Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

कैंची धाम के जाम से कब मिलेगी निजात – कैंची धाम आज भारत के सबसे बड़े धामों में शुमार है। पिछले कुछ सालों में कैंची धाम आस्था का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। बीते तीन चार सालों से कैंची में श्रद्धालुओं की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यहाँ बढ़ती हुई भीड़ का मुख्य कारण है सोशल मीडिया पर कैंचीधाम का जबरदस्त प्रचार और बीते कुछ समय में यहाँ भारत सहित विदेशी सेलेब्रिटियों का आगमन। जिससे इस मंदिर को काफी प्रचार मिला और यहाँ अचानक श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई। श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ने से यहाँ प्रतिदिन जाम लग…

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उत्तराखंड के चम्पावत जिले यानी काली कुमाऊं में द्वापर युग के घटोत्कच पूजे जाते हैं घटकू देवता के रूप में। घटकू देवता का मंदिर काली कुमाऊं चम्पावत दो ढाई किलोमीटर दूर दिशा में चम्पावत तामली मोटरमार्ग पर स्थित है। यह मंदिर चम्पावत तामली मार्ग पर गिडया नदी के तट पर स्थित है है। महाभारत युद्ध में घटोत्कच का सर यहाँ गिरा था – स्कंदपुराण के मानसखंड के अनुसार महाभारत युद्ध में कर्ण की अमोघ शक्ति से कटकर घटोत्कच का सर यहाँ एक जलाशय में गिर गया था। अपने पुत्र का सर न मिलने के कारण पांडव बहुत दुखी थे। तब…

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ठठोरी देवी – उत्तराखंड को देवभूमि कहते हैं ,उत्तराखंड ही नहीं सम्पूर्ण हिमालयी भू भाग देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध है। हिमालयी भू भाग के परत प्रत्येक भू भाग प्रत्येक कण कण में देवों का वास है। यहाँ दैवीय दिव्य शक्तियों का वास हमेशा रहता है। और समय समय पर ये अपनी उपस्थिति और अपनी दिव्यता का प्रमाण देती रहती हैं। आज उत्तराखंड के माता के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं ,जिसे पहाड़ के छोटे छोटे बच्चों ने अपनी बाल श्रद्धा से अपनी बाल समस्याओं के निवारण हेतु स्थापित किया और माँ भी बाल आग्रह…

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पांच पत्थरों से खेला जाने वाला खेल विश्व के कई शहरों में फाइव स्टोन गेम ( five stones game) के नाम से जाना जाता है। यह खेल जापान चीन ,स्पेन ,इटली , अफ्रीका सिंगापुर आदि देशों में पारंपरिक खेल के तौर पर खेला जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि विश्व के कई देशों का पारम्परिक खेल फाइव स्टोन गेम के नाम से प्रसिद्ध यह खेल उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों का पारंपरिक खेल दाणी या नौगी है ,या इसे गुट्टा खेल भी कहते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र ही नहीं अपितु भारत के कई राज्य की किशोरी लड़कियां इस खेल…

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घुघुतिया उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोकपर्व है। यह लोकपर्व प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है। इस दिन आटे और गुड़ के साथ मिलाकर विशेष पकवान घुघुते बनाये जाते हैं। घुघुतिया के दिन घुघुते बनाने के पीछे अनेक लोककथाएं और किवदंतियां जुड़ी हैं। जिसमे से अधिकतम कहानियाँ आपको पता ही होगा। अगर नहीं पता तो इस पोस्ट के अंत में घुघुतिया पर्व से जुडी कथाओं का लिंक दे रहे हैं ,जरूर पढियेगा। अब आते आज के शीर्षक की मूल कहानी पर।  घुघुतिया के दिन घुघुतों के साथ ढाल तलवार भी बनाते हैं ,और साथ में हुड़का रस्सी और लकड़ी लाने…

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पहाड़ के दास : वैसे तो दास शब्द का सामान्य अर्थ है ‘अधीनस्थ सेवक’, या गुलाम जिसके ‘क्रीतदास’, ‘ऋणदास’ आदि कई रूप होते हैं, किन्तु उत्तराखंड  की देववाद की शब्दावली में इसका अर्थ होता है दलित वर्गीय वह व्यक्ति जो ढोल आदि लोकवाद्यों के साथ लोकदेवताओं के चरित्रगान के माध्यम से उनके धामियों,पश्वाओं,डंगरियों में उनका अवतरण कराता है। पहाड़ो के लोकदेवता उन्हें गुरु के रूप में संबोधित करते हैं। और उनके आदेशों का पालन करते हैं। उनके पास पहाड़ के देवताओं को बुलाने से लेकर उनको नियंत्रित करने और उनसे सवाल जवाब करने और उन्हें वापस भेजने की कला भी…

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मलयनाथ स्वामी उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के लोकदेवता हैं। यह उत्तराखंड के कुमाऊं के पूर्वी क्षेत्र सीरा एवं अस्कोट के लोकदेवता हैं। इनका मंदिर डीडीहाट के नजदीक सीराकोट दुर्ग के पुराने खंडहरों के बीच स्थित है। मलयनाथ देवता के बारे में कहा जाता है कि मलयनाथ सम्भवतः कोई मल्ल राजकुमार था। इनके मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ ब्राह्मणों का प्रवेश निषिद्ध है। मलयनाथ स्वामी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ पूजा केवल क्षत्रिय और जागर गान करने वाले करते हैं। इनकी जागर चार दिन की होती है , जिसे चौरास कहते हैं। मलयनाथ…

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पद्म का वृक्ष को उत्तराखंड के पहाड़ों की लोक संस्कृति में देव वृक्ष कहा जाता है। पहाड़ों में इस वृक्ष का बहुत महत्व है। पद्म के पेड़ की लकड़ी पहाड़ो में चन्दन की लकड़ी के बराबर पवित्र मानी जाती है। पद्म का वृक्ष का वैज्ञानिक परिचय – पद्म का वृक्ष का वानस्पतिक नाम प्रुन्नस सीरासोइडिस है। यह रोजेसी कुल का पौधा है। इस पेड़ का हिंदी नाम पद्म या पदखम है। अंग्रेजी में पद्म के पेड़ को बर्ड चेरी (Bird cherry ) के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में इसे पयाँ ,पया ,पयों आदि नामो से जाना…

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हरिबोधिनी एकादशी – मुख्य दीपावली के बाद जो एकादशी आती है उसे हरिबोधनी एकादशी कहते है। सनातन धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान् विष्णु चार माह की योगनिद्रा के बाद उठते हैं। इस दिन को उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इगास बग्वाल और कुमाऊं में बुढ़ दियाई यानि बूढी दीपावली मनाई जाती है। बग्वाल का अर्थ जहाँ पत्थर युद्ध या उसका अभ्यास होता है। प्राचीन काल में पहाड़ों के राजा महाराज ,सामंत अपनी पत्थर आयुध टुकड़ी से बरसात बाद के त्योहारों पर पत्थर युद्ध का अभ्यास करवाते थे ,संभवतः इसलिए कालान्तर में पत्थर युद्ध का अभ्यास तो…

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पहाड़ की बेटी को न्याय : आज उत्तराखंड की एक ऐसी बेटी की कहानी बताने जा रहे हैं ,जिसकी पूरी कहानी पढ़ने के बाद आप उसके हौसले ,उसके संघर्ष को नमन किये बिना नहीं रह पाओगे ! आजकल गढ़ी चंपावती के सर्वोच्च न्यायधीश यानी गोल्ज्यू महाराज उत्तराखंड की यात्रा पर हैं। गोल्ज्यू सन्देश यात्रा के अंतर्गत पूरे उत्तराखंड का भ्रमण कर रहे हैं। बात है 06 नवंबर 2024 की ,आज गोल्ज्यू की यात्रा का पड़ाव होना था धर्म नगरी हरिद्वार में। इधर हरिद्वार के एक न्यायालय में एक पहाड़ की बेटी न्याय की प्रतीक्षा कर रही थी , आठ साल…

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