नंदा देवी राजजात और बड़ी जात – उत्तराखंड में मां नंदा देवी को बेटी यानी ध्याण मानने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। नंदा को मायके से ससुराल यानी कैलास की ओर विदा करने से जुड़ी कई धार्मिक यात्राएं होती हैं। इनमें नंदा जात और नंदा राजजात का विशेष महत्व है।
नंदा जात हर वर्ष नंदाष्टमी के अवसर पर होने वाली देवयात्रा है, जबकि हर बारह वर्ष के बाद राजवंशीय कुंवरों की ओर से विशेष रूप से आयोजित की जाने वाली यात्रा को नंदा राजजात कहा जाता है। लेकिन 2026 में नंदा देवी की बड़ी जात और 2027 में होने वाली नंदा राजजात को लेकर लोगों के मन में कई सवाल हैं। आखिर बड़ी जात और राजजात में क्या अंतर है? एक ही परंपरा से जुड़ी दो यात्राएं लगातार दो वर्षों में क्यों हो रही हैं? इसे समझने के लिए पहले नंदा जात और राजजात की पूरी परंपरा को समझना जरूरी है।
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नंदा जात क्या है?
नंदाजात भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को नंदा देवी के सम्मान में की जाने वाली देवयात्रा है। इस दिन को नन्दाष्टमी के नाम से जाना जाता है। कुमाऊं में अल्मोड़ा और गढ़वाल के सीमांत जनपद चमोली में इसे नंदा की विदाई के रूप में मनाया जाता है।
यहां के लोगों की आस्था है कि कैलासवासी भगवान शिव को पति के रूप में वरण करने वाली नंदा यानी पार्वती इसी क्षेत्र की पर्वतीय कन्या थीं। मान्यता है कि नंदा अपनी ससुराल त्रिशूल पर्वत यानी बधाण से हर वर्ष श्रावण मास में कुछ दिनों के लिए अपने बंधु-बांधवों से मिलने मायके चांदपुर आती हैं। नन्दाष्टमी से कुछ दिन पहले यहां के लोग अपनी बेटी नंदा को जरूरी भेंट और सौगात देकर स्नेहपूर्वक ससुराल के लिए विदा करते हैं। इस वार्षिक अनुष्ठान को नंदाजात कहा जाता है।
इसके अलावा हर बारह वर्ष के बाद राजवंशीय कुंवरों द्वारा नंदा को ससुराल भेजने के लिए जो विशेष समारोहात्मक और राजकीय आयोजन किया जाता है, उसे नंदाराजजात यानी नंदा की राजकीय यात्रा कहा जाता है।
चमोली में नंदा जात की परंपरा –
गढ़वाल के चमोली जनपद में नंदा जात दो स्तरों पर मनाई जाती है। एक ग्राम स्तर पर और दूसरा क्षेत्रीय या राजकीय स्तर पर। चमोली में इस दिन लोग अपनी बेटी नंदा का कुशल समाचार लेने और उसे समौण यानी उपहार या सौगात देने के लिए आसपास के बुग्यालों की यात्रा करते हैं। इसे जातरू जाना कहा जाता है।
इसके लिए नागपंचमी या षष्ठी के दिन गांव के नंदा देवी मंदिर के चौक, पंचायती चौक या किसी सामूहिक स्थान पर लोग एकत्र होते हैं। यदि यात्रा चौक से शुरू होती है तो वहां एक पटाल को गाय के गोबर से लीप-पोतकर शुद्ध किया जाता है।गांव के शिल्पी रिंगाल की तीतियों और भूर्जपत्र के पत्तों से छंतोलियां यानी छत्र तैयार करते हैं।
गांव की महिलाएं अपनी ध्याण यानी बेटी नंदा के लिए थालियों में उपहार लेकर आती हैं। इनमें ककड़ी, मुंगरी, च्यूड़ा, भुजेला और श्रृंगार की सामग्री जैसे टिकुली, बिन्दुली, काजल, सिंदूर आदि शामिल होते हैं। इस जातरा में कौन लोग जाएंगे, इसका निर्णय हर गांव अपनी परंपरा के अनुसार करता है। कहीं इसका निर्णय पारिवारिक स्तर पर होता है, कहीं देवता के पश्वाओं के स्तर पर और कहीं ग्राम स्तर पर।
हर गांव खुद को नंदा का मैती और नंदा को अपनी ध्याण मानता है। इसलिए लोग कंडी में सौगात और श्रृंगार का सामान पीठ पर लादकर तथा कंधे पर छंतोली लेकर नंदा की यात्रा पर निकलते हैं। यह यात्रा नंगे पैर की जाती है। इसके पीछे मान्यता है कि नंदा का मूल ससुराल कैलास पर्वत है, जो बहुत दूर और अगम्य है। इसलिए गांव के लोग अपने क्षेत्र के सबसे ऊंचे बुग्याल को ही नंदा का ससुराल मानकर ग्राम स्तरीय यात्रा वहीं तक करते हैं।
नंदा राजजात का इतिहास –
गढ़वाल की नंदा राजजात के संदर्भ में इतिहासज्ञों का मानना है कि सातवीं शती में धारानगरी यानी मालवा के शासक कनकपाल ने गढ़वाल के राजा भानुप्रताप की पुत्री से विवाह किया था। कहा जाता है कि कनकपाल को दहेज के रूप में अपने राज्य के अंतर्गत एक गढ़ी दी गई थी। राजकन्या होने के कारण लोगों के बीच उसके प्रति स्नेह था। उसकी विदाई और यात्रा की कठिनाइयों का वर्णन लोकगीतों और संस्कार गीतों में किया जाने लगा।
बाद में 52 गढ़ियों में बिखरे गढ़वाल को एक संगठित राज्य का रूप देने वाले शासक अजयपाल ने नंदा से जुड़े गढ़वाल को भावनात्मक रूप से जोड़े रखने के लिए हर बारह वर्ष में नंदा के मायके से ससुराल जाने की परंपरा को नंदा की राजजात के रूप में पुनर्जीवित किया। इसमें पूरे गढ़वाल की भागीदारी होती है। नंदा के मूलस्थान नौटी से 19 पड़ावों में करीब 280 किलोमीटर की यात्रा करके नंदा को होमकुंड तक पहुंचाया जाता है।
पहले इस यात्रा का प्रबंधन गढ़वाल के राजकीय स्तर पर होता था। इसके बाद राजवंशीय कुंवरों ने इसकी व्यवस्था संभाली और अब इसका प्रबंधन प्रशासनिक स्तर पर किया जाता है।करीब 280 किलोमीटर की यह धार्मिक यात्रा कठिन और दुर्गम रास्तों से होकर गुजरती है और इसे एक अनोखी धार्मिक पदयात्रा माना जाता है।
नंदा उत्तराखंड के शासकों की कुलदेवी –
नंदा उत्तराखंड के शासकों की कुलदेवी के रूप में पूजित रही हैं। गढ़वाल के शासकों में उनकी मान्यता कुलदेवी राजराजेश्वरी के रूप में भी रही है। प्रदेश में नंदा के सम्मान में अलग-अलग पीठ स्थापित हैं, जहां जनसामान्य समय-समय पर श्रद्धा अर्पित करते हैं। नन्दाष्टमी के अवसर पर भी विशेष आयोजन होते हैं। लेकिन बारह वर्षों के बाद आयोजित होने वाली राजजात का स्थान उत्तराखंड में आयोजित होने वाली सभी देवयात्राओं में विशेष माना जाता है।
नंदा राजजात की शुरुआत कब हुई?
नंदा राजजात की शुरुआत कब और किसके द्वारा हुई, इसके बारे में कोई लिखित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता। नंदा से जुड़ी लोकगाथाओं और जनश्रुतियों के आधार पर माना जाता है कि इसका प्रारंभ प्रथम सहस्राब्दि के अंतिम चरण यानी नौवीं शताब्दी में हुआ था। इस संबंध में कई जनश्रुतियां मिलती हैं।
नंदाराजजात समिति नौटी से जुड़े लोगों का कहना है कि नौवीं शताब्दी में चांदपुर के शासक कनकपाल को स्वप्न में उनकी कुलदेवी राजराजेश्वरी नंदा दिखाई दीं। नंदा का मायका इसी क्षेत्र में माना जाता था। उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि वह अपनी ससुराल त्रिशूली यानी कैलास जाना चाहती हैं।
राजा ने पूरी राजकीय व्यवस्था के साथ उन्हें ससुराल तक पहुंचाने की व्यवस्था की। इसी से नंदा राजजात की शुरुआत मानी जाती है।वहीं जागर गाथाओं में इस शासक का नाम शालिपाल बताया गया है। एक अन्य गाथा के अनुसार दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के रूप में आत्माहुति देने के बाद नंदा ने ऋषिकेश के हेमन्त आश्रम में जन्म लिया था। इसी स्थान को उनका मायका माना जाता है।
राजा भानुप्रताप और कनकपाल की कथा –
नौटी से नंदा की विदाई के विषय में एक और जनश्रुति प्रचलित है। कहा जाता है कि चांदपुर गढ़ी के परम धार्मिक राजा भानुप्रताप, जिन्हें नौवीं शती का शासक माना जाता है, को श्रीयंत्र की सिद्धि प्राप्त थी। इस यंत्र के प्रभाव से उन्हें देवभाग्य का ज्ञान भी था। एक बार उन्हें आकाशवाणी हुई कि वह अपनी पुत्री का विवाह मालवा के परमारवंशी राजा कनकपाल से करें। कनकपाल बद्रीनाथ धाम की यात्रा पर आ रहे थे। आकाशवाणी में राजा को यह भी कहा गया कि विवाह के बाद वह स्वयं बदरिकाश्रम जाकर तपस्या करें।
राजा ने श्रीयंत्र के आदेश को स्वीकार किया और अपनी पुत्री का विवाह कनकपाल के साथ कर दिया। दहेज में श्रीयंत्र के साथ चांदपुर का शासन भी उन्हें सौंप दिया और स्वयं बदरिकाश्रम चले गए। कहा जाता है कि इस विवाह के अवसर पर उनकी कुलदेवी हेमन्तपुत्री नंदा भी वहां आई थीं। उन्हें यह स्थान पसंद आया, क्योंकि यह उनके मायके ऋषिकेश और ससुराल कैलास यानी त्रिशूली के बीच में पड़ता था। उनके साथ मायके के कुछ गौड़ ब्राह्मण भी आए थे। राजा ने उन्हें राजपुरोहित के रूप में नियुक्त करके नौटी गांव में ही बसा दिया।
बाद में नौटी गांव में रहने के कारण वे लोग नौटियाल कहलाने लगे, ऐसी मान्यता है। अपने राजगुरु के निर्देश पर राजा ने श्रीयंत्र को पूरे विधि-विधान के साथ नौटी के चौराहे पर पृथ्वी में स्थापित करवाया। इन्हीं आधारों पर नौटी को नंदा का मूल शक्तिपीठ और इस क्षेत्र को नंदा का मायके का देश माना जाने लगा। इसके बाद परमारवंशी राजाओं द्वारा अपनी कुलदेवी नंदा को ससुराल भेजने की परंपरा शुरू हुई। हर बारह वर्ष में राज्य की ओर से इसका विशेष प्रबंधन किए जाने के कारण इसे राजजात कहा जाने लगा।
12 साल में ही क्यों होती है राजजात ?
इस यात्रा को बारह वर्ष बाद आयोजित करने के पीछे भी लोकमान्यता है। माना जाता है कि पर्वतीय प्रदेश की कठिन यात्रा के कारण नंदा हर वर्ष अपने मायके नहीं आ सकतीं। इसलिए बारह वर्ष बाद ही यहां आती हैं। लोकमान्यता के अनुसार जब बारह वर्ष बाद नंदा को यहां आना होता है तो उनके संदेश के रूप में क्षेत्र में एक चौसिंगा मेढ़ा यानी खाडू जन्म लेता है। कहा जाता है कि वह स्वप्न में राजा या उसके प्रतिनिधि को अपने आगमन की सूचना देता है। इसके बाद पूरे क्षेत्र में उस चौसिंगे मेढ़े की खोज की जाती है। उसके मिल जाने पर राजजात की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
नंदा की विदाई बेटी की तरह होती है –
नौटी और यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले क्षेत्रों में नंदा की विदाई बिल्कुल उसी तरह की जाती है, जैसी पहाड़ी क्षेत्रों में मायके से ससुराल जाने वाली विवाहिता कन्या की होती है। लोकमानस में नंदा को इस क्षेत्र की बेटी माना गया है। इसलिए अपने मायके चांदपुर से भगवान शिव के आवास स्थल बधाण की सीमा में पड़ने वाले त्रिशूली पर्वत के मूल में स्थित होमकुंड तक उन्हें पहुंचाने की जिम्मेदारी उनके मायके वालों की मानी जाती है। राजपरिवार की ओर से राजकीय सम्मान के साथ नंदा को पहुंचाए जाने के कारण इसे नंदा राजजात कहा गया।
राजजात की व्यवस्था कांसुवा के कुंवरों ने कैसे संभाली ?
कहा जाता है कि राजा के जीवनकाल में इस जात यानी यात्रा का प्रबंधन स्वयं राजा करते थे। बाद में उनके न रहने पर इस यात्रा की व्यवस्था उनके कनिष्ठ यानी कान्सा भाई ने संभाली। वह नौटी के निकटस्थ गांव में रहते थे। उनके कनिष्ठ होने के कारण इस गांव का नाम कांसुवा या काणसुआ पड़ा, ऐसी मान्यता है। इसके बाद इस द्वादश वार्षिकी यात्रा की व्यवस्था राजवंशी कुंवरों द्वारा की जाती रही।
कांसुवा या काणसुआ के राजा नंदा को अपनी पुत्री मानते हुए उनके ससुराल जाने के अवसर पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ विदा करते थे। इसमें वहां की जनता भी सहयोग करती थी। इसी कारण अभी भी राजजात के शुभारंभ की परंपरा कांसुवा से जुड़ी हुई है।
ससुराल के लिए यात्रा शुरू करने से पहले नंदा नौटी में होने वाले धार्मिक अनुष्ठान के बाद कांसुवा आती हैं। कांसुवा के राजवंशी कुंवर नंदा के आच्छादन के लिए रिंगाल यानी पहाड़ी वेतस और भोजपत्र से तैयार विशेष छंतोली तथा चौसिंगा मेढ़ा लेकर नौटी पहुंचते हैं।वहां श्रीयंत्र का विधिवत पूजन करके शक्ति का आवाहन किया जाता है। यात्रा का पथप्रदर्शन करने वाले चौसिंगा मेढ़े का पवित्रीकरण किया जाता है और उसमें देवी शक्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। इसके बाद शुभ मुहूर्त में राजजात शुरू होती है।
नंदा राजजात का ऐतिहासिक आयोजन –
जनश्रुतियों के अनुसार द्वादश वार्षिकी यात्रा की शुरुआत नौवीं शती के आसपास हो चुकी थी। लेकिन उन्नीसवीं शती से पहले का कोई ऐतिहासिक लेखाजोखा उपलब्ध नहीं है। इसलिए निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि इसका आयोजन हमेशा ठीक बारह वर्ष के अंतराल पर ही होता रहा या कभी आगे-पीछे भी हुआ। गढ़वाल के पंवार शासकों की वंशपरंपरा से जुड़े और गढ़वाल के इतिहासकार श्री शूरवीरसिंह पंवार के अनुसार इस प्रकार की सामूहिक राजजात का पहला आयोजन सन् 1881 में हुआ था। इसके बाद दूसरी यात्रा 1905 में, तीसरी 1925 में, चौथी 1951 में, पांचवीं 1966 में और छठी 1987 में हुई।
इसके बाद सातवीं यात्रा 2000 में हुई। इसका प्रबंधन राजकुंवरों की ओर से नहीं, बल्कि राज्य प्रशासन की ओर से किया गया था। इस विवरण से यह बात सामने आती है कि राजजात के आयोजन में हर बार ठीक बारह वर्ष के अंतराल का पालन नहीं हुआ। इसके बाद अगली यात्रा 2012 में अपेक्षित थी, लेकिन कतिपय कारणों से उस समय इसका आयोजन नहीं हो सका। बाद में प्रशासन की ओर से यह यात्रा 2014 में कराई गई।
अब इसके बाद की अगली नंदा राजजात 2027 में होगी। यही वजह है कि 2026 में होने वाली बड़ी जात और 2027 में होने वाली राजजात को लेकर चर्चा हो रही है।
राजजात की तारीख कैसे तय होती है?
बारह वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित होने वाली इस धार्मिक यात्रा का निर्णय करने और शुभ मुहूर्त व तिथि तय करने से पहले राजपरिवार के लोग नौटी के राजराजेश्वरी मंदिर में देवी से मनौती मांगते हैं। इसके बाद अनुकूल तिथि तय की जाती है। इसमें विशेष ध्यान रखा जाता है कि यात्रा कुलसारी नामक पड़ाव पर भाद्रपद की अमावस्या को और होमकुंड में नन्दाष्टमी के दिन पहुंचे।
इसी संदर्भ में पूरे क्षेत्र में उस चौसिंगा मेढ़े के जन्म की खोज की जाती है, जो पिछली यात्रा के बाद पैदा हुआ होता है। मान्यता है कि यही मेढ़ा देवी के वस्त्र-आभूषण और भेंट सामग्री के साथ यात्रियों का होमकुंड तक पथप्रदर्शन करता है। इसके बाद उसे लेकर वह त्रिशूली पर्वत शिखर की ओर चला जाता है। जब मेढ़े का पता चल जाता है तो इसकी सूचना कांसुवा के राजवंशी कुंवरों को दी जाती है। इसके बाद यात्रा के लिए जरूरी सामग्री बनाने का काम शुरू होता है।
राजछंतोली कैसे तैयार होती है?
यात्रा के प्रमुख आकर्षणों में राजछंतोली शामिल है। यह रिंगाल और भोजपत्र से तैयार किया गया छत्र होता है। इसके निर्माण की जिम्मेदारी रूढ़ियागांव के परंपरागत राज यानी मिस्त्रियों और रूढ़ियों को दी जाती है। वे शुभ मुहूर्त में नंदा के जागर गीतों के साथ इसका निर्माण शुरू करते हैं। राजछंतोली तैयार होने के बाद राजपुरोहित विशेष वनस्पतियों और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ इसकी पूजा और प्राणप्रतिष्ठा करते हैं। इसके बाद इसे यात्रा के संयोजकों यानी कांसुवा के कुंवरों को सौंप दिया जाता है। इसी के साथ नौटी के पारंपरिक स्वर्णकारों को भगवती नंदा के स्वर्ण आभूषण बनाने का आदेश दिया जाता है।
वे परंपरागत रूप और आकार के आभूषण तैयार करते हैं। तैयार होने के बाद पुरोहितों द्वारा विशेष पूजा और अनुष्ठान किए जाते हैं और फिर इन्हें आयोजकों को सौंप दिया जाता है।
चौसिंगा मेढ़े की विदाई कैसे होती है?
मेढ़े के जन्म की सूचना मिलने के बाद यात्रा शुरू होने वाले दिन सुबह कांसुवा के कुंवर उस व्यक्ति के घर जाते हैं, जिसके यहां चौसिंगा मेढ़े ने जन्म लिया होता है। परिवार और गांव के लोग उसका साज-श्रृंगार करते हैं। उसके करबच यानी फांचा या गूंण में नंदा की भेंट सामग्री रखी जाती है। इसके बाद जुदाई के भावुक गीतों के साथ परिवार और गांव के लोग उसे गांव की सीमा तक विदा करते हैं। देवी के प्रतिनिधि के रूप में उसे सम्मानपूर्वक कांसुवा लाया जाता है और उसकी सेवा-शुश्रूषा की जाती है।
नौटी में नंदा की विदाई की तैयारी –
देवी की पवित्र पीठ नौटी में होने के कारण यात्रा शुरू होने से पहले विशेष अनुष्ठान किया जाता है। कांसुवा के राजकुंवर श्रीयंत्र की देवी की सुवर्ण प्रतिमा, चौसिंगा खाडू और छंतोली के साथ देवी की प्राणप्रतिष्ठा करते हैं।
चौसिंगा मेढ़े और राजछंतोली को सजाया जाता है।
नौटी में नंदा को बेटी मानने की परंपरा के अनुसार वहां के लोग अपनी बेटी नंदा के लिए नथ, अंगूठी, बुलाक, चांदी की जयमाला आदि की व्यवस्था करते हैं। इसके अलावा देवी की हंसुली, धागुले, चूड़ी, बिन्दी और परांदी यानी चोटी के लिए सामग्री भी तैयार की जाती है विदाई की सारी व्यवस्था पूरी होने के बाद चौसिंगा खाडू के सींगों पर चुनरी, चूड़ियां और जेवर बांध दिए जाते हैं।
नंदा की विदाई का भावुक दृश्य –
पूजा के बाद यात्रा में शामिल सभी लोगों को भोजन कराया जाता है। प्रस्थान से पहले सभी की पिठाई यानी रोली का टीका किया जाता है। महिलाएं कन्या की विदाई से जुड़े गीत गाती हैं। इस अवसर पर पूरा वातावरण ऐसा हो जाता है जैसे विवाह के बाद पहली बार किसी बेटी को ससुराल के लिए विदा किया जा रहा हो। वृद्ध महिलाएं यात्रा पर जाने वाले लोगों से नंदा की सुख-सुविधा का ध्यान रखने और उन्हें सकुशल त्रिशूली पर्वत तक पहुंचाने का अनुरोध करती हैं। कांसुवा का पूरा नारी वर्ग भीगी पलकों और भावुक मन से गांव की सीमा तक नंदा को विदा करने आता है।
यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले सभी गांवों और पड़ावों पर भी विदाई का ऐसा ही वातावरण दिखाई देता है। यात्रा में सबसे आगे चौसिंगा मेढ़ा चलता है। इसके बाद नंगे पैर चार पालकी वाहकों के कंधों पर देवी की अलंकृत प्रतिमा वाली पालकी होती है।
यह पालकी पीले रेशमी पट से बनी शंक्वाकार होती है। इसके बाद राजछंतोली चलती है। फिर ढोल-दमामों के साथ वाद्य बजाने वाले और उनके पीछे अन्य यात्री होते हैं। इस यात्रा में कुमाऊं से आने वाली यात्रा भी सम्मिलित होती है।
2026 में बड़ी जात और 2027 में राजजात क्यों?
अब बात उस सवाल की, जिसकी वजह से इस समय नंदा देवी की यात्रा को लेकर चर्चा है। बारह वर्ष के लंबे इंतजार के बाद मां नंदा देवी की बड़ी जात एक बार फिर हिमालय की ओर बढ़ रही है। अंतर यह है कि 2026 में शुरू हुई यह यात्रा सरकारी स्तर पर नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर हो रही है। सरकार 2027 में इस यात्रा को भव्य रूप में मनाने की बात कर रही है।
चमोली जिले के कुरुड़ स्थित नंदा धाम से शनिवार 5 सितंबर 2026 को नंदा देवी बड़ी जात यात्रा के नाम से यात्रा शुरू हुई और कैलास के लिए रवाना हो गई। डोली के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शामिल हैं। इस यात्रा का समापन 30 सितंबर को होमकुंड में पूजा-अर्चना के साथ होगा।
इस बार दो यात्राएं क्यों हो रही हैं?
इस बार दो यात्राएं होने की वजह नौटी आयोजन समिति और कुरुड़ पक्ष से जुड़ी है। नौटी आयोजन समिति ही पहले इस साल नंदा राजजात की तैयारी कर रही थी। इसके बाद उन्होंने मलमास का हवाला देते हुए इस साल यात्रा को स्थगित कर दिया। इसके साथ ही कुरुड़ ने यात्रा के शुरुआती पड़ाव ईड़ाबधाड़ी पर विरोध जताया। कुरुड़ पक्ष का कहना है कि इस यात्रा में उनका अहम स्थान है। उनका मानना है कि इस यात्रा का सही नाम बड़ी जात है।
कुरुड़ पक्ष के अनुसार बाद के आयोजनों में इसे राजजात नाम दिया गया और इसे राजपरिवार से जोड़ दिया गया। कुरुड़ का कहना है कि इस यात्रा में नौटी और कांसुवा के कुंवरों की भूमिका बढ़ी है, जबकि उनकी भूमिका कम हुई है। उनके अनुसार यात्रा की पुरानी और धार्मिक परंपराओं में आज भी उनका महत्व अधिक है। इसी वजह से नौटी आयोजन समिति द्वारा यात्रा स्थगित किए जाने के बाद कुरुड़ पक्ष ने 2026 में बड़ी जात निकालने का फैसला किया।
2026 की बड़ी जात और 2027 की राजजात में क्या अंतर है?
सीधे शब्दों में समझें तो नंदा को बेटी मानकर उनके मायके से ससुराल कैलास की ओर विदा करना इस पूरी परंपरा का मूल भाव है। नंदा जात स्थानीय स्तर पर नंदा की वार्षिक विदाई से जुड़ी यात्रा है। इसमें गांव के लोग अपनी ध्याण नंदा के लिए समौण लेकर बुग्यालों की ओर जाते हैं। बड़ी जात नंदा की बड़ी देवयात्रा के रूप में जानी जाती है। 2026 में कुरुड़ पक्ष की ओर से इसे स्थानीय स्तर पर निकाला जा रहा है।
वहीं नंदा राजजात बारह वर्ष के अंतराल से जुड़ी विशेष यात्रा है, जिसमें नौटी, कांसुवा के राजवंशी कुंवरों और राजकीय परंपरा की भूमिका रही है। इसलिए 2026 में हो रही बड़ी जात और 2027 में होने वाली राजजात का मूल धार्मिक भाव एक ही परंपरा से जुड़ा है, लेकिन वर्तमान में इनके आयोजन का स्वरूप, स्थान और आयोजक पक्ष अलग हैं। यही वजह है कि इस बार नंदा की यात्रा लगातार दो वर्षों में अलग-अलग रूप में दिखाई दे रही है।
नंदा को पहाड़ की बेटी मानकर उन्हें मायके से ससुराल विदा करने की यह परंपरा केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि यहां के लोकजीवन से जुड़ा भावनात्मक और धार्मिक आयोजन है। नंदा जात हो, बड़ी जात हो या राजजात—इन सभी में नंदा को अपनी बेटी मानकर उनके सकुशल कैलास पहुंचने की कामना की जाती है।
संदर्भ – उपरोक्त लेख का संदर्भ प्रोफसर देवीदत्त शर्मा जी द्वारा लिखित पुस्तक उत्तराखंड ज्ञानकोष एवं उत्तराखंड के अन्य ऐतिहासिक पुस्तकों तथा उत्तराखंड में छपने वाले डिजिटल एवं प्रिंट मिडीया के समाचार पत्रों से लिया गया है।
नंदा देवी की कहानी पर आधारित वीडियो देखिये –
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