Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

गौचर मेला : चमोली गढ़वाल के गौचर नामक नगर में लगने वाला यह ऐतिहासिक मेंला उत्तराखंड का औधोगिक मेला के नाम से भी प्रसिद्ध है। अलकनंदा नदी के किनारे बसा रमणीय स्थल गौचर समुद्रतल से लगभग 8000 मीटर उचाई पर स्थित है। गौचर बद्रीनाथ जाने वाले मार्ग पर पड़ने वाला विशाल मैदानी हिस्सा है। यहाँ प्रतिवर्ष 14 नवंबर से 20 नवंबर तक यहाँ प्रसिद्ध गौचर मेला आयोजित किया जाता है। यह मेला व्यापारियों और पहाड़ के लोगों के लिए एक विशेष आकर्षण है। गौचर में एक हवाई अड्डा भी है, जिसका निर्माण 1998 -2000 में किया गया था। गौचर मेला…

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आज दिनांक 4 नवंबर 2023 को राजकीय इंटर कालेज लोधियाखान विद्यालय में रोहित फाउंडेशन के तृतीय वार्षिकोत्सव के उपलक्ष में एक समारोह का आयोजन किया गया था। इस अवसर पर क्षेत्र के विधायक श्री प्रमोद नैनवाल जी भी उपस्थित थे। रोहित फाउंडेशन के तृतीय वार्षिकोत्सव पर रा ई का लोधियाखान को दो कप्यूटर प्रदान किये गए। रोहित फाउंडेशन काफी समय से शिक्षा ,स्वास्थ ,कृषि और पर्यावरण के क्षेत्र में सुचारु रूप से कार्यरत है। यह संस्था ग्रामीण बच्चों को शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता देना और उनके स्वर्णिम भविष्य के मार्ग में आने वाली बाधाओं को हल करने का कार्य…

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उत्तराखंड में ऐसे कई नाम है जिनके पीछे गढ़ शब्द का प्रयोग होता है। वस्तुतः मध्यकाल में समस्त उत्तराखंड क्षेत्र इन गढ़ियों के शासकों द्वारा प्रशासित था। इनकी अपनी सामंती ठकुराई होती थी। और इनके अपने छोटे छोटे दुर्ग होते थे जिन्हे गढ़ ,गढ़ी  कोट या बुंगा कहते थे। इनका निर्माण पहाड़ी  ऊपर किसी समतल भूमि पर किया था। कुमाऊं गढ़वाल में सभी राजवंशो के गढ़ों के अलावा इनके सामंतो भी अपने गढ़ होते थे। इनमे अधिकतर केवल नाम के रह  हैं अब। गढ़वाल जो पहले “केदारखंड’ के नाम से जाना जाता था। वर्तमान गढ़वाल का नामकरण ही गढ़वाल के…

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नारायण आश्रम की स्थापना 1936 में श्री नारायण स्वामी जी ने की थी। यह पिथौरागढ़ से 136 किमी दूर है। और तवाघाट से 14 किमी दूर है। नारायण आश्रम समुद्रतल से 2734 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह आश्रम धारचूला स्टेशन से 23 किमी दूर है। प्रकृति की सुरम्य वादियों में बसा यह आश्रम ध्यान योग की गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है। नारायण आश्रम उत्तराखंड का इतिहास – नारायण स्वामी का जन्म दक्षिण एक सम्पन्न परिवार में हुवा था। किन्तु इनके मन में युवास्था में ही वैराग्य उत्पन्न हो गया था। अपने सम्पन्न परिवार का त्याग कर ये हिमालय…

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उत्तराखंड का घेस गांव: घेस गांव (ghes village Uttarakhand) उत्तराखंड का हर्बल गांव के नाम से प्रसिद्ध है। हिमालय की तलहटी में बसा यह गांव जड़ी बूटियों के साथ-साथ अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। इसे जड़ी बूटियों वाला गांव भी कहते हैं। घेस गांव हिमालय के नजदीक चमोली जिले के देवाल ब्लॉक में स्थित है। इस गांव के लिए एक प्रसिद्ध कहावत है। घेस जिसके आगे नहीं देश । जड़ी-बूटियों का उत्पादन होता है – घेस गांव मे परम्परागत खेती के साथ जड़ी बूटीयों का उत्पादन भी किया जाता है। ग्रामवासी अतीस,कटकी, कर, पुष्करगोल, चिरायता और वन ककड़ी…

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अश्विन माह जिसे पहाड़ो में आशोज के नाम से जाना जाता है। और यह अशोज का महीना जबरदस्त खेती के काम का प्रतीक माना जाता है। क्योंकि इस महीने खरीफ की फसलों के साथ घास भी काटी जाती है। और अधिक मात्रा में होने के कारण इसे घास के लुटे बनाकर स्टोर किया जाता है। काम -काज का पर्याय है आशोज का महीना – अश्विन यानि सितम्बर और अक्टूबर में मोटा अनाज मडुवा ,झंगोरा आदि और धान की फसल ,और दाल दलहन इसके साथ घास ये सब एक साथ तैयार होते हैं। इतनी सारी फसलें एक साथ तैयार होने के…

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मित्रों टिहरी गढ़वाल से श्री प्रदीप बिजलवान बिलोचन जी ने पलायन के दर्द को बताती एक गढ़वाली कविता भेजी है। गढ़वाली भाषा में कविता का आनंद लीजिये और अच्छी लगे तो शेयर करें। गढ़वाली कविता – एक नवेली दुल्हन की गांव के पलायन की पीड़ा – न बाबा न मिन कतै भी तै बांझा सैसुर नी जाणी । तख छ बाघ रिख की डैर , जीकुड़ी मां पड़ी जांदू झुराट अर मैं तैं त पोड़ी गेनी आणि । गोणी बांदूरू न त बल बांझा गेरी यालीन साग, सगवाड़ी । तब मिन अर सासु जी न तुमी बोला क्या त खाणी…

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उत्तराखंड की शांत और सुन्दर वादियां लोगों का मन मोह लेती हैं। हालाँकि देश भर में कई सुन्दर पर्यटन स्थल हैं लेकिन उत्तराखंड की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक सुंदरता के आगे वे भी फीके पड़ते हैं। यहाँ सालभर पर्यटकों का ताँता लगा रहता है। इसलिए भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने उत्तराखंड के सरमोली गांव को देश का सबसे श्रेष्ठ पर्यटन गांव के रूप में चुना है। बेस्ट टूरिस्ट विलेज ऑफ़ इंडिया के रूप में चुने जाने वाला सरमोली गांव उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी के पास स्थित है। भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने समस्त देश में श्रेष्ठ…

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सैम देवता और हरु देवता  के समान ही यह भोलनाथ भी कुमाऊं के एक अति लोकप्रिय सम्मानित देवता है। इन्हे  भोलेनाथ (शिव) का अवतार माना जाता है। तथा सभी खुशी के अवसरों पर तथा प्रमुख पर्वो पर इसका स्मरण किया जाता है तथा ‘रोट’ का प्रसाद बनाकर इसका पूजन किया जाता है। कहीं-कहीं इसे भैरव के नाम से भी पूजा जाता है। इसके अतिरिक्त इनका  ‘जागर’ भी लगता है जिसे ‘भ्वलनाथ ज्यूक जागर’ कहा जाता है। इनका प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः अल्मोड़ा तक ही सिमित है। लोक देवता भोलनाथ की कहानी – एक लोकश्रुति के अनुसार राजा उदयचंद की दो रानियां…

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नंदा देवी को पहाड़ की कुल देवी कहते हैं। पहाड़ वासी माँ नंदा को अपनी पुत्री के रूप में मानते हैं।प्रत्येक भाद्रपद में नंदा अष्टमी पर माँ की पूजा अर्चना होती है। गढ़वाल कुमाऊं में माँ नंदा देवी के देवालयों में मेले लगते हैं।प्रत्येक बारह वर्ष में माँ नंदा अपने मायके आती है। तब लोग उसे एक धार्मिक यात्रा के रूप में  ससुराल छोड़ने जाते हैं।  इस धार्मिक यात्रा को नंदा राजजात कहते हैं। यह एशिया की सबसे लम्बी और दुर्गम यात्रा है। प्रस्तुत पोस्ट में हम माँ नंदा के दो प्रसिद्ध गढ़वाली भजनों के बोल (Nanda devi bhajan lyrics)…

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