Saturday, June 15, 2024
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ठेकुआ -ठेकुली की कुमाऊनी लोककथा। | A famous kumauni folk tales

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ठेकुआ -ठेकुली

ठेकुआ -ठेकुली कुमाऊँ की एक प्रसिद्ध कुमाऊनी लोक कथा है। आपने कुमाऊँ में ये किस्सा तो सुना ही होगा –

लक्ष्मी नाम की झाड़ू लगाए। 
धनपति मांगे भीख। 
अमर नाम का मर गया 
तो मेरा ठेकुआ ही ठीक।

आज इसी किस्से पर आधारित एक कुमाऊनी लोककथा का संकलन करने जा रहे हैं। पहले मनोरंजन के साधन नहीं होते थे। पहाड़ो में आमा बुबु आग के किनारे बैठकर बड़े चाव से लोककथाएं सुनाते थे। और हम उन कथाओं में इस कदर खो  जाते थे कि कहानी हमारे आगे चलचित्र की तरह चलने लगती थी।

ठेकुआ -ठेकुली की कुमाऊनी लोककथा –

कहते हैं प्राचीन काल में एक गांव में एक लड़का रहता था। लड़का अच्छे स्वभाव का और मेहनती था। सबके साथ उसका व्यवहार भी अच्छा था। लेकिन उसमे एक कमी थी ,वह लम्बाई में थोड़ा नाटा था। मतलब उसकी हाइट छोटी थी। तो गांव के लोग उसे ठेकुआ कहकर बुलाते थे। या यूं समझ लीजिये उसे उसकी छोटी हाइट के लिए चिढ़ाते थे। लेकिन उसे कोई फरक नहीं पड़ता था। वो बस अपने काम पर फोकस करता था। उनकी बातों पर ध्यान नहीं देता था।

अब धीरे -धीरे समय बीता उसके अच्छे स्वभाव और मेहनत की वजह से क्षेत्र में उसका नाम काफी मशहूर हो गया था। अब वो शादी लायक हो गया तो एक अच्छी गुणवंती लड़की से उसकी शादी कर दी गई। लड़की भी उसकी तरह स्वभाव की अच्छी थी। अब लोग लड़के को ठेकुआ नाम से पुकारते थे तो ,लड़की को ठेकुआ की पत्नी होने के नाते ठेकुली नाम से पुकारने लगे। द्दोनो की जोड़ी को ठेकुआ -ठेकुली के नाम से पुकारते थे।

जहाँ लड़का लोगो की इस हरकत पर ध्यान नहीं देता था ,वही लड़की को अपने पति और खुद को ठेकुआ ठेकुली कहलवाना अच्छा नहीं लगता था। वो बार -बार कहती थी कि ये नाम ठीक नहीं है। आप अपना कोई और नाम बदलो। लेकिन ठेकुआ अर्थात लड़का कहता था कि नाम में कुछ नहीं रखा है। इंसान के कर्म अच्छे होने चाहिए। नाम कुछ भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता है।

ठेकुवा -ठेकुली

लेकिन ठेकुली नहीं मानती थी। एक बार जब वो ज्यादा जिद करने लगी तो ,ठेकुआ ने कहा ,अच्छा ठीक है। हम कही बहार शहर में जायेंगे वहां से नया नाम सोचकर वही नाम प्रचारित करेंगे। दोनों शहर पहुंच गए ,वहाँ उन्हें एक औरत झाड़ू लगाते हुए मिल गयी। तब उन्होंने उस औरत से उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम लक्ष्मी बताया। दोनों ने चौंककर एक दूसरे को देखा और आगे बढ़ गए।

आगे जाकर उन्होंने देखा एक आदमी भीख मांग रहा है। ठेकुआ ठेकुली ने उस आदमी से उसका नाम पूछा तो उसने अपना नाम धनपति बताया। उसके नाम को सुनते ही ठेकुली की चेहरे की हवाइया उड़ गई। फिर ठेकुआ ठेकुली आगे बढ़ गई। आगे बढ़कर उन्होंने देखा की एक शवयात्रा जा रही थी। तब उन्होंने उसके बारे में पूछा तो लोगो ने कहा कि इसका नाम अमर सिंह था ,बेचारा आज मर गया। तब ठेकुआ ने ठेकुली से कहा अब देख ले ठेकुली ! इतना हो गया या अच्छे नाम की तलाश में और आगे बढे ?

तब ठेकुली ने कहा ,नहीं अब नाम की खोज में आगे नहीं जाना। मै समझ गई नाम में कुछ नहीं रखा है। इंसान के कर्म अच्छे होने चाहिए। और दोनों खुशी -ख़ुशी ये बोलते -बोलते अपने गांव लौट आये। ठेकुआ और ठेकुली नाम के साथ खुशी -ख़ुशी समय बिताने लगे।

लक्ष्मी नाम की झाड़ू लगाए। 
धनपति मांगे भीख। 
अमर नाम का मर गया 
तो मेरा ठेकुआ ही ठीक।

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नौकुचियाताल | पुष्कर के सामान महत्व है कुमाऊँ के इस ताल का

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नौकुचियाताल | पुष्कर के सामान महत्व है कुमाऊँ के इस ताल का

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नौकुचियाताल

नौकुचियाताल (Naukuchiatal ) वैसे उत्तराखंड में एक से एक तालाब हैं। और उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में तालों का नगर के नाम से नैनीताल शहर प्रसिद्ध है। और नैनीताल में ही नौकुचियाताल नामक एक प्राचीन ताल है। जिसका पौराणिक कथाओं में धार्मिक महत्व बताया गया है।

नौकुचियाताल की स्थिति

कुमाऊं मंडल के नैनीताल जनपद का यह 9 कोने वाला ताल नैनीताल से 26 किमी. व भीमताल से 4 किमी. पर 29°-19-20′ उ. अक्षांश और 19°-32-38” पू. देशान्तर पर तथा समुद्रतट से 1320 मी.की ऊंचाई पर स्थित है। यह छखाता परगने का सबसे ज्यादा गहरा (135 ‘फीट), किनारों पर कम से कम 9’ फीट गहरा ताल है। 1871 में एम्सबरी के द्वारा की गयी माप के अनुसार यह अन्तर्जलस्रोतीय सरोवर 1050 मी. लम्बा, 880 चौड़ा एवं 41 मी. गहरा है। दल-दलीय भाग सहित इसका कुल क्षेत्रफल 37 हैक्टेयर है। यहां पर नौका विहार की भी सुविधा उपलब्ध है।

नौकुचियाताल का पौराणिक महत्त्व –

इसके पश्चिमोत्तरीय कोण पर हरकी पौड़ी नाम से ज्ञात तीर्थस्थल की भी मान्यता है। जहां पर पुण्य पर्वों पर पवित्र स्नानादि किये जाते हैं तथा बच्चों का मुंडन, यज्ञोपवीत भी किये जाने लगे हैं। इसके पश्चिमी कोण के दलदलयुक्त क्षेत्र में कमल उगते हैं। इसके बारे में कहा जाता है कि यहां के तालों में यही एक ऐसा ताल है जिसमें कमल के फूल उगते हैं। स्कन्दपुराण के मानसखण्ड में इसे सनत्कुमार सरोवर कहा गया है।

इसके निर्माण के सम्बन्ध में कहा गया है कि पहले यह क्षेत्र ऊसर भूमि होने से यहां पर जल का अभाव था। जब विष्णु भगवान् सनत्कुमारो के रूप में यहां आये तो लोगों ने उनको जल के अभाव की अपनी व्यथा-गाथा सुनाई। इस पर उन्होंने पुष्कर के समान अपनी अंगुलियों से भूमि का खनन कर जल को प्रकट किया। इसलिए इसका पुष्कर तीर्थ के बराबर महत्त्व बताया गया है। जो इस तालाब में स्नान करते हैं उन्हें पुष्कर तीर्थ के बराबर फल मिलता है। जो यहाँ पिंडदान करते हैं उनके १०१ कुलों का उद्धार हो जाता है।

इसके अलावा इस ताल के बारे में कहा जाता है कि नौकुचियाताल के नौ कोनो को एक साथ नहीं देखा जा सकता है। जो इसके नौ कोनो को एक साथ देख लेता है ,उसका भाग्य बदल जाता है। वो धनवान बन जाता है।

नौकुचियाताल

गर्मियों में घूमने लायक मुफीद स्थान है –

धार्मिक और पौराणिक महत्व के साथ -साथ नौकुचियाताल (naukuchiatal ) गर्मियों में घूमने लायक एक शानदार हिल स्टेशन है।  नैनीताल जिले का यह ताल एक ऑफ बीट हिल स्टेशन है। गर्मियों की चिलचिलाती गर्मी और प्रकृति के रमणीक नजारों का आनंद लेना कहते हैं तो एक बार यहाँ घूमने जरूर आये। यदि आपको प्रकृति पसंद है और आपका दिल पहाड़ो में बसता है तो नौकुचियाताल आपके लिए सर्वश्रेष्ठ स्थान है।

नौकुचियाताल में करने योग्य खास गतिविधियां –

नौकुचिया ताल (naukuchiatal ) में बहुत सारी गतिविधियां करके आप अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ पलों का आनंद ले सकते हैं।

  • नौकुचिया ताल में आप बोटिंग का आनंद ले सकते हैं। अगर आपने इस नौ कोनो वाले ताल में आकर बोटिंग नहीं की तो समझो कुछ नहीं किया।
  • यहाँ जंगल वाक के लिए सर्वश्रेष्ठ है। प्रकृति के बीच रहकर प्रकृति में खो जाना उसके सौंदर्य को आत्मसात करते हुए जीवन के बेमिसाल पलो का आनंद लेना ,इससे अच्छा क्रियाकलाप कुछ नहीं हो सकता।
  •  यदि आप पक्षियों के दीदार के शौकीन हो तो नौकुचियाताल और यहाँ से नजदीक जंगलिया गांव में आपका यह शौक पूरा हो सकता है।
  • फोटोग्राफी के शौकीन लोगो के लिए स्वर्ग है यह डेस्टिनेशन। एक से एक बढ़कर एक नज़ारे और सुंदर पक्षी फोटोग्राफरों को अच्छा ऑब्जेक्ट और कंटेंट देते हैं।

पौराणिक गाथा संदर्भ – उत्तराखंड ज्ञानकोष ,लेखक प्रोफ़ेसर DD शर्मा जी। 

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रजनीकांत ने बद्रीनाथ धाम में किए दर्शन, पुलिस ने दिया स्मृति चिन्ह

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रजनीकांत ने बद्रीनाथ धाम में किए दर्शन, पुलिस ने दिया स्मृति चिन्ह

चमोली, 1 जून 2024: भारतीय फिल्म जगत के दिग्गज अभिनेता रजनीकांत आज बद्रीनाथ धाम पहुंचे और भगवान बद्री विशाल के दर्शन किए। थानाध्यक्ष नवनीत भंडारी ने रजनीकांत को स्मृति चिन्ह भेंट कर उनका स्वागत किया। रजनीकांत ने दर्शन के बाद कहा कि “बद्रीनाथ धाम के दर्शन से मैं अविभूत हूं। यहां का वातावरण अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक है। मैंने भगवान बद्री विशाल से जन कल्याण और देश की सुख समृद्धि की कामना की है।”

रजनीकांत के बद्रीनाथ आगमन से क्षेत्र में उत्साह का माहौल है। उनके दर्शन के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। रजनीकांत ने कुछ देर भक्तों से भी बातचीत की और उनकी खुशी में शामिल हुए।

यह रजनीकांत का बद्रीनाथ धाम का पहला दौरा है। उन्होंने कहा कि वह हमेशा से ही यहां आना चाहते थे और आज उनकी यह इच्छा पूरी हो गई। उन्होंने कहा कि वह भविष्य में भी यहां जरूर आएंगे।

रजनीकांत के बद्रीनाथ आगमन से क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई थी। थानाध्यक्ष नवनीत भंडारी ने कहा कि “रजनीकांत की सुरक्षा के लिए पुख्ता बंदोबस्त किए गए थे। उनके दर्शन के दौरान किसी भी प्रकार की कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।”

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रजनीकांत का बद्रीनाथ धाम दौरा क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे यहां पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

एस्ट्रो टूरिज्म: नैनीताल में अब पर्यटक ब्रह्मांड के रहस्यों से भी होंगे रूबरू!

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एस्ट्रो टूरिज्म: नैनीताल में अब पर्यटक ब्रह्मांड के रहस्यों से भी होंगे रूबरू!

नैनीताल: अपनी मनोरम प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध, नैनीताल अब ब्रह्मांड के प्रति उत्साही लोगों के लिए भी एक आकर्षक गंतव्य बन गया है। कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) द्वारा शुरू की गई एक नई पहल के तहत, पर्यटक अब नैनीताल आकर ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर कर सकते हैं।

यह पहल, जिसे “एस्ट्रो टूरिज्म” नाम दिया गया है, पर्यटकों को ब्रह्मांड की विशालता और रहस्यों का अनुभव करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है। KMVN द्वारा संचालित, यह कार्यक्रम प्रतिदिन 25 सदस्यों के समूह को एरीज स्थित प्रसिद्ध आर्यभट्ट प्रेक्षण संस्थान ले जाता है।

आर्यभट्ट प्रेक्षण संस्थान में खास क्या है?

आर्यभट्ट प्रेक्षण संस्थान, खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान के अध्ययन के लिए समर्पित एक अत्याधुनिक संस्थान है। यह संस्थान विभिन्न प्रकार के दूरबीनों और उपकरणों से सुसज्जित है जो पर्यटकों को ग्रहों, सितारों, आकाशगंगाओं और ब्रह्मांड की अन्य खगोलीय वस्तुओं को करीब से देखने का अवसर प्रदान करते हैं।

आर्यभट्ट प्रेक्षण संस्थान नैनीताल
आर्यभट्ट प्रेक्षण संस्थान नैनीताल

संस्थान के अनुभवी खगोलविद पर्यटकों को ब्रह्मांड की उत्पत्ति, विकास और रहस्यों के बारे में रोचक और जानकारीपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। वे जटिल खगोलीय अवधारणाओं को सरल शब्दों में समझाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि हर कोई इन अद्भुत खगोलीय घटनाओं का आनंद ले सके।

एस्ट्रो टूरिज्म के लाभ:

  1. ब्रह्मांड के बारे में जागरूकता बढ़ाना: यह पहल न केवल पर्यटकों को मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि उन्हें ब्रह्मांड और उसमें मौजूद अद्भुत घटनाओं के बारे में भी शिक्षित करती है। यह विज्ञान और खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए एकदम सही अवसर है।
  2. युवाओं को प्रेरित करना: एस्ट्रो टूरिज्म युवा पीढ़ी को विज्ञान और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में करियर बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह उन्हें ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने और वैज्ञानिक खोजों में योगदान करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है।
  3. नैनीताल पर्यटन को बढ़ावा देना: यह नई पहल निश्चित रूप से नैनीताल को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए एक और अधिक आकर्षक गंतव्य बना देगा। यह न केवल पर्यटन राजस्व में वृद्धि करेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा।

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नैनीताल में एस्ट्रो टूरिज्म की शुरुआत विज्ञान और खगोल विज्ञान के प्रति उत्साही लोगों के लिए एक रोमांचक खबर है। यह न केवल पर्यटकों को मनोरंजन और शिक्षा प्रदान करता है, बल्कि यह नैनीताल को पर्यटन के मानचित्र पर भी मजबूती से स्थापित करता है। यदि आप ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने और एक अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त करने के इच्छुक हैं, तो नैनीताल की अपनी अगली यात्रा में एस्ट्रो टूरिज्म को अवश्य शामिल करें।

यह पहल न केवल नैनीताल के लिए बल्कि पूरे भारत के लिए भी गर्व की बात है। यह दर्शाता है कि भारत विज्ञान और खगोल विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर रहा है और ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर करने के लिए प्रतिबद्ध है।

देहली ऐपण | यक्ष संस्कृति की देन है प्रवेश द्वार के आलेखन की यह परम्परा ।

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देहली ऐपण

देहली ऐपण :-

प्रवेशद्वार के अधस्तल (देहली) पर किये जाने वाले ऐपणों को ‘देहली ऐपण’ या ‘देहली (धेई) लिखना’ कहा जाता है। कुमाऊं के निवासियों में अल्पना की यह परम्परा बहुत लोकप्रिय तथा प्राचीन है। ऐसा लगता है कि प्रवेशद्वार के आलेखन की यह परम्परा यक्ष संस्कृति की देन है। महाकवि कालिदास की अमरकृति ‘मेघदूत’ में हिमालयस्थ अलकापुरी  का निवासी यक्ष अपने घर का परिचय देते हुए मेघ से कहता है-

“द्वारोपान्ते लिखितवपुषौ शंखपद्मौ च दृष्टवा”

‘वहां पर मेरी पत्नी के द्वारा द्वारस्थल (देहरी) पर लिखित शंख तथा कमल पुष्प को देखकर तुम्हें उसे पहचानने में कोई कठिनाई नहीं होगी । यहां पर ऐसा कोई पर्वोत्सव एवं आनुष्ठानिक उत्सव नहीं जिसमें देहली ऐपण न किया जाता हो। इतना ही नहीं यहां पर तो देहली पूजन स्वयं एक स्वतंत्र उत्सव के रूप में पूरे महीने मनाया जाता है।

फूल संक्रांति को प्रारम्भ होने वाले इस उत्सव में गृहणियां देहली स्थल को पहले गोबर मिट्टी से तथा उसके बाद गेरुआ या लाल मिट्टी से लीप कर उस पर बिस्वार से विभिन्न प्रकार के रेखांकनों के माध्यम से अनेक कलात्मक रेखाचित्रों का अंकन करती हैं। और यह प्रक्रिया विषुवत संक्रान्ति (बिखौती) तक चलती है। इसके अलावा आश्विन संक्रांति और दीपावली के समय भी कुमाऊँ के घरों की देहली ऐपण से सजाया जाता है।

देहली ऐपण | यक्ष संस्कृति की देन है प्रवेश द्वार के आलेखन की यह परम्परा ।
फोटो साभार : ऐपण गर्ल मीनाक्षी खाती

इसमें लाल पृष्ठभूमि पर श्वेत चावल के घोल से पूरित ये चित्र देखते ही बनते हैं। यों तो अन्य प्रकार के ऐपणों में भी नियत चित्रांकन के परिधीय भागों में अलंकरणात्मक चित्रांकन का मनाही रहती है पर देहरी ऐपण में चित्रकार को यथेच्छ रूप में कल्पना एवं सौन्दर्य बोध को अभिव्यक्तका स्वातंष्य रहता है। अर्थात् इनके आरेखन में कोई आनुष्ठानिक प्रतिबन्ध न होने से इसमें उसे अपनी कल्पना व कलात्मकता का उन्मुक्त प्रदर्शन करने की छूट रहती है। इसीलिए इनमें पर्याप्त विविधता देखने को मिलती है।

ऐपण क्या है –

उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल में शुभकार्यों के अवसर पर द्वार पर और मंदिर में उँगलियों से चावल के घोल से प्राकृतिक खड़िया ( लाल गेरू ) के आधार पर रेखांकन और आलेखन बनाना जिससे सकरात्मक ऊर्जा का अहसास होता है। उसे ऐपण कहते हैं।

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नैनीताल में 30 मई को मा० उपराष्ट्रपति महोदय के दौरे के दौरान बदलेगा ट्रैफिक प्लान, इन रास्तों से होगा आवागमन

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नैनीताल में 30 मई को मा० उपराष्ट्रपति महोदय के दौरे के दौरान बदलेगा ट्रैफिक प्लान, इन रास्तों से होगा आवागमन

नैनीताल: भारत के माननीय उपराष्ट्रपति महोदय 30 मई 2024 को नैनीताल दौरे पर आ रहे हैं। उनके आगमन के मद्देनजर, नैनीताल शहर में यातायात व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए ट्रैफिक डायवर्जन प्लान तैयार किया गया है।

नैनीताल शहर से बाहर जाने वाले वाहन:

  • रुसी-2 से रुसी 1 को डायवर्जन कर कालाढूंगी भेजा जाएगा।
  • रानीखेत, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से भवाली आने वाले वाहन: वी०वीआई०पी० महोदय के कार्यक्रम के दौरान, ये वाहन क्वारब से शीतला होते हुए खुटानी पहुंचेंगे।
  • हल्द्वानी से भवाली और भीमताल की ओर जाने वाले वाहन: ये वाहन ज्योलीकोट होते हुए अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचेंगे।
  • भवाली से हल्द्वानी जाने वाले वाहन: फ्लीट के गुजरने के बाद, भवाली से हल्द्वानी जाने वाले वाहनों को भवाली से भीमताल तिराहा और काठगोदाम तक एकतरफा रास्ता मिलेगा।
  • नैनीताल से अल्मोड़ा जाने वाले वाहन: ये वाहन सुबह 9 बजे तक भवाली तिराहा से रामगढ़ तिराहा-शीतला होते हुए क्वारब जाएंगे।
  • भारी वाहनों की आवाजाही: वीवीआईपी कार्यक्रम के दौरान भारी वाहनों की आवाजाही पूरी तरह से बंद रहेगी।
  • अतिरिक्त जानकारी: भवाली और भीमताल से हल्द्वानी जाने वाले वाहनों को सुबह 8 बजे तक ज्योलीकोट होते हुए हल्द्वानी जाना होगा।

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यह यातायात व्यवस्था 30 मई 2024 को सुबह 9 बजे से वीवीआईपी कार्यक्रम के समापन तक लागू रहेगी। नागरिकों से अनुरोध है कि वे इस दौरान यात्रा करते समय इस योजना का ध्यान रखें और वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करें।

MSME एक्सटेंशन सेंटर में 1 जुलाई से शुरू होंगे स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम, SC-ST छात्रों को फीस में छूट

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MSME एक्सटेंशन सेंटर में 1 जुलाई से शुरू होंगे स्वरोजगार प्रशिक्षण कार्यक्रम, SC-ST छात्रों को फीस में छूट

हल्द्वानी: जिला उद्योग केंद्र परिसर स्थित MSME के इलेक्ट्रानिकी सेवा एवं प्रशिक्षण केंद्र (एक्सटेंशन सेंटर) में 2024-25 सत्र के लिए 1 जुलाई से विभिन्न स्वरोजगारपरक प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू होने जा रहे हैं। इन कार्यक्रमों में शामिल होने वाले SC-ST छात्रों को फीस में छूट भी दी जाएगी।

केंद्र इंचार्ज सुनीत भंडारी ने बताया कि सेंटर में एक वर्षीय सर्टिफिकेट कोर्स इन मशीन आपरेशन और डिप्लोमा इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन एंड प्रोग्रामिंग चलाए जाएंगे। इसके अलावा छह माह के सर्टिफिकेट कोर्स इन मशीनिंग और सर्टिफिकेट कोर्स इन कम्प्यूटर एप्लीकेशन भी आयोजित किए जाएंगे।

सेंटर इंचार्ज सुनीत भंडारी
photo from kumaon jansandesh | सेंटर इंचार्ज सुनीत भंडारी

पांच माह का टैक्निशियन: रूम एयर कंडीशनर एंड होम एप्लाइंसेज, एक-एक माह का कम्प्यूटर फंडामेंटल और कम्प्यूटर टाइपिंग हिंदी एवं अंग्रेजी, और चार माह का टैक्निशियन हैंड हैल्ड प्रोडक्टस भी सिखाए जाएंगे।

कम समय के कार्यक्रमों में पीएलसी प्रोग्रामिंग, आटो कैड, सीएनसी प्रोग्रामिंग तथा मशीनिंग और कम्प्यूटर हार्डवेयर तथा नेटवर्किंग शामिल हैं, जो चार-चार सप्ताह के होंगे।

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भंडारी ने बताया कि सभी SC और ST छात्रों के लिए ये पाठ्यक्रम निःशुल्क होंगे। अधिक जानकारी के लिए इच्छुक उम्मीदवार सेंटर में आकर संपर्क कर सकते हैं।

यह खबर हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले युवाओं के लिए बहुत उपयोगी है जो स्वरोजगार के अवसरों की तलाश में हैं। MSME एक्सटेंशन सेंटर द्वारा आयोजित किए जाने वाले ये प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें आवश्यक कौशल और ज्ञान प्रदान करने में मदद कर सकते हैं जिससे वे अपना खुद का व्यवसाय शुरू कर सकें या बेहतर रोजगार प्राप्त कर सकें।

द पैटर्न्स ऑफ इंडिया से मिली उत्तराखंड की ऐपण कला को नई उड़ान

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द पैटर्न्स ऑफ इंडिया से मिली उत्तराखंड की ऐपण कला को नई उड़ान
द पैटर्न्स ऑफ इंडिया

देहरादून: टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया एक्सप्रेस ने अपनी “द पैटर्न्स ऑफ इंडिया” योजना के तहत उत्तराखंड की लोक कला ऐपण को अपने नए B737Max विमान की पूंछ पर उकेरकर नई उड़ान दी है। यह योजना देशभर की कलाकृतियों को विमानों पर प्रदर्शित कर भारत की समृद्ध कला और विविधता को उजागर करती है।

“द पैटर्न्स ऑफ इंडिया” योजना के तहत एयर इंडिया एक्सप्रेस ने पहले विमान पर राजस्थान के बांधनी कपड़े का डिजाइन उकेरा था। अब उत्तराखंड की ऐपण कला को भी इस योजना में शामिल किया गया है। ऐपण को विमान की पूंछ पर चित्रित किया गया है, जो उत्तराखंड की संस्कृति और परंपराओं को दर्शाता है। आप को बता दे की “द पैटर्न्स ऑफ इंडिया” की पहल अक्टूबर 2023 में शुरू की गई थी। “द पैटर्न्स ऑफ इंडिया” पहल का मुख्य उद्देश्य भारत की कलात्मक विविधता को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करना और देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। यह पहल न केवल यात्रियों को प्रेरित करेगी, बल्कि भारतीय कला और कारीगरों को भी प्रोत्साहन देगी।

एयर इंडिया एक्सप्रेस के प्रवक्ता ने कहा, “हमें भारत की समृद्ध कला और विरासत को प्रदर्शित करने में गर्व महसूस हो रहा है। ‘द पैटर्न्स ऑफ इंडिया’ योजना के माध्यम से हम देश के विभिन्न क्षेत्रों की कला और संस्कृति को लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं।”

https://x.com/AirIndiaX/status/1793997625714516416

ऐपण कला को विमान पर उकेरने का काम हैदराबाद में जीएमआर एयरो टेक्निक में किया गया है। यह कला प्राकृतिक रंगों और आकृतियों का उपयोग करके बनाई जाती है और इसका उपयोग त्योहारों और विशेष अवसरों पर घरों और मंदिरों को सजाने के लिए किया जाता है।

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एयर इंडिया एक्सप्रेस ने कहा कि वह भविष्य में भी इस योजना के तहत अन्य भारतीय कलाकृतियों को विमानों पर प्रदर्शित करेगी।

पावड़ा गीत | किसी वीर या देवता की वीरता का बखान करने वाली लोकगीत विधा।

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पावड़ा
फोटो : जागर गायिका रामेश्वरी भट्ट साभार अनंत हिमालया

पावड़ा :

उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में किसी वीर पुरुष अथवा देवता  के जीवन से संबंधित उसके वीरता पूर्ण घटनाओं का वर्णन जिन गीतों में किया जाता है उन्हें गढ़वाल में पावड़ा गीत कहा जाता है। यह कुमाऊँ के “कटकु ” , भड़गामा ,या राजस्थान के रासो गीत की तरह होते हैं गढ़वाल में देवताओं के पावड़ो में गोरिल देवता एवं नागराजा के पावड़े काफी प्रसिद्ध है।

गोरिल के पवाड़े में कहा गया है कि तैमूर लंग अपनी विशाल तुर्की सेना को लेकर पहाड़ों पर आक्रमण एवं लूटपाट करने की दृष्टि से दिल्ली से चलता हुआ बिजनौर जिले में स्थित गढ़मुक्तेश्वर के पास अपने कटक के साथ आगे बढ़ रहा था तो गोरिल ने अपने महर एवं फड़्त्याल वीर योद्धाओं एवं नाथपंथी साधुओं की फौज को संगठित करके उस पर आक्रमण करके उसके प्रसार को आगे बढ़ने से रोक दिया था।
पावड़ा गीत | किसी वीर या देवता की वीरता का बखान करने वाली लोकगीत विधा।
इस प्रकार गढ़वाल पर मंडराते हुए इन क्रूर विधर्मियों के विध्वंश से इसे बचा लिया था। देवता संबंधी इन पावड़ों का गान सामान्यतः जागरों के समय यहां के वाद्यवादकों ढोली, औजी, दास आदि के द्वारा किया जाता है। नागर्जा के पंवाड़े में उसे श्री कृष्ण, गोविन्द आदि नामों से पुकारा जाता है। उसके घड़ियालें में उसकी उन बाललीलाओं, जो उन्होंने ब्रज में की थीं, उनका बखान किया जाता है।
इनके अलावा गढ़वाल की वीरांगना तीलू रौतेली के पावड़े लोगों के बीच खूब प्रचलित हैं। और कत्यूरी राजा धाम देव के पावड़े गाये जाते हैं। और सरु कुमेन और गढ़ु सुम्याल के प्रेम कथा के पावड़े गाये जाते हैं।
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कंडार देवता | उत्तरकाशी क्षेत्र का महा ज्योतिष और न्यायकारी देवता।

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कंडार देवता

कंडार देवता गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी जिले के बारह गावों का अधिष्ठातृ देव है। इनका मूल स्थान मांडो गांव है। कहते हैं इस गांव में मांडय ऋषि का आश्रम होने के कारण इसे मांडो गांव के नाम से जाना जाता है। यहाँ के स्थानीय लोकदेवताओं में इन्हे श्रेष्ठ देव माना जाता है। कंडार देवता का प्रभाव क्षेत्र उत्तरकाशी का उत्तरी क्षेत्र है। इनका निवास स्थान उत्तरकाशी का ततराली गांव है। इसका मंदिर वरुणावत पर्वत पर स्थित संग्राली गांव में स्थित है। यहाँ इन्हे धातु के मुखोटे के रूप में स्थापित किया है।

कंडार देवता के पास भूत भविष्य और वर्तमान हर सवाल का जवाब है –

बैशाख माह में कंडार देवता का डोला यहाँ से ऐरासुगढ़ जाता है। वहां तीन चार दिन का उत्सव होता है। यहाँ अन्य देवताओं के डोले भी आते हैं। कंडार देवता को शिव स्वरूप माना जाता है। धातु रुपी मूर्ती डोले के अंदर सजी रहती है। देवता डोली को हिलाकर अपने भक्तों के सवालों का जवाब देता है। पुजारी डोली का इशारा समझकर उसे लोगो को समझाता है। इसके अलावा देवता जन्मपत्री देखकर ,भूत ,भविष्य और वर्तमान भी बता देते हैं।

कहते हैं कंडार देव जन्मपत्री देखकर विवाह भी तय कर देते हैं। होने ऐसे ऐसे लोगो का विवाह तय करवाया है जिसके लिए बड़े -बड़े ज्योतिषी मना कर चुके थे। कहते हैं जब कंडार देव को गुस्सा आता है तो ,इनकी प्रतिमा में से पसीना आने लगता है।

कंडार देवता | उत्तरकाशी क्षेत्र का महा ज्योतिष और न्यायकारी देवता।

कंडार देवता को स्थानीय देवताओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है –

इस देवता को स्थानीय लोकदेवताओं में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। धार्मिक महोत्सवों के अवसर पर इसका स्थान केंद्रीय और सर्वोच्च होता है। और बिना कंडार देव के स्थानीय देवता पहले स्नान नहीं कर सकते हैं और न ही धार्मिक यात्राओं में सम्मिलित हो सकते हैं। इसके बारे में एक जनश्रुति है कि , इनकी मूर्ति एक किसान को हल जोतते समय किसान को परशुराम मंदिर के पीछे मिली ,उसने राज्य की संपत्ति मानकर राजभवन श्रीनगर पहुचा दिया। और राजा ने ऐसे अपने मंदिर में सब देवताओं के नीचे रखवा दिया।

दूसरे दिन राजा मंदिर गया तो उसने देखा मूर्ति सबसे ऊपर थी। राजा ने उसे फिर नीचे रख दिया। दूसरे दिन राजा का आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा ,क्युकी वो मूर्ति फिर से सबसे ऊपर आ गई थी। इसके अलावा राज्य में अनेक उथलपुथल होने लगी। राजा ने इसे परशुराम मंदिर में पहुचा दिया। वहां के पुजारी ने इसकी प्रकृति को देख कर इसे एक टीले पर स्थापित करवा दिया।

कंडार देवता | उत्तरकाशी क्षेत्र का महा ज्योतिष और न्यायकारी देवता।
kandar devta uttarkashi

कहते हैं कंडार देवता भृमण प्रिय देवता है। यह एक स्थान पर नहीं रहता है। यह सदा अपने क्षेत्र में भ्रमण करता रहता है।  यह देवता न्यायप्रिय देवता है। दुष्टो को दंड देता है और पीड़ितों को न्याय देता है। कहते हैं कंडार देवता की वहां वही स्थिति है ,जो हनोल में महासू देवता ,कुमाऊँ में गोलू देवता और नैटवाड़ में पोखू देवता की होती है।

इसके बारे यह भी कहा जाता है कि सन 1962 से पहले भारत -तिब्बत व्यापार में भारत के शौका व्यापारियों और तिब्बती व्यापारियों के बीच जो अलिखित कॉन्ट्रेक्ट होता था उसे कंडार प्रथा कहते थे। इसमें दोनों पक्ष एक मूर्ति को सर में रखकर , आजीवन इस व्यापारिक संबंध को निभाने की कसमे खाते थे। सम्भवतः वह मूर्ति कंडार देवता की होती होगी।

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