Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

उत्तराखंड अपनी विशेष संस्कृति, मेलों और त्योहारों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। उत्तराखंड के विशेष मेला त्योहारों में जून अंतिम सप्ताह में होने वाला मौण मेला (Maun mela Uttarakhand) काफी प्रसिद्ध है। मौण मेला मछली पकड़ने से सम्बंधित लोकोत्सव है जो उत्तराखंड के रवाईं, जौनपुर इलाकों में मनाया जाता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार इसकी तिथि जून के 21 से 30 के बीच  मानी जाती है। इसकी तिथि का निर्णय स्थानीय आयोजकों द्वारा किया जाता है। मौण क्या है? मौण तिमूर के छिलको को कूटकर तैयार किया गया वह पदार्थ है, जिसके मादक प्रभाव से मछलियां बिहोश हो कर पानी…

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उत्तराखंड की लोक संस्कृति के बारे में चर्चा करने से पहले संस्कृति के बारे में जानना अति आवशयक है। संस्कृति के बारे में प्रसिद्ध विद्वानों का क्या मत है यह जानना आवश्यक है। किसी समाज के  सामाजिक कर्मकांड, समाज की जीवन शैली, रीती रिवाज, कला, विश्वास अन्धविश्वास वह सबकुछ उस समाज विशेष की संस्कृति का अंग है जिसका पालन उस समाज में रहने वाले मनुष्य करते हैं। संस्कृति और लोक संस्कृति की व्याख्या बताती यह वीडियो अवश्य देखें :– https://youtu.be/0CDJm7nMYek अमेरिकन नृविज्ञानी (मानव उत्पत्ति तथा उसके रूप, आकार आदि का विवेचन करनेवाला शास्त्र) ई.बी. टाइलर के अनुसार, संस्कृति उस सम्पूर्ण…

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उत्तराखंड से एक अजीब खबर मिल रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखंड की शीतकालीन राजधानी देहरादून में रहने वाले एक पहाड़ी युवक का अपने मूल धर्म से मोह भंग हो गया और वो बन गया इस्लाम का कट्टर समर्थक। समाचार पत्रों तथा सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार उत्तराखंड देहरादून का एक आदमी ने पुलिस में शिकायक दर्ज कराई कि उनका बेटा वैभव विल्जवाण कई सालों से एक कमरे में रह रहा है। वह बहुत कम कमरे से बाहर निकलता है। केवल खाने के समय बाहर आता है, और उस समय वो इस्लाम की तारीफ करता है और अपने…

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पहाडों मे लोग मेहनतकश होते हैं। पहले सडकें बहुत कम थी, यातायात के साधन नही थे तो आदमी पैदल चला करते थे। मेहनत करने से नमक की कमी हो जाती होगी तो नमक ज्यादा खाया जाता था। फिर पहाडों मे प्रचुर मात्रा मे फल वगैरह होते थे तो उनके साथ नमक खाया जाता था। पहाड के लोगो ने तब कई प्रकार के मसाले वगैरह मिलाकर नमक को स्वादिष्ट बना दिया। आज भी पहाडों मे कई जगह पहाड़ी पिसी नूण के नाम से नमक बेचकर स्वरोजगार को बढावा दिया जा रहा है और पहाड के नमक  के स्वाद को देश विदेश…

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उत्तराखंड की पहली महिला बॉडी बिल्डर प्रतिभा थपलियाल का चयन नेपाल में होने वाले एशिया बड़ी बिल्डिंग चैम्पयनशिप और साउथ कोरिया में होने वाले वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग प्रतियोगिता के लिए हुवा है। उत्तराखंड की प्रतिभा थपलियाल का चयन छह से बारह सितम्बर नेपाल की राजधानी काठमांडू में होने वाली एशिया बॉडी बिल्डिंग चैम्पियनशिप तथा 30 अक्टूबर से 06 नवंबर तक होने वाली वर्ल्ड बॉडी बिल्डिंग चैम्पियनशिप साउथ कोरिया ,सिओल के लिए हुवा है। प्रतिभा पुरे देश में एकलौती महिला हैं जिनका चयन इस प्रतियोगिता के लिए हुवा है। गोवा में बॉडी बिल्डर फेडरेशन की ओर आयोजित ट्रायल में लगभग 23…

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दुनिया में सभी मानव जातियों की तरह हिमालयी जनजीवन कई सामाजिक व् सांस्कृतिक मान्यताएं मानी जाती हैं। इसी प्रकार उत्तराखंड व् हिमालयी क्षेत्रों में भी अलग अलग मान्यताएं मानी जाती हैं। उनमे से एक मान्यता हिमालयी क्षेत्रों नवजात शिशुओं को लेकर मानी जाती है। पहाड़ों में जब नवजात शिशु (6 माह से छोटे) सुप्तावस्था अथवा जागृत अवस्था में बिना किसी कारण मुस्कराते हैं या रोते हैं , तो बड़े बुजुर्ग कहते हैं उन्हें बिमाता या बिमाई हँसा या रुला रही है। पहाड़ी समाज में यह मान्यता रही है कि नवजात शिशुओं के साथ बिमाता नामक शक्ति रहती है ,जो बच्चों…

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उत्तराखंड को एक तरफ देवभूमि कहा जाता है। यहाँ एक से बढ़कर एक तीर्थ धाम हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों में देवो और ऋषिमुनियों का वास है। वहीं इसकी मनमोहक सुंदरता और मन सुकून देने वाला शांत वातावरण हर किसी को यहाँ कुछ पल बिताने पर मजबूर कर देता है। लेकिन इसके अतिरिक्त इन शांत पहाड़ों का अपना डरावना इतिहास भी है। जिसके बारे में जानकार अच्छे सिहर जाते हैं। वैसे तो उत्तराखंड के शांत पहाड़ों में कई डरावने स्थान हैं लेकिन चम्पावत जिले में  लोहाघाट के एबट माउंट की मुक्ति कोठरी को उत्तराखंड का सबसे अधिक डरावना स्थान माना जाता…

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कुमाऊं में लोक देवता ग्वेल देवता के साथ अवतरित होने वाले लोक देवता कलुवा को कुमाऊं में ग्वेल देवता का प्रमुख सहयोगी और भाई माना जाता है। कुमाऊं में लोक देवता ग्वेल देवता के साथ अवतरित होने वाले लोक देवता कलुवा को कुमाऊं में ग्वेल देवता का प्रमुख सहयोगी और भाई माना जाता है। इतिहासकार और उत्तराखंड के शोधकर्ता यह मानते हैं कि कलुवा एक नागपंथी सिद्ध थे। अपनी सिद्धियों के कारण उसने नाथपंथ में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। कलुवा वीर के सम्बन्ध में कुमाऊं और गढ़वाल में अलग अलग संकल्पनाएँ पायी जाती हैं। कुमाऊं में प्रचलित कहानियों…

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उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लोग वीर साहसी होते हैं। इतिहास गवाह है उत्तराखंड के कुमाउनी और गढ़वाली क्षेत्रों के वीरों ने समय -समय पर अपनी वीरता और साहस का प्रदर्शन किया है। ऐसी वीरता और साहस को देख कर अंग्रेजों ने गढ़वाल राइफल और कुमाऊं रेजिमेंट की स्थापना की। आजादी के बाद से ही कश्मीर की समस्या भारत के लिए बड़ी समस्या बना है। बटवारे के बाद से ही पाकिस्तान कश्मीर को हड़पने के लिए सारे अनैतिक रास्ते अपनाता रहा है। सन 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने के लिए कबाइली युद्ध छेड़ दिया था। भारत की तरफ…

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काठगोदाम का इतिहास – भारत के पूर्वोत्तर रेलवे के अंतिम विरामस्थल के रूप में जाने जाने वाला कुमाऊं के प्रवेशद्वार के नाम से प्रसिद्ध यह क़स्बा नैनीताल जिले में गौला नदी के तट पर स्थित है। सन 1975 में अंग्रेजों के कुमाऊं अधिग्रहण से पहले यह एक छोटा सा गावं था, जिसका नाम बाड़खोड़ी या बाडाखोड़ी था। या यूँ कह सकते हैं कि काठगोदाम का पुराना नाम बाड़खोड़ी या बाडाखोड़ी था। यह क्षेत्र चंद शाशनकाल में रुहेले आक्रमणकारियों और लुटेरों को रोकने की प्रमुख घाटी थी। राजा कल्यानचंद जी के राज में उनके सेनापति शिवदेव जोशी ने 1743 -44 में…

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