Wednesday, April 2, 2025
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मुक्तेश्वर महादेव मंदिर नैनीताल उत्तराखंड और चौली की जाली

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में मुक्तेश्वर नामक बेहद खूबसूरत और रमणीय स्थल है। इसकी ऊंचाई समुद्र तल से 2286 मीटर है। मुक्तेश्वर से त्रिशूल, नन्दा देवी आदी हिमालयी चोटियों के नयनाभिराम दर्शन होते हैं। इस स्थान को स्थानीय रूप से मोतेश्वर कहा जाता है। यह स्थान नैनीताल जिला मुख्यालय से 52 किलोमीटर और हल्द्वानी काठगोदाम से लगभग 76 किलोमीटर (बाया ज्योलिकोट) पर स्थित है। यह क्षेत्र अपने नैसर्गिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। मुक्तेश्वर में अंग्रेजों ने सन 1890 में विश्व के प्रमुख सस्थान” भारतीय पशु चिकित्सा अनुसन्धान संस्थान” की स्थापना की गयी थी। यह आज भी सक्रीय है लेकिन अब इसका मुख्यालय इज्जत नगर बरेली में है। उस समय फ्रिज ना होने के कारण यह स्थान अधिकतम ठंडा होने के कारण अल्फ्रेड लिनगार्ड ने 1893 ई में, 300 एकड़ जमीन पर” इम्पीरिअल वैटरिनरी इंस्टीटूट” को पूना से स्थानांतरित करके यहाँ स्थापित किया। यहाँ पर एंथ्रेक्स, कालाज्वर, टिटनेस के टीके बनवाये। जिसे बाद में बरेली स्थान्तरित कर दिया गया।

मुक्तेश्वर महादेव मंदिर नैनीताल के बारे में –

यहां एक ऊँची चोटी पर भगवान शिव को समर्पित मन्दिर है। यह मन्दिर मुक्तेश्वर मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस मन्दिर तक जाने के लिए लगभग एक हजार (1000) सिड़ियाँ चढ़नी पड़ती है। यह मन्दिर भगवान शिव को समर्पित 18 विशेष मन्दिरों में से एक है। कहते हैं, यह मन्दिर 350 वर्ष पुराना मंदिर है। इस मंदिर का नाम मूलतः “मोटेश्वर” प्रतीत होता है,जिसका सांस्कृतिक करण हो जाने के कारण मुक्तेश्वर कहा जाने लगा है। राहुल सांकृतायन के अनुसार कत्यूरी शाशनकाल (850 -1050 ई) में मुक्तेश्वर महादेव के प्रधान पुजारी लकुशीश सम्प्रदाय के शैव हुवा करते थे। कहते है, कत्यूरी राजाओं ने इसे एक रात में बनाया था। यह भी माना  जाता है कि पांडवों ने भी इस मंदिर को अपनी उपस्थिति से प्रतिष्ठित किया था। मुक्तेश्वर महादेव नाम पड़ने के पीछे एक लोक कथा यह भी है कि यहाँ भगवान् शिव और एक विशाल दानव का युद्ध हुवा था।  जिसमे दानव को भगवान शिव के हाथों मुक्ति मिली थी। मुक्तेश्वर के बारे में मान्यता है कि, भगवान् भोलेनाथ यहाँ अपने भक्तों को सभी कष्टों से मुक्ति देते हैं।  यह प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि पर विशाल मेले का आयोजन होता है। कहते हैं महादेव यहाँ निःसन्तानों की मनोकामना पूर्ति करते हैं।

चौली की जाली से होती है निःसन्तानो की मनोकामना पूर्ति

शिवरात्रि में उत्तराखंड के इस मंदिर में आस्था का एक अनोखा मेला लगा रहता है। मुक्तेश्वर मंदिर के पास एक चौली की जाली नामक पर्यटन स्थल है। चौली की जाली एक बड़े चट्टान पर एक छिद्र है।  जो काफी ऊंचाई पर है। यह एक प्राकृतिक छेद है। चौली की जाली के बारे में लोगों का विश्वास है की ,उत्तराखंड में शिवरात्रि के दिन जो इसे पार करेगा ,उसे संतान सुख की प्राप्ति होगी। सुरक्षा व्यवस्था न होने के कारण भी ,संतान सुख की कामना में निसंतान महिलाएं इस छिद्र को पार कर लेती है।

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मुक्तेश्वर
मुक्तेश्वर चौली की जाली

चौली की जाली के बारे में लोक कथा इस प्रकार है कि आदिकाल में भगवान् शिव मुक्तेश्वर में साधना में लीन थे ,तभी वहां से गोरखनाथ महाराज निकले ,उन्होंने भगवान शिव से रास्ता माँगा तो ध्यान मगन होने के कारण शिवजी उनका आग्रह नहीं सुन पाए। तब गोरखनाथ जी ने अपने अस्त्र से चट्टान में छेद कर दिया ,और अपने शिष्यों के साथ वहां से निकल गए। कुछ लोग मानते हैं कि पांडव भी मुक्तेश्वर महादेव मंदिर नैनीताल आये थे , तब भीम ने अपनी गदा के प्रहार से चट्टान पर यह निशान बना दिया। कुछ लोग इसे वायु अपरदन के कारण बना छिद्र बताते हैं।

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बहरहाल जो भी हो मुक्तेश्वर मंदिर उत्तराखंड के पास स्थित यह प्राकृतिक छिद्र ,आस्था और पर्यटन का प्रमुख आकर्षण है।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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