Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

घुघुतिया त्यौहार पर निबंध – उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में मकर संक्रांति को घुगुतिया पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस त्यौहार को उत्तराखंड में उत्तरायणी ,मकरैण ,खिचड़ी संग्रात आदि नामो से मनाया जाता है। इस दिन भगवान् सूर्यदेव मकर राशी में प्रवेश के साथ दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं। अल्मोड़ा में प्रवाहित होने वाली सरयू नदी के पूर्वी भाग के निवासी इस पर्व को पौष मासांत पर मनाते हैं ,इसलिए वे इसे पुषूडियां त्यौहार कहते हैं। सरयू के पक्षिम भाग वाले इसे माघ की पहली तिथि को त्यौहार के रूप में घुघुतिया मानते है। कुमाउनी में घुघूती फाख्ता पक्षी…

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उत्तराखंड में शीतकालीन चार धाम यात्रा – उत्तराखंड, जिसे “देवभूमि” के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ धर्म, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम होता है। यहाँ स्थित चार प्रमुख धाम बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री, श्रद्धालुओं के लिए एक विशेष स्थान रखते हैं। लेकिन ये चारों धाम अत्यधिक ठण्ड के कारण सर्दी के मौसम में बंद हो जाते हैं। देवों की पूजा में कोई अवरोध ना आये और पूजा सतत चलती रहे इसलिये इन मंदिरों के देवों के प्रतीकात्मक रूपों को वहां से कम ऊंचाई वाली जगहों पर पूजा जाता है…

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वैसे तो कुलदेवता का अर्थ होता है ,मान्य ,आदरणीय ,पूज्य देवशक्ति। किन्तु उत्तराखंड के सन्दर्भ में इष्टदेवता का अर्थ होता है वे देवी देवता जो किसी परिवार या वर्ग विशेष द्वारा अपने घर परिवार की सुख समृद्धि के लिए वंशागत रूप में उस देवता की पूजा की जाती है। https://youtu.be/1fC6YG4uTaQ?si=1mrOIpActxL0wG7B कौन हैं पहाड़ियों के इष्टदेवता : उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में इष्टदेवता के प्रतीकात्मक लिंग या त्रिशूल घरों की कक्षों या ताखों में स्थापित किये जाते हैं। घरों की मुंडेर पर भी इन पाषाणी लिंगो की स्थापना की जाती है। लेकिन इसके बिपरीत कुमाऊं मंडल में एक निश्चित स्थानों पर…

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लोकनृत्य किसी समाज या संस्कृति को प्रदर्शित करने वाले नृत्य होते हैं ,जो किसी व्यक्ति विशेष द्वारा सृजित न होकर एक खास समाज या संस्कृति के लोगो द्वारा सामुहिक रूप में सृजित किये होते हैं। इनमे किसी व्यक्ति विशेष या संस्था का पेटेंट या कॉपीराइट न होकर पुरे समाज या उस संस्कृति से जुड़े लोगो का हक़ होता है। इन गीतों या नृत्यों को उस विशेष संस्कृति के लोग अपने समाज या परिवार में होने वाले विशेष अवसरों पर करते हैं। उत्तराखंड राज्य में लोक नृत्यों की परम्परा बहुत प्राचीन है। उत्तराखंड की लोक संस्कृति में विभिन्न अवसरों पर लोक…

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कैंची धाम के जाम से कब मिलेगी निजात – कैंची धाम आज भारत के सबसे बड़े धामों में शुमार है। पिछले कुछ सालों में कैंची धाम आस्था का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। बीते तीन चार सालों से कैंची में श्रद्धालुओं की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यहाँ बढ़ती हुई भीड़ का मुख्य कारण है सोशल मीडिया पर कैंचीधाम का जबरदस्त प्रचार और बीते कुछ समय में यहाँ भारत सहित विदेशी सेलेब्रिटियों का आगमन। जिससे इस मंदिर को काफी प्रचार मिला और यहाँ अचानक श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई। श्रद्धालुओं की संख्या अचानक बढ़ने से यहाँ प्रतिदिन जाम लग…

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उत्तराखंड के चम्पावत जिले यानी काली कुमाऊं में द्वापर युग के घटोत्कच पूजे जाते हैं घटकू देवता के रूप में। घटकू देवता का मंदिर काली कुमाऊं चम्पावत दो ढाई किलोमीटर दूर दिशा में चम्पावत तामली मोटरमार्ग पर स्थित है। यह मंदिर चम्पावत तामली मार्ग पर गिडया नदी के तट पर स्थित है है। महाभारत युद्ध में घटोत्कच का सर यहाँ गिरा था – स्कंदपुराण के मानसखंड के अनुसार महाभारत युद्ध में कर्ण की अमोघ शक्ति से कटकर घटोत्कच का सर यहाँ एक जलाशय में गिर गया था। अपने पुत्र का सर न मिलने के कारण पांडव बहुत दुखी थे। तब…

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ठठोरी देवी – उत्तराखंड को देवभूमि कहते हैं ,उत्तराखंड ही नहीं सम्पूर्ण हिमालयी भू भाग देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध है। हिमालयी भू भाग के परत प्रत्येक भू भाग प्रत्येक कण कण में देवों का वास है। यहाँ दैवीय दिव्य शक्तियों का वास हमेशा रहता है। और समय समय पर ये अपनी उपस्थिति और अपनी दिव्यता का प्रमाण देती रहती हैं। आज उत्तराखंड के माता के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं ,जिसे पहाड़ के छोटे छोटे बच्चों ने अपनी बाल श्रद्धा से अपनी बाल समस्याओं के निवारण हेतु स्थापित किया और माँ भी बाल आग्रह…

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पांच पत्थरों से खेला जाने वाला खेल विश्व के कई शहरों में फाइव स्टोन गेम ( five stones game) के नाम से जाना जाता है। यह खेल जापान चीन ,स्पेन ,इटली , अफ्रीका सिंगापुर आदि देशों में पारंपरिक खेल के तौर पर खेला जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि विश्व के कई देशों का पारम्परिक खेल फाइव स्टोन गेम के नाम से प्रसिद्ध यह खेल उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों का पारंपरिक खेल दाणी या नौगी है ,या इसे गुट्टा खेल भी कहते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र ही नहीं अपितु भारत के कई राज्य की किशोरी लड़कियां इस खेल…

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घुघुतिया उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोकपर्व है। यह लोकपर्व प्रतिवर्ष मकर संक्रांति के दिन मनाया जाता है। इस दिन आटे और गुड़ के साथ मिलाकर विशेष पकवान घुघुते बनाये जाते हैं। घुघुतिया के दिन घुघुते बनाने के पीछे अनेक लोककथाएं और किवदंतियां जुड़ी हैं। जिसमे से अधिकतम कहानियाँ आपको पता ही होगा। अगर नहीं पता तो इस पोस्ट के अंत में घुघुतिया पर्व से जुडी कथाओं का लिंक दे रहे हैं ,जरूर पढियेगा। अब आते आज के शीर्षक की मूल कहानी पर।  घुघुतिया के दिन घुघुतों के साथ ढाल तलवार भी बनाते हैं ,और साथ में हुड़का रस्सी और लकड़ी लाने…

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पहाड़ के दास : वैसे तो दास शब्द का सामान्य अर्थ है ‘अधीनस्थ सेवक’, या गुलाम जिसके ‘क्रीतदास’, ‘ऋणदास’ आदि कई रूप होते हैं, किन्तु उत्तराखंड  की देववाद की शब्दावली में इसका अर्थ होता है दलित वर्गीय वह व्यक्ति जो ढोल आदि लोकवाद्यों के साथ लोकदेवताओं के चरित्रगान के माध्यम से उनके धामियों,पश्वाओं,डंगरियों में उनका अवतरण कराता है। पहाड़ो के लोकदेवता उन्हें गुरु के रूप में संबोधित करते हैं। और उनके आदेशों का पालन करते हैं। उनके पास पहाड़ के देवताओं को बुलाने से लेकर उनको नियंत्रित करने और उनसे सवाल जवाब करने और उन्हें वापस भेजने की कला भी…

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