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चार धाम यात्रा का इतिहास | चार धाम की यात्रा पर निबंध

चार धाम की यात्रा का इतिहास | चार धाम की यात्रा पर संशिप्त निबंध

चार धाम का इतिहास -चार धाम की यात्रा हर एक भारतीय का सपना होता है। आध्यात्मिकता व्यक्ति को शांति  प्राप्त करने के लिए एक दिव्य यात्रा पर चलने के लिए प्रेरित करती है। और एक ऐसी यात्रा, हिमालय के आकर्षक गढ़वाल में स्थित पवित्र चारधाम यात्रा है। चारधाम यात्रा, हिंदू संस्कृतियों और आकर्षक हिमपातिक हिमालय की सुंदरता निहारने का शानदार अवसर है।  चार प्रमुख पवित्र स्थलों की यात्रा – यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ (जिन्हें चार ‘धाम’ भी कहा जाता है) भक्तों के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव से कम नहीं है। इन स्थानों का  अपना अलग-अलग और पौराणिक इतिहास रहा है। 1950 तक उत्तराखंड के चार सबसे पवित्र स्थलों की ओर जाना कठिन था, क्योंकि उस समय श्रद्धालु पैदल चलकर यह यात्रा संपूर्ण करते थे। 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद, भारत ने सीमावर्ती इलाकों को आपस मे बेहतर कनेक्टिविटी और बुनियादी ढांचे का निर्माण किया है। चार धाम  यात्रा कब शुरू की गई इसके बारे में कोई ठोस प्रमाण नहीं है। महाभारत के अनुसार वनवास के दौरान यह यात्रा पांड्वो द्वारा भी की गई थी। महाभारत में केदारनाथ का वर्णन किया गया है। स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में भी बद्रीनाथ मंदिर का जिक्र मिलता है।इसके आलावा स्कंद पुराण में गढ़वाल को केदारखंड के नाम से वर्णित किया गया है. करीबन आठवी शताब्दी में आदिगुरु शंकराचार्य ने केदारनाथ और बद्रीनाथ की खोज की और इनका पुनः  निर्माण करवाया। हालाकिं उस समय इस यात्रा को हर व्यक्ति के लिए करना संभव नहीं था लेकिन जैसे जैसे यात्रा के साधनों और सुगम रास्तो का निर्माण हुआ,  इस यात्रा की तरफ आम लोगों का रुझान तेजी से बड़ा।

इसे भी जाने:- देवभूमि उत्तराखंड के चार धाम

भारतीय धर्मग्रंथों के अनुसार यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ हिंदुओं के सबसे पवित्र स्‍थान हैं। इनको चार धाम के नाम से भी जाना जाता हैं। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि जो पुण्‍यात्‍मा यहां का दर्शन करने में सफल होते हैं उनका न केवल इस जनम का पाप धुल जाता है । वे जीवन-मरण के बंधन से भी मुक्‍त हो जाते हैं। इस स्‍थान के संबंध में यह भी कहा जाता है कि यह वही स्‍थल है जहां पृथ्‍वी और स्‍वर्ग एकाकार होते हैं। तीर्थयात्री इस यात्रा के दौरान सबसे पहले यमुनोत्री (यमुना) और गंगोत्री (गंगा) का दर्शन करते हैं। यहां से पवित्र जल लेकर श्रद्धालु केदारेश्‍वर पर जलाभिषेक करते हैं। इन तीर्थयात्रियों के लिए परंपरागत मार्ग इस प्रकार है -:
हरिद्वार – ऋषिकेश – देव प्रयाग – टिहरी – धरासु – यमुनोत्री – उत्तरकाशी – गंगोत्री – त्रियुगनारायण – गौरिकुंड – केदारनाथ। 

क्यों की जाती है चार धाम यात्रा
चार धाम की यात्रा क्यों करनी चाहिये इसका जिक्र पुराणो मे है. चारो दिशाओ मे है चार धाम जगत गुरु शंकराचार्य ने किया था इनकी यात्रा का प्रचार प्रसार भगवान शिव और विष्णु के मंदिर को कहा जाता है चार धाम
लेकिन मान्यताओ के अनुसार चार धाम की यात्रा करने से इंसान जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है। जो लोग इस यात्रा को श्रधापूर्वक करते है उनके पाप धुल जाते है और मन पवित्र और शांत हो जाता है. इससे इंसान अपना जीवन ख़ुशी ख़ुशी जीता है। (चार धाम का इतिहास)

चार धाम का इतिहास

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