Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

वर्तमान में काशीपुर उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध औधोगिक नगर के रूप में स्थापित हो रहा है। उत्तराखंड के प्रसिद्ध औधोगिक नगर के साथ साथ इस शहर का इतिहास बहुत ही समृद्ध रहा है।  भौगोलिक स्थिति – यह नगर उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल के ऊधमसिंहनगर जिले का तराई क्षेत्र में इसके मुख्यालय रुद्रपुर से लगभग 60 किमी. पश्चिम में ढेला नदी के बाम तट पर 29°-13′ उत्तरी अक्षांश तथा 78°-58′ देशान्तर पर प्राचीन नगर गोविषाण टीले के निकट डेढ़ किमी. की दूरी पर स्थित है। चंद राजाओं के में यह उसके ‘कोटा’ मंडल का मुख्यालय हुआ करता था, किन्तु सन् 1639ई.…

Read More

कयेश या कैंश परंपरा  – कयेश या कैंश परंपरा उत्तराखंड के पहाड़ी हिस्सों में शगुन सूचक परम्पराओं में से एक समृद्ध परंपरा है। कुमाऊं के क्षेत्रों में प्रयुक्त इस शब्द को संस्कृत के कलश शब्द से लिया गया है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्रों की सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार पहाड़ो में शुभकार्यों के अवसर पर यह परंपरा निभाई जाती है। यह परम्परा खासकर पहाड़ की शादियों में वरयात्रा के प्रस्थान और आगमन पर शगुन के रूप में बहिने या महिलाएं स्वागत में जल से भरी गागर या कलश लेकर स्वागत में खड़ी रहती है। वर का पिता या वर उसमे अपनी…

Read More

सूतक : उत्तराखंड की गढ़वाली और कुमाऊनी क्षेत्र में सूतक शब्द का प्रयोग मृतकशौच के लिए किया जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार डा राम सिंह जी के अनुसार ग्रहण लगने पर एक नियत समयावधी को ” सूतक काल ” माना जाता है। यदि किसी की मृत्यु हो जाती है तो इसका प्रभाव उसके पिछली पीढ़ी से संबंधित पारिवारिक लोग या स्वतंत्र परिवारों पर पड़ता है। मृतक के इन सपिण्डी लोगों को पहाड़ी भाषा में बिरादर कहते हैं। प्रभावित समय की गणना मृतक के साथ बिरादरों की पीढ़ी के अनुसार निकटता और दूरी के आधार पर तय होता है। यह सूतक का…

Read More

लक्ष्मी पौ ऐपण के बिना अधूरी है पहाड़ की दीपावली। जैसा कि हम सबको पता है उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति की पहचान उत्तराखंड की लोककला ऐपण पहाड़ की एक समृद्ध विरासत है। वर्तमान समय में डिजिटल क्रांति के बाद उत्तराखंड की इस लोककला का बहुत ज्यादा प्रचार तो हुवा ही है ,इससे उत्तराखंड के कई युवाओं को रोजगार भी मिला है। इसी समृद्ध लोककला का एक रूप है लक्ष्मी पौ ऐपण। लक्ष्मी पौ ऐपण – लक्ष्मी पौ ऐपण का अर्थ है माँ लक्ष्मी के पैरों की छाप या लक्ष्मी के पदचिन्ह। यह उत्तराखंड कुमाऊनी ऐपण कला का एक अन्यतम स्वरूप…

Read More

बासुलीसेरा अल्मोड़ा  – उत्तराखंड के पहाड़ों में अनेक मंदिर और धार्मिक स्थल हैं। कुछ बड़े धार्मिक स्थल हैं और उनके अलावा कई छोटे -छोटे मंदिर हैं। हालाँकि धार्मिक महत्व के मामले में सभी स्थल लगभग बराबर हैं ,लेकिन कुछ मंदिरो के साथ इतिहास के महत्वपूर्ण चरित्रों कथानकों का जुड़ाव होने के कारण उन्हें अधिक प्रसिद्धि मिली और कुछ छोटे छोटे मंदिर अपने स्थानीय स्तर पर प्रसिद्ध होकर रह गए। लेकिन पहाड़ो के मंदिर छोटे हों या बड़े उनके पीछे कुछ न कुछ लोककथाएं या जनश्रुतियां अथवा पौराणिक कहानियां अवश्य जुडी होती है। आज इस पोस्ट में कुमाऊं क्षेत्र के एक…

Read More

बग्वालीपोखर – उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में एक ऐसा क़स्बा है ,जो अपने पौराणिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए विख्यात है। अल्मोड़ा जिले में बसा एक छोटा सा क़स्बा जो रानीखेत तहसील के अंतर्गत आता है। रानीखेत कौसानी रोड पर रानीखेत से 22 किलोमीटर दूर गगास नदी के पास स्थित है। इसका नाम पड़ने का कारण यहाँ पुराने समय में खेली जाने वाली बग्वाल ( पत्थर युद्ध ) है। इसका एक पुराना नाम हस्तिनापुर भी है ,जिसका संबंध द्वापरयुगीन कौरवों से है। प्राचीनकाल में बग्वालीपोखर अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। बग्वालीपोखर में कौरवों ने खेली थी चौपड़ -…

Read More

सीतावनी रामनगर : उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में नैनीताल जिले के रामनगर कस्बे से 20 किलोमीटर दूरी पर कोसी नदी और दाबका नदियों के बीच पहाड़ की घाटी में घने साल के वनो के बीच इस स्थान को वाल्मीकि आश्रम और माता सीता की तपोस्थली माना जाता है। सीतावनी मंदिर के बारे में बताया जाता है कि यह मंदिर त्रेतायुग से यहाँ स्थापित है। सीता माँ का यह मंदिर रामनगर वन प्रभाग के अंतर्गत आता है। सीतावनी रामनगर का पौराणिक इतिहास जुड़ा है माँ सीता और लव कुश से – सीतावनी रामनगर के बारे में लोकमान्यताओं में कहा जाता है…

Read More

उत्तराखंड का लोकपर्व इगास बग्वाल उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में दीपावली के ठीक ग्यारह दिन बाद, देवउठनी एकादशी के दिन एक लोक पर्व मनाया जाता है, जिसे इगास बग्वाल के नाम से जाना जाता है। इगास बग्वाल का अर्थ होता है एकादशी के दिन मनाई जाने वाली बग्वाल या दीपवाली। पहले बग्वाल के रूप में पत्थर युद्ध का अभ्यास होता था। और यह बग्वाल अधिकतर दीपावली के आस पास मनाई जाती थी। इसलिए पहाड़ों में दीपावली के पर्व को बग्वाल कहा जाता है। धीरे धीरे प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन होते रहे और बग्वाल के रूप में पत्थर युद्ध अभ्यास की…

Read More

जाखन देवी अल्मोड़ा- उत्तराखंड में प्राचीन काल विभिन्न जातियों और संस्कृतियों का निवास रहा है। जिन्होंने मिलकर उत्तराखंड की एक समृद्ध संस्कृति का निर्माण किया है। उत्तराखंड के प्राचीन निवासियों में यक्ष ,गन्धर्व ,खस आदि प्रमुख रहे हैं। यहाँ यक्षों का प्रभाव आदिकाल से ही काफी रहा है। उत्तराखंड में अलकनंदा नदी के किनारे बसी थी यक्षनगरी अलकापुरी। कहते हैं उत्तराखंड की लोककला ऐपण में भी यक्ष संस्कृति का प्रमुख योगदान है। यक्षों के बसाये अनेक मंदिर और उनसे जुड़े अनेक मंदिर है उत्तराखंड में  उन्ही मंदिरो में से अल्मोड़ा में स्थित माँ जाखन देवी का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है।…

Read More

कोट कांगड़ा देवी उत्तराखंड : वैसे तो कोट कांगड़ा देवी का मूलस्थान हिमाचल के कांगड़ा जनपद के मुख्यालय में है किन्तु इसका एक मंदिर कुमाऊं मण्डल के अल्मोड़ा जनपद की रानीखेत तहसील में उसके मुख्यालय से रानीखेत-चौखुटिया रोड पर उत्तर की तरफ 38 किमी. तथा अल्मोड़ा से उत्तर पश्चिम की ओर समुद्र की सतह से 1540 मी. की ऊंचाई पर स्थित अल्मोड़ा जिला के द्वाराहाट नामक कस्बे में स्थित है। इसे यहां के चौधरी और शाह  लोगों की कुलदेवी कहा जाता है। चौधरी और शाह लोग नवरात्रों और अन्य शुभ अवसरो पर यहाँ पूजा अर्चना करते हैं। और शाह चौधरी लोगो…

Read More