोतों, विशिष्टि शिलाखण्डों के रूप में उनके स्मारक अंकित हैं वहीं विभिन्न रूपों में उनसे तथा उनके जीवनवृत्तों से सम्बद्ध अनेक गाथाएं व नृत्याभिनय भी पाये जाते हैं, जिनमें से प्रमुख है पण्डवार्त (पांडवनृत्य) एवं महाभारत । गढ़वाल एवं कुमाऊं मण्डल में इनकी स्थिति जिन रूपों में पायी जाती है उसकी संक्षिप्त रूपरेखा को निम्न रूपों में देखा जा सकता है। पाण्डवलीला या पांडव नृत्य का महत्व और धार्मिक स्वरूप – नृत्याभिनय के माध्यम…

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नौकुचियाताल (Naukuchiatal ) वैसे उत्तराखंड में एक से एक तालाब हैं। और उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में तालों का नगर के नाम से नैनीताल शहर प्रसिद्ध है। और नैनीताल में ही नौकुचियाताल नामक एक प्राचीन ताल है। जिसका पौराणिक कथाओं में धार्मिक महत्व बताया गया है। नौकुचियाताल की स्थिति – कुमाऊं मंडल के नैनीताल जनपद का यह 9 कोने वाला ताल नैनीताल से 26 किमी. व भीमताल से 4 किमी. पर 29°-19-20′ उ. अक्षांश और 19°-32-38” पू. देशान्तर पर तथा समुद्रतट से 1320 मी.की ऊंचाई पर स्थित है। यह छखाता परगने का सबसे ज्यादा गहरा (135 ‘फीट), किनारों पर कम…

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देवलांग मेला रवाईं घाटी का लोकोत्सव है। रवाईं घाटी अर्थात यमुना घाटी के विशेष त्योहारों में शामिल है देवलांग । बूढ़ी दीवाली या मंगसीर बग्वाल की तरह देवलांग भी बड़ी दीवाली के ठीक एक माह बाद मनाई जाती है। 2025  देवलांग मेला 19 – 20 नवंबर 2025 को मनाया जायेगा रवाईं घाटी की समृद्ध संस्कृति का प्रतीक है देवलांग उत्सव :- रवाईं घाटी की बनाल पट्टी के गावँ दो दलों में बटे है। एक दल का नाम साठी है, जबकि दूसरे दल का नाम पांसाई। ये दोनों दल एक माह पूर्व से देवलांग की तैयारियां शुरू कर देते हैं। देवलांग…

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