Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

 प्रस्तावना हिरन -चित्तल नृत्य, जिसे हरिण-चित्तल उत्सव भी कहा जाता है, कुमाऊं की जीवंत लोक-सांस्कृतिक पहचान है। ‘हरिण-चित्तल’ का अर्थ ‘चितकबरा हिरण’ है—इसी भाव के साथ कलाकार एक जीवंत अष्टपदी हिरण का रूप धरकर दर्शकों के बीच वन्यजीवन की सौम्यता, चंचलता और चपलता को नृत्य-आभिनय के माध्यम से साकार करते हैं। यह उत्सव मुख्यतः पिथौरागढ़ जनपद के सीरा परगने की अस्कोट पट्टी में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी (आठू) के आसपास, विशेष रूप से गमरा महोत्सव के अवसर पर आयोजित होता है। इसे आठों मेला का हिरन चित्तल नृत्य भी कहते हैं। हिरन -चित्तल नृत्य का सांस्कृतिक महत्व…

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हिलजात्रा 2025 में  मुख्य रूप से 05 सितंबर 2025 को कुमौड़ गांव में मनाया जायेगा ।  परिचय : हिलजात्रा उत्सव उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के पिथौरागढ़ जिले का प्रमुख उत्सव है। यह सोरघाटी में विशेषतः बजेटी, कुमोड़, बराल गावं, थरकोट, बलकोट, चमाली, पुरान, देवथल, सेरी, रसैपाटा में मनाया जाने वाला लोकनृत्य है। और कुछ परिवर्तनों के साथ हरिण चित्तल नृत्य के रूप में अस्कोट और कनालीछीना में मनाया जाता है। यह लोकनृत्य कृषि व्यवसाय से संबंधित होने के कारण इसमें अभिनय करने वालों का रूप भी उसी के अनुसार होता है। अर्थात इसमें कोई हल जोतते हुए बैल बनता है…

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उत्तराखंड की संस्कृति लोक पर्वों और परंपराओं से भरी हुई है। इन्हीं पर्वों में सातों आठों (Satu Aathu Festival) का विशेष महत्व है। यह पर्व भाद्रपद मास की सप्तमी और अष्टमी को मनाया जाता है। इस त्योहार की खास बात यह है कि इसमें भगवान शिव को भिनज्यू (जीजाजी) और माता पार्वती को दीदी के रूप में पूजा जाता है। यह पर्व मुख्यतः कुमाऊं के पिथौरागढ़ और कुमाऊं के सीमांत क्षेत्रों में मनाया जाता हैं। सातों आठों पर्व की विशेषता सातों आठों का अर्थ है – सप्तमी (सातू) और अष्टमी (आठू)। मान्यता है कि जब माता पार्वती (दीदी गवरा) भगवान्…

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परिचय : उत्तराखंड के दोनों मंडलों (कुमाऊं और गढ़वाल) में पूज्य देवी है नंदा। उत्तराखंड वासियों का माँ नंदा के साथ ऐसा रिश्ता है, शायद देश में किसी भक्त और उसके आराध्य का हो। कोई इन्हे अपनी बेटी मानता है, कोई बहिन! मानवीय रिश्तों में बांध कर देवी माँ को प्रेम और स्नेह के बंधन में बांधना भक्ति का एक अलग ही रूप है। यह देवी कत्यूर पंवार और चांद वंशों की कुलदेवी के रूप में पूजित है। नंदा देवी की कहानी वीडियो में देखिए यहां :  https://youtu.be/SyrEFLe5LG4 कत्यूरी वंश की सभी शाखाओं में जिया रानी को नंदा देवी का…

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घी संक्रांति की शुभकामनाएँ : घी संक्रांति, जिसे ‘घी त्यार’ भी कहा जाता है, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक विशेष पर्व है। यह त्यौहार खासतौर पर कृषक-पशुपालक समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन की खासियत है कि माताएं अपने बच्चों के सिर पर ताजा घी मलती हैं, साथ ही उनके स्वस्थ और दीर्घायु होने की कामना करती हैं। इस दिन का भोजन भी घी से भरपूर होता है, जिसमें खासतौर पर बेड़ुवा रोटी बनाई जाती है। घी संक्रांति का ऐतिहासिक महत्व : घी संक्रांति का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। माना जाता…

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परिचय: “होठों में मुरुली” एक प्रसिद्ध कुमाऊंनी भजन है जिसे कुमाऊं के प्रसिद्ध लोकगायक स्वर्गीय पप्पू कार्की  ने लिखा और गाया है। इस भजन में भगवान श्री कृष्ण की दिव्य सुंदरता, मुरली (बांसुरी) की धुन और उनके अद्भुत प्रेम का सजीव चित्रण किया गया है। कुमाऊंनी भजन के रूप में प्रस्तुत किया गया यह गीत न केवल कृष्ण भक्ति का प्रतीक है, बल्कि कुमाऊं के लोक संगीत का भी एक अद्भुत उदाहरण है। यह भजन ( hontho me muruli ) उत्तराखंड में जन्माष्टमी पर खूब पसंद किया जाता है। स्वर्गीय पप्पू कार्की जी  की आवाज़ और उनके द्वारा प्रस्तुत किया…

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गढ़वाली लोकगीत हमारी संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन गीतों में हमें गढ़वाली समाज के रीति-रिवाज, मानवीय संवेदनाएँ, और दिल छूने वाले भावनात्मक पहलू देखने को मिलते हैं। इस लेख में हम कुछ प्रसिद्ध गढ़वाली गीत लिरिक्स (Garhwali Song Lyrics) का संकलन कर रहे हैं, जो न केवल गढ़वाल की भूमि की खूबसूरती और सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाते हैं, बल्कि संगीत और लय में बसी हुई गहरी भावनाओं का भी अहसास कराते हैं। 1. गढ़वाली लोकगीत गाडो गुलाबंद गुलबंद को नगीना (Garhwali Song Lyrics) यह गीत गढ़वाली लोक संगीत का एक अनमोल रत्न है, जिसे बीना कुकरेती जी…

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परिचय : अगर उत्तराखंड के लोकसंगीत की आत्मा की तलाश करें, तो वह निश्चित ही नरेंद्र सिंह नेगी के गीतों में मिल जाएगी। गढ़वाल के इस महान लोकगायक, गीतकार और संगीतकार ने अपनी मधुर आवाज़ और अर्थपूर्ण बोलों के जरिए उत्तराखंड की संस्कृति, समाज, राजनीति, संघर्ष और प्रेम के हर रंग को सुरों में पिरोया है। 2024 में नेगी जी ने जीवन के 75वें वर्ष और रचनाकर्म के 50वें वर्ष में प्रवेश किया है। रेडियो से लेकर यूट्यूब तक, उन्होंने 4 पीढ़ियों को अपने गीतों से जोड़े रखा है। प्रारंभिक जीवन : पूरा नाम: नरेंद्र सिंह नेगी जन्म: 12 अगस्त…

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पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड में अतिवृष्टि बढ़ गई है। जिसके कारण भूस्खलन, और कई प्रकार की जान माल की हानि हो रही है। उत्तराखंड में बादल फटना आम हो गया है। उत्तराखंड में होने वाली अचानक अतिवृष्टि को बादल फटना कहते हैं। अब सवाल ये उठता है, कि क्यों फटते है बादल ? या बादल फटना क्या होता है ? और उत्तराखंड में ज्यादा बादल क्यों फटते हैं ?  बादल फटना क्या होता है ? उत्तराखंड में लगातार बादल फटने (Cloud brust) की घटनाओं ने हम सब को झकझोर कर रख दिया है।  अगस्त 2025  में उत्तरकाशी के धराली…

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परिचय: कुमाऊं मंडल में स्थित चम्पावत जनपद के टनकपुर से 18 किमी दूर, पूर्णागिरी पर्वत के शिखर के पास स्थित एक अनोखा देवालय है, जिसे ‘झूठा मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह एक छोटा ताम्र देवालय है, जो अपनी रहस्यमयी कहानी और असामान्य स्थिति के लिए प्रसिद्ध है। आज हम इस मंदिर की दिलचस्प और रहस्यमयी कथा पर एक नज़र डालेंगे। झूठा मंदिर का इतिहास: झूठा मंदिर के बारे में एक प्रचलित कथा है, जो इसके नामकरण की वजह बताती है। कहते हैं कि एक समय किसी सेठ ने मां पूर्णागिरी के मंदिर में एक मनौती की थी।…

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