Saturday, June 15, 2024
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बद्रीनाथ धाम में वीडियोग्राफी पर रोक का उल्लंघन: 37 लोगों पर हुई चालान की कारवाही

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बद्रीनाथ धाम में वीडियोग्राफी पर रोक का उल्लंघन: 37 लोगों पर हुई चालान की कारवाही

चमोली: श्री बद्रीनाथ धाम मन्दिर परिसर में वीडियोग्राफी और रील्स बनाने पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन करने वाले 37 लोगों पर चमोली पुलिस ने चालान काटकर सख्त कार्रवाई की है। पुलिस के अनुसार, इन श्रद्धालुओं ने मंदिर परिसर के 50 मीटर के दायरे में मोबाइल फोन से वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल दिए थे। यह मंदिर प्रबंधन द्वारा तय किए गए नियमों का उल्लंघन है।

पुलिस ने इन लोगों पर जुर्माना लगाने के साथ ही उन्हें हिदायत दी है कि वे दोबारा ऐसा न करें।

श्री बद्रीनाथ धाम मन्दिर एक पवित्र धार्मिक स्थल है। मंदिर परिसर में शांति और भक्ति बनाए रखने के लिए यह प्रतिबंध लगाया गया है। पुलिस और मंदिर प्रबंधन श्रद्धालुओं से अपील करते हैं कि वे मंदिर परिसर में शांति और भक्ति बनाए रखने में सहयोग करें। नियमों का उल्लंघन न करें और वीडियोग्राफी और रील्स बनाने से बचें।

https://x.com/uttarakhandcops/status/1793662250064171371

ब्रैकिंग न्यूज़ : केदारनाथ में हेलीकॉप्टर में खराबी के चलते करनी पड़ी इमरजेंसी लैंडिंग। टला बड़ा हादसा

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ब्रैकिंग न्यूज़ : केदारनाथ में हेलीकॉप्टर में खराबी के चलते करनी पड़ी इमरजेंसी लैंडिंग

24 मई 2024,देहरादून: केदारनाथ से एक बड़ी खबर आ रही हैं। आज सुबह 7:05 बजे के करीब, एक हेलीकॉप्टर को केदारनाथ में इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी के कारण इमरजेंसी लैंडिंग करनी पड़ी। हेलीकॉप्टर सिरसी हेलीपैड से केदारनाथ धाम जा रहा था जब यह घटना हुई। रहत की खबर यह है की हेलीकॉप्टर में सवार सभी 6 यात्री और पायलट सुरक्षित हैं।

आप को बता दे की घटना की सूचना मिलते ही, स्थानीय प्रशासन और पुलिस मौके पर पहुंच गए। सभी यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया गया और उन्हें प्राथमिक उपचार प्रदान किए गए। अधिकारियों ने घटना की जांच शुरू कर दी है और हेलीकॉप्टर की इमरजेंसी लैंडिंग के कारणों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। यह हेलीकॉप्टर क्रिस्टल एविएशन कंपनी का बताया जा रहा हैं।

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नौ ढुंगा घर चम्पवात का अनोखा घर जिसके हर कोने से 9 ही पत्थर दिखाई देते हैं।

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नौ ढुंगा घर
मूल फोटो - साभार गूगल

प्रस्तुत लेख में उत्तराखंड के एक ऐसे ऐतिहासिक घर का वर्णन किया गया है ,जिसके बारे में कहा जाता है कि यह नौ पत्थरों से बना है। क्यूकी इसको किसी भी कोने से देखे तो केवल नौ पत्थर दिखाई देते हैं। इसलिए इसका नाम स्थानीय भाषा में नौ ढुंगा घर ( Nau Dhunga Ghar) यानि नौ पत्थरों वाला मकान भी कहते हैं।

उत्तराखंड का अनोखा घर नौ ढुङ्गा घर –

उत्तराखंड के कुमाऊँ मंडल के चम्पावत जिले में चम्पावत-पिथौरागढ़ राजमार्ग पर उससे 1.5 किमी दूर मांदली नामक गांव में एक प्राचीन मकान के भग्नावेश हैं। इस घर का नाम है नौ ढुंगा घर ( Nau Dhunga Ghar champawat ) यह घर यहाँ के मध्यकालीन भवनों का एकमात्र अवशेष है।

मांदली प्रारम्भिक वर्षों में चम्पावत के चन्द शासकों का आवास स्थल रहा था। इसकी पुष्टि राजा अभयचन्द के सन् 1358ई. के मानेश्वर शिलालेख से होती है। जिसमें कि उसे ‘मांदली’ से प्रसारित किये जाने का उल्लेख है। शोधकर्ताओं का मानना है कि पुरातन भवनशिल्प का यह भग्नावशेष प्रारम्भिक चन्द शासकों के भवन का ही अवशेष हो सकता है। इसके अवशिष्ट प्रथम मंजिल की बनावट से लगता है कि यह भवन मूलतः दो मंजिला रहा होगा।

नौ ढुंगा घर के हर कोने से 9 पत्थर दिखाई देते हैं –

इस भवन की विशेषता यह है कि इसकी दीवारों पर लम्बाई में एक रद्दे में छोटे-बड़े मिलाकर केवल नौ पत्थरों का उपयोग किया गया है, किन्तु चौड़ाई में दीवारों का माप कम होने से उनका निर्माण 6 से 9 शिलाओं के योग से किया गया है। किसी भी कोने से गिननेपर 9 पत्थर ही होते हैं। अपनी इस विशिष्टता के कारण ही यह भवन ‘नौढुङा (नौ पत्थर वाला) घर के नाम से जाना जाता है।

नौ ढुंगा घर
मूल फोटो -साभार गूगल

डा. रामसिंह अनुसार इसमें लगी तरासी हुई शिलाओं की अधिकतम माप इस प्रकार है-2मी. लम्बाई x 0.67 सेमी. उठान x 0.31 सेमी. तक ऊपरी और निचली पहल की चौड़ाई है। पत्थरों को बड़ी कुशलता पूर्वक तराशा गया है। इसकी दीवारों की सभी शिलाएं लम्बाई में पंक्तिबद्ध चुनी गयी हैं।

संदर्भ – उत्तराखंड ज्ञानकोष प्रो dd शर्मा। 

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क्या आप शुभ अशुभ से जुडी इन पहाड़ी मान्यताओं के बारे में जानते हैं ?

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पहाड़ी मान्यताओं पर आधारित लेख

हर समाज में शुभ अशुभ से जुडी कई मान्यताएं होती हैं। ठीक उसी प्रकार हमारे पहाड़ो में दैनिक जीवन और क्रियाकलापों से जुड़ी घटनाओं को शुभ और अशुभ से जोड़ा जाता है। वर्तमान में शहरीकरण के प्रभाव इन पहाड़ी मान्यताओं का प्रभाव थोड़ा काम हो गया हैं ,लेकिन ग्रामीण अंचलों में ये मान्यताएं अपने पारंपरिक रूप में अभी भी प्रचलित हैं। उत्तराखंड में प्रचलित लोकविश्वासो ,आस्थाओं ,शुभ-अशुभ सम्बन्धी अवधारणाओं एवं वर्जनों -प्रतिवर्जनों में से अनेक ऐसे हैं कि जो सर्वत्र स्तर पर आंशिक भेदों के साथ पुरे हिमालयी क्षेत्र में माने जाते हैं। इनमे में से

आइये जानते हैं कुछ पहाड़ी मान्यताओं के बारे में –

  • लोहे से लोहा टकराना या खाली कैंची चलना पहाड़ी मान्यताओं में अशुभ माना जाता है।
  • गले में हाथ लगने से गले में गलकण्ड होने का खतरा माना जाता है। जिसका निवारण हाथ में फूंक मरना होता है।
  • कुत्ते का आकाश की ओर मुँह करके रोना ,दिन में उल्लू का बोलना और रात को कौओं का रात को बोलना अशुभ माना जाता है।
  • शिशु का बार -बार नाक मसलना अस्वस्थ होने का संकेत माना जाता है।
  • बच्चे को छींक आने पर कुमाऊँ क्षेत्र की माताएं , “जय श्री ” छैक छीका छतुर का उच्चारण करती है। जिसके पीछे मान्यता है कि ऐसा बोलने से शिशु से इसके नकारात्मक प्रभाव दूर हो जाते हैं।
  • चूल्हे पर आग जलाते समय फूकं मारने पर यदि आग नहीं जलती है तो कहते हैं उक्त लड़के या लड़की को कंजूस सास मिलेगी या कही ये माना जाता है कि उक्त व्यक्ति की सास इस दुनिया में नहीं है।
  • पहाड़ों में चिल्लाने और चटख कपडे न पहनने की हिदायत दी जाती है। कहा जाता है कि पहाड़ों में चटख कपडे पहनने से या चिल्लाने से भूत प्रेत चिपटने का खतरा रहता है। मगर इसका वैज्ञानिक कारण भी है ,पहाड़ों पर जो से बोलने पर हिमस्खलन का खतरा रहता है।

पहाड़ी मान्यताओं पर लेख

  • पहाड़ी मान्यताओं में विवाह मंडप पर दूल्हा दुल्हन के हसने या बोलने की मनाही होती है। इसके पीछे मान्यता यह है कि जो दूल्हा या दुल्हन मंडप पर बोलते हैं या हँसते हैं उनकी संतान गूंगी होती है।
  • शिशुओं के दातों के संबंध में कहा जाता है कि बालक के सातवें महीने में और कन्या के सातवें महीने दांत निकलना शुभ होता है।
  • पहाड़ी मान्यताओं में दाएं हाथ की हथेली खुजाना मतलब पैसे आना और बायीं हथेली खुजलाना मतलब पैसे जाना होता है।
  • पहाड़ी मान्यता के अनुसार हिचकी आने का मतलब आपको कोई अपना याद कर रहा है। और आंगन में सुबह सुबह कौआ बोले तो उस दिन घर में मेहमान आने की उम्मीद रहती है।
  • घर के अंदर सिटी या मुरली बजाने पर कहते हैं घर में सांप आते हैं।
  • पहाड़ी मान्यताओं कुवारों के लिए में खाने के बर्तनो या करछी को चाटना मना है। कहते हैं ऐसा करने से उनकी शादी में बारिस होती है।
  • कहते हैं यदि दांत निकले से पूर्व शिशु के मसूड़े छू दिए तो उसके दांत देर में आते हैं।
  • कहते हैं छलनी को सिर या भूमि में रखने से छलनी के छिद्रों के बराबर कर्ज होता है।
  • कहते हैं हाथ में नमक पकड़ाना या मिर्च पकड़ाने से झगड़ा होने का खतरा होता है।
  • जलती हुई आग यदि भुरभुराएँ तो कहते हैं कोई अपना याद कर रहा होगा।
  • रोटी बनाने के बाद तवे को खाली उतारने से दरिद्रता आने की आशंका होती है।

निष्कर्ष –

मित्रों उपरोक्त में हमने उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में मान्य कुछ मान्यताओं का वर्णन किया है। पहले संसाधनों के आभाव में लोग इन्ही मान्यताओं के आधार पर अपने दैनिक जीवन का निर्वहन करते थे। पुराने ज़माने के लोगों ने अपने जीवन शैली को सरल व्यवस्थित रखने के उस समय के अनुसार और अपनी जानकारी के आधार पर  इन मान्यताओं को बनाया था। हालांकि आजकल इन पहाड़ी मान्यताओं का अस्तित्व लगभग ख़त्म हो गया है। इनका प्रमुख कारण वर्तमान पहाड़ी समाज की जीवन शैली में काफी बदलाव आ गया है।

पुराने जमाने की इन मान्यताओं में से कुछ के बहुत गहरे अर्थों के साथ उनके पीछे वैज्ञानिक कारण भी होता है। जैसे – पहाड़ों में आवाज करने से भूत चिपट जाते हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि  हिमालयी पहाड़ कच्चे होते हैं और तेज आवाज से दरकने का खतरा होता है। इसलिए पहाड़ों में तेज आवाज करने की मनाही होती है।

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होमगार्ड जवानों ने दिखाई वीरता, 7 किलोमीटर पैदल चलकर बचाया श्रद्धालु की जान

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होमगार्ड जवानों ने दिखाई वीरता, 7 किलोमीटर पैदल चलकर बचाया श्रद्धालु की जान

रुद्रनाथ: उत्तराखंड पुलिस ने सोशल मीडिया प्लॅटफॉम x में एक वीडियो पोस्ट की हैं। जिसमे होमगार्ड जवान एक आदमी को अपनी पीठ पर लेके पहाड़ी दुर्गम इलाके से गुजर रहे हैं। यह वीडियो रुद्रनाथ पैदल मार्ग की हैं। जहा पुंग बुग्याल के पास एक श्रद्धालु का स्वास्थ्य अचानक खराब होने से हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही होमगार्ड जवान पुष्कर और नीरज 7KM पैदल चलके मौके पर पहुंचे।

वहा पहुंच कर जवानों ने देखा कि श्रद्धालु की हालत गंभीर है और उसे तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है। 7 किलोमीटर का दुर्गम पहाड़ी रास्ता होने के बावजूद, दोनों जवानों ने बिना किसी देरी के श्रद्धालु को अपनी पीठ पर उठाकर सड़क तक लाने का निर्णय लिया।

कठिन परिस्थितियों और थकान के बावजूद, जवानों ने हार नहीं मानी और अपनी वीरता का परिचय देते हुए श्रद्धालु को समय रहते सड़क तक पहुंचाया। वहां से उन्हें तुरंत चिकित्सालय ले जाया गया, जहाँ उनका इलाज किया जा रहा है।

https://x.com/uttarakhandcops/status/1792727565683343688

सूत्रों के अनुसार, श्रद्धालु की हालत अब स्थिर है और वह खतरे से बाहर है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने होमगार्ड जवानों की इस वीरता और साहसिक कार्य की भरपूर प्रशंसा की है।

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यह घटना एक बार फिर से हमारे जवानों की वीरता और तत्परता का प्रमाण है। वे सदैव आम जनता की सेवा के लिए तत्पर रहते हैं और किसी भी आपातकालीन स्थिति में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं।

भुकुंड भैरव | केदारनाथ धाम की हर गतिविधि पर पैनी नजर रहती है इनकी।

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भुकुंड भैरव

उत्तराखंड के केदारनाथ धाम में भगवान् शिव स्वयं केदारनाथ रूप में रहते हैं। और उनके प्रिय अवतार कोतवाल भैरव जी भुकुंड भैरव के रूप में केदारनाथ के दक्षिण में खुले आसमान के नीचे रहते हैं। अमूमन अन्य प्रसिद्ध शिव मंदिरों में  भगवान् शिव के साथ भीषण भैरव ,बटुक भैरव ,संहार भैरव रहते हैं। ठीक उसी प्रकार केदारनाथ में भगवान् शिव का साथ भुकुंड भैरव ( bhukund bhairav) निवास करते हैं।

भुकुंड भैरव के दर्शन के बिना अधूरी है केदारनाथ यात्रा  –

भुकुंड भैरव (bhukund bhairav kedarnath ) को केदारनाथ क्षेत्र का क्षेत्रपाल देवता माना जाता है। और इन्हे केदारनाथ पहला रावल भी माना जाता है। केदारनाथ के दक्षिण में लगभग आधा किमी दूर खुले आसमान के नीचे कुछ मूर्तियां हैं। यही खुले आसमान के नीचे वाला मंदिर है भुकुंड भैरव का। कहते हैं बिना इनके दर्शन के केदारनाथ की यात्रा अपूर्ण ,रहती है। केदारनाथ कपाट खुलने से पहले भुकुंट भैरव जी की पूजा होती है तत्पश्यात केदारनाथ जी के कपाट विधि विधान से खुलते हैं।

खुले आसमान के नीचे स्थित इन मूर्तियों की स्थापना लगभग 3000 ई पुरानी मानी जाती है। इनकी पूजा प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को इनकी पूजा होती है। और प्रत्येक वर्ष आषाढ़ में इनकी विशेष पूजा होती है।

भुकुंड भैरव | केदारनाथ धाम की हर गतिविधि पर पैनी नजर रहती है इनकी।

केदारनाथ की प्रत्येक गतिविधि पर होती है इनकी पैनी नजर –

भुकुंट भैरव को केदारनाथ क्षेत्र का रक्षक क्षेत्रपाल देवता के रूप में पूजा जाता है। केदारनाथ क्षेत्र की प्रत्येक गतिविधियों पर इनकी पैनी नजर रहती है। केदारनाथ के कपाट बंद होने के बाद केदारनाथ की सुरक्षा की जिम्मेदारी भुकुंड भैरव महाराज की होती है। कहते हैं केदारनाथ में पूजा पाठ में गलती या कुछ अन्य गलतियां होने पर ये दंडित करते हैं। लोगो का विश्वास यह भी कि 2013 की केदारनाथ आपदा भी इनके क्रोध का परिणाम था।

भुकुंड भैरव | केदारनाथ धाम की हर गतिविधि पर पैनी नजर रहती है इनकी।मूल फोटो साभार हिमालय डिस्कवर

बताते हैं कि 2017 में केदारनाथ धाम के कपाट बंद करने में परेशानी होने लगी तो ,पुरोहितों के सुझाव पर भुकुंड भैरव जी की पूजा की गई , भूल -चूक गलती की माफ़ी मांगी गई तब केदारनाथ के कपाट बंद हुए। इसके अलावा यहाँ तक बताते है कि भुकुंट भैरव पस्वा के अंदर अवतार लेकर समय -समय पर चेतावनी देते रहते हैं।

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केदारनाथ की कहानी | पांडवों से रुष्ट होकर जब जमीन में अंतर्ध्यान होने लगे भोलनाथ।

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केदारनाथ की कहानी | पांडवों से रुष्ट होकर जब जमीन में अंतर्ध्यान होने लगे भोलनाथ।

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केदारनाथ की कहानी

केदारनाथ की कहानी ( Kedarnath ki kahani ) – उत्तराखंड के चारों धामों के कपाट खुल चुके हैं। उत्तराखंड में चारों धामों में यात्रा अपने चरम पर है। यात्रियों के रोज नए रिकॉर्ड बन रहे हैं। कही कही अव्यवस्थाएं भी  देखने को मिल रही हैं ,लेकिन प्रशाशन पूरी मुस्तैदी से यात्रा को सफल बनाने में जुटा हुवा है। स्कंदपुराण के केदारखंड भाग में  उत्तराखंड के चार धामों में और पंचकेदारों में भगवान् शिव के ग्यारहवें ज्योतिर्लिंग केदारनाथ जी को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।और स्कंदपुराण में इसे भगवान् शिव का उत्तम स्थान बताया गया है।

नन्दापर्वतमारभ्य यावत् काष्ठगिरिर्भवेत् ।
तावत्केदारकं क्षेत्रं शिवमन्दिरमुत्तमम् ।।
राजा भोज ने अपने शिलालेख में अन्य ज्योतिर्लिंगों के साथ केदार ज्योतिर्लिंग का भी उल्लेख किया है। इससे व्यक्त है कि तब यह अस्तित्व में आ चुका था। यहाँ भगवान् के निवास और उनकी मूर्ति विग्रह के संबंध अनेक पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं। उन सभी में एक पांडवों से जुडी केदारनाथ की कहानी प्रचलित है जो इस प्रकार है –

केदारनाथ की कहानी ( Kedarnath ki kahani ) या केदारनाथ का रहस्य –

केदारनाथ के रहस्य के बारे में कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव अपनी तपस्या ,योग ध्यान के लिए शांत जगह ढूंढ रहे थे। वे पुरे हिमालय में घूमते -घूमते इस स्थान पर पहुंचे तो उन्हें स्थान रमणीक और शांत लगा तो वे यही ध्यान में बैठ गए।

केदारनाथ की कहानी

 

केदारनाथ के गर्भगृह में जो शिवलिंग है वो थोड़ा बड़ा त्रिकोण आकर में है। जैसा बैल या भैष की पीठ होती है ठीक उसी आकर का है। इस अनोखे शिवलिंग की कहानी पांडवो से जुडी है।

गोत्रहत्या के पाप से मुक्त होने के लिए शिव को प्रसन्न करना चाहते थे पांडव –

महाभारत युद्ध के बाद पांच भाई पांडव अपने भाइयों की हत्या ( गोत्रहत्या ) के पाप से मुक्त होने लिए भगवान् भोलेनाथ का आशीष लेने के लिए काशी पहुंचे। भगवान् भोलेनाथ इन गोत्रघातियों की परीक्षा लेने और इनसे बचने के लिए हिमालय की ओर चले गए। पांडवों को पता चल गया कि भोलेनाथ हिमालय की तरफ चले गए हैं। वे भी उनके पीछे पीछे हिमालय की तरफ चल दिए।

गुप्तकाशी से गायब हो गए भगवान् शिव –

जब पांडव भी शिव के पीछे पीछे हिमालय की ओर चल पड़े तो भगवान् शिव को पता चल गया कि पांडव भी उनके पीछे -पीछे आ रहे हैं ,वे गुप्तकाशी नामक स्थान पर गायब हो गए या गुप्त हो गए। इसलिए उस स्थान का नाम गुप्त काशी है। केदारनाथ की कहानी के अनुसार गुप्तकाशी से गायब होने के बाद भगवान् शिव केदार नामक स्थान पर प्रकट हुए।

तो इस प्रकार उत्पन्न हुए भगवान् केदारनाथ –

केदारनाथ नामक स्थान में भगवान् शिव ने एक भैंस का रूप धारण किया और पास में घास चर रहे भैसों के झुण्ड के बीच में चरने लगे। भगवान् शिव का पीछा करते करते पांडव भी केदारनाथ पहुंच गए। उन्होंने इधर उधर ढूंढा तो भैंसो के बीच भैंस रूप में चरते हुए भगवान् शिव को पहचान गए। तब भीम उस दर्रे के ऊपर टांग फैलाकर बैठ गए जहाँ से भैसों के झुण्ड को निकलना था।

केदारनाथ की कहानी | पांडवों से रुष्ट होकर जब जमीन में अंतर्ध्यान होने लगे भोलनाथ।
फोटो साभार – istock

भगवान् शिव को पांडवों के टांगों के नीचे से गुजरना अपमानजनक लगा । वे वहां से तुरंत गायब होने के लिए वहीँ मैदान में ही जमीन में धसने लगे। भीम ने फुर्ती दिखाते हुए जल्दी से उनकी पूंछ पकड़ ली। जिस कारण उनकी पीठ वाला भाग वहीँ रह गया और शरीर के बाकी अंग अलग -अलग जगह से बाहर निकले। जो बाद में पंचकेदार कहलाये।

इसी समय आकाशवाणी हुई ,” हे पांडवों मैं तुमसे खुश हूँ। मेरे इस पृष्ठ भाग को घृत इत्यादि से नवनीत करके इसका अभिषेक करके तुम गोत्रहत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे। इसके बाद पांडवों ने भगवान् भोलेनाथ के इस पृष्ठरूपी शिवलिंग की पूजा अर्चना करके यहाँ मंदिर का निर्माण करवाया। जिसका कलयुग में शंकराचार्य जी ने जीर्णोद्वार करवाके शिथिल हो चुके सनातन धर्म में नवचेतना का संचार किया।

केदारनाथ की कहानी (Kedarnath ki kahani ) आपको अच्छी लगी हो तो अपने परिचितों के बीच इस कहानी को अवश्य साँझा करें।

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केदारनाथ यात्रा: प्लास्टिक मुक्त यात्रा के लिए अनोखी पहल, प्लास्टिक की बोतल डालें और पाएं 10 रुपये!

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केदारनाथ यात्रा: प्लास्टिक मुक्त यात्रा के लिए अनोखी पहल
केदारनाथ

केदारनाथ: केदारनाथ में दिन प्रतिदिन प्लास्टिक बोतलों और उससे होने वाले कूड़े की समस्या बढ़ती जा रहे हैं। इस समस्या को देखते हुए, पर्यावरण को बचाने और केदारनाथ यात्रा को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए, उत्तराखंड सरकार ने एक अनूठी पहल शुरू की है। इस योजना के तहत, तीर्थयात्री खाली प्लास्टिक की बोतलें जमा कर सकते हैं और उन्हें यात्रा मार्ग पर स्थापित विशेष वेंडिंग मशीनों में डाल सकते हैं। प्रत्येक बोतल के बदले में, उन्हें 10 रुपये डिजिटल माध्यम से वापस मिलेंगे।

यह योजना फरवरी 2024 में शुरू हुई थी और तब से यह काफी लोकप्रिय हो गई है। पहले चरण में, गौरीकुंड में एक मशीन स्थापित की गई थी। योजना की सफलता को देखते हुए, धीरे-धीरे और मशीनें स्थापित की जाएंगी।

इस पहल का प्लास्टिक प्रदूषण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। तीर्थयात्री अब अपनी प्लास्टिक की बोतलों को इधर-उधर फेंकने के बजाय उन्हें जमा कर रहे हैं। इससे यात्रा मार्ग स्वच्छ और सुंदर बना हुआ है। आप को बता दे की प्लास्टिक सालो तक ऐसा ही पढ़ा रहता हैं। यह बाकि कूड़े की तरह अपने आप गलता या नष्ट नहीं होता। जिसके कारण इसका निस्तारण करना जरुरी हो जाता हैं। पहाड़ो में जैसे जैसे पर्यटकों का आवागमन बढ़ा हैं, वैसे वैसे यहाँ हर जगह प्लास्टिक कूड़ा भी बढ़ा हैं। इस पहल से प्लास्टिक प्रदूषण में कमी आएगी।

इसके अलावा, इस योजना से स्थानीय लोगों को भी आय का एक नया स्रोत मिला है। वे प्लास्टिक की बोतलों को इकट्ठा करते हैं और उन्हें वेंडिंग मशीन ऑपरेटरों को बेचते हैं।

इसे पढ़े : उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई या पारम्परिक मीठे पकवान।

यह योजना कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी है और यह अन्य धार्मिक स्थलों के लिए भी प्रेरणादायक है।

उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई या पारम्परिक मीठे पकवान।

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उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई
उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई

वैसे आजकल उत्तराखंड की बाल मिठाई ,सिंगोड़ी इत्यादि मिठाइयां विश्व प्रसिद्ध है। मगर ये उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई नहीं है।  उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई का मतलब उन मिठाइयों या पारम्परिक मीठे पकवानों से है ,जो पर्वतीय जनजीवन में लोग अपने घर में उपलब्ध संसाधनों से बनाते थे। आर्थिक कमजोरी नागरिक मिठाइयों या शहरी मिठाइयों की असुलभता के कारण प्राचीन काल के लोगो ने गुड़ /शहद और आटे, चावल से पारम्परिक मीठे पकवान बनाये जो शहरी मिठाइयों की स्थापन्न बन गए।

उत्तराखंड की कुछ पारम्परिक मिठाइयों का विवरण इस प्रकार है –

खजूर या खजूरे उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई –

गेहू केआटे में गुड़ का पाक डालकर ठोस आटा गूंथकर उसकी रोटी बना कर ,उसे तिकोने टुकड़ों ( बर्फी शेप ) में काट लेते हैं। उसके बाद उसे तेल में फ्राई करके रख लिया जाता है। इन्हे खस्ता बनाने के लिए घी ,दही या आजकल सूजी का प्रयोग भी करते हैं। इसमें पानी की मात्रा कम होने के कारण ये जल्दी खराब नहीं होते हैं। लम्बी यात्राओं के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं। खजूरे भी उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई है।

रोट या रोटना –

पहाड़ो में स्थानीय लोक देवताओं के पूजन में प्रसाद के रूप में प्रयुक्त मीठी रोटी नुमा पकवान को रोट या रोटना कहा जाता है। इसे हाथ चक्की से पीसे हुए आटे में गुड़ ,तिल सौंफ मिलाकर बनाया जाता है। बड़े -बड़े गोल बिस्किट के आकर के रोट बनाकर ,उन्हें चौड़े बर्तन में हलकी आंच में सेका जाता है। इसमें पानी कम और घी ज्यादा होने के कारण ये जल्दी खराब नहीं होते हैं। इसे कुमाऊँ में रोट और गढ़वाल में रोटना कहते हैं।

साया –

उत्तराखंड में बनाये  वाला यह एक विशेष मीठा पकवान है। यह उत्तराखंड के कुमाऊं मण्डल में बनाये जाने वाला खास पकवान है। यह चैत्र के महीने में बहिन को दी जाने वाली भिटौली  बनाया जाता है। इसे बनाने के लिए सर्वप्रथम सूजी को दही में मिलकर रख देते हैं। कुछ देर रखने के बाद कढ़ाही में घी डालकर करछुली से काफी देर चलाया जाता है। तपश्यात अवश्यकतानुसार चीनी डाल कर उसे रोट की तरह सेक लिया जाता है। फिर करछी से छोटी -छोटी बर्फियाँ सी काटकर खाने को दी जाती है। यह काफी खस्ता और स्वादिष्ट होता है।

उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई

छउवा या छोलिया रोटी –

यह खास पर्वतीय मिष्ठान पकवान होता है। यह एक तरह की उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई भी है। ऐसे विशेष उत्सवों और खास मेहमानो के आगमन पर बनाया जाता है। इसे बनाने के लिए गुड़ के घोल में आटा मिलाकर किया जाता है। इस घोल को बड़ी सावधानी से अंगुलियों की सहयता से तवे पर फैलाया जाता है।

अन्यथा यह कहीं पर मोटा तथा कहीं पर पतला हो जाने से सेकते समय इसका पतला भाग या तो जल जाता है या मोटा भाग कच्चा रह जाता है। क्योंकि इसे अंगुलियों के पोरों के द्वारा गरम तवे पर फैलाया जाता है अत: इसमें सावधानी आवश्यक होती है अन्यथा अंगुलियों के पोरों के जलने का भी डर रहता है। इस काम में मात्र गृहणियां दक्ष होती हैं।

पुरुषों के द्वारा इसे बनाना असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होता है। यहां के ग्रामीण समाज में भी पहले बहू बेटियां मायके-ससुराल को जाते समय इन्हें उपहार स्वरूप ले जाया करती थीं। जौनपुर, जौनसार में इसे चिलड़ा कहते हैं।

सिंगल –

 मिष्ठान्नों में खीर, पुआ, हलवा, छोलुवा के अतिरिक्त विशेष  मिष्ठान्न ‘सिंगल’ भी बनाया जाता है जो अल्मोड़ा जनपद में अधिक प्रचलित है। बड़े इसके उपादान होते हैं- सूजी, घी, दही, चीनी व केला। पहले सूजी में चीनी और अपेक्षित मात्रा में घी तथा पके हुए केले को मिला कर उन्हें खूब मसल लिया जाता है। फिर उसमें आवश्यक मात्रा में दही व चीनी मिला कर फैंटा जाता है। फिर जलेबी बनाने की स्टाइल में किसी छेद वाले कपड़े या बर्तन में डाल के घी में तल लिया जाता है।

सेई – 

इसके लिए भी चावलों को भिगाकर तथा फिर धूप पीस लिया जाता है। फिर इसमें दही या दूध मिला कर थोड़ा-थोड़ा करके घी में तल लिया जाता है।

फफरोला –

यह फाफर (कोटू/ओगल) के आटे से तैयार किया जाने वाला मीठा भोज्य  है। इसे कोटू के आटे में गुड़/शक्कर मिलाकर डबल रोटी जैसी मोटी रोटी के रूप में तैयार किया जाता है। पहले लम्बी यात्रा पर जाने जाया करते थे, क्योंकि यह एक महीने तक भी वाले लोग इसे ही बना कर रखने से खराब नहीं होता था।

अर्सा/अर्शा –

यह उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल का लोकप्रिय विशिष्ट मीठा पकवान है। इसे उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई भी कहते हैं ।इसके लिए एक नियत परिमाण के हिसाब से चावलों को भिगा कर फिर उन्हें ओखली में कूट लिया जाता है। इसके बाद इसे छान कर गुड़ की चासनी में डाल कर हलवे की भांति गाढ़ा करके मालपुओं के समान उनके गोल-गोल- पेड़े बना कर उन्हें तेल में तला जाता है। ग्रामीण महिलाएँ मायके ससुराल आते जाते समय कल्यो ( सौगात) में इन्हें बना कर ले जाती हैं। विशेषकर उत्तराखंड की यह पारम्परिक मिठाई गढ़वाल मंडल में शादियों में विशेष रूप से प्रयोग की जाती है।

आटो या लापसी –

पहाड़ का यह मिष्ठान चावल की जगह आटे में दूध डालकर पकाई जाने वाली खीर की तरह होता है। इसे गढ़वाल में आटो और कुमाऊं में लपसी या लापसी कहते हैं। कुमाऊं के कतिपय हिस्सों में लाप्सी का प्रयोग प्रसूता गाय के दूध का आटे के साथ उपयोग शुरू करने की परंपरा के तौर पर किया जाता है।

उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई मालपुए या पुए –

यह भी  पारम्परिक तौर बनाई जाने वाली आटे,चीनी या गुड़ के घोल से बनाई जाने वाली उत्तराखंड की पारम्परिक मिठाई है। इसमें भी आटे के घोल में चीनी या गुड़, केला,दही , सूजी इत्यादि डाल कर पौकोड़ो की शक्ल में गुलगुले बनाए जाते हैं। पहले केवल आटे और चीनी से भी बनाए जाते थे। वर्तमान में अधिक चीजें उपलब्ध होने से सभी चीजों का प्रयोग किया जाता है। कहीं इसे आटे,दही इत्यादि मिलाकर चीनी की चासनी में भिगोया जाता है।पहाड़ में पारंपरिक पुए खुशियों या देवपूजन के अवसर पर बनाए जाते हैं। विस्तार से पढ़े – सोमेश्वर के प्रसिद्ध मालपुए, विलुप्त होते पारम्परिक स्वाद का आखिरी ठिकाना

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यमुनोत्री यात्रा: DM-SP ने किया यात्रा मार्ग का निरीक्षण, बिना पंजीकरण वालों को वापस भेजने के निर्देश

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यमुनोत्री यात्रा: DM-SP ने किया यात्रा मार्ग का निरीक्षण, बिना पंजीकरण वालों को वापस भेजने के निर्देश

उत्तरकाशी, 16 मई 2024: आज, उत्तरकाशी के जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) ने यमुनोत्री यात्रा मार्ग का निरीक्षण किया। यह निरीक्षण जानकीचट्टी से शुरू होकर डामटा तक किया गया। इस दौरान, उन्होंने बैरियर पर तैनात अधिकारियों और कर्मचारियों को निर्देश दिए कि वे बिना पंजीकरण के या निर्धारित तिथि से पहले या बाद में आने वाले तीर्थयात्रियों को वापस भेज दें।

उत्तरकाशी के जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) ने यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं का भी जायजा लिया। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे यह सुनिश्चित करें कि तीर्थयात्रियों को पीने के पानी, शौचालय और चिकित्सा सुविधाओं जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों।

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