उत्तराखंड में सावन 2025 का प्रारंभ और समापन – उत्तराखंड में सावन 2025 (Uttarakhand Sawan 2025) का महीना 16 जुलाई 2025 से शुरू होगा और 15 अगस्त 2025 को समाप्त होगा। यह अवधि हरेला पर्व के साथ शुरू होती है, जो उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रकृति और समृद्धि का प्रतीक है। इस वर्ष सावन का पहला सोमवार 21 जुलाई को आएगा, और 16 अगस्त को सिंह संक्रांति के साथ भाद्रपद माह शुरू हो जाएगा। देश के अन्य हिस्सों में सावन की तिथियां भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए, भारत के मैदानी क्षेत्रों में सावन 11 जुलाई 2025 से 9…
Author: Bikram Singh Bhandari
उत्तराखंड के हरेला पर्व पर निबंध – भारत एक विविधताओं का देश है। भारत देश में एक नीले आसमान के नीचे कई समृद्ध संस्कृति फल फूल रही हैं। भारत की अनेकताओं में कुछ त्यौहार ऐसे हैं ,जो सारे देश को एक साथ जोड़ते हैं। सावन माह में देवभूमि कहे जाने वाले राज्य उत्तराखंड में एक प्रकृति को समर्पित त्यौहार हरेला मनाया जाता हैं। उत्तराखंड के निवासी प्राचीन काल से ही ,प्रकृति के प्रति अपना प्रेम और अपनी जिम्मेदारी को बखूबी दर्शाते आएं हैं। उत्तराखंड में मनाया जाने वाला यह पर्व मूलतः पर्यावरण के साथ साथ कृषि विज्ञानं को भी समर्पित है।…
हरेला पर्व 2025हरेला पर्व 2025 में कब मनाया जाएगा ? हरेला पर्व, उत्तराखंड का एक प्रमुख सांस्कृतिक और कृषि उत्सव, वर्ष 2025 में 16 जुलाई को पूरे उत्साह के साथ मनाया जाएगा। इस पर्व के लिए हरियाला बोने की तिथियां इस प्रकार निर्धारित हैं: 11 दिन वालों का हरेला: 06 जुलाई 2025 को बोया जाएगा। 10 दिन वालों का हरेला: 07 जुलाई 2025 को बोया जाएगा। 08 जुलाई को 09 दिन का हरेला बोया जायेगा। हरियाला बोने का शुभ दिन ज्योतिषीय गणना के आधार पर चुना जाता है, जो भद्रादि दोषों से मुक्त हो। यह पर्व श्रावण मास की संक्रांति…
परिचय – कोटगाड़ी देवी मंदिर उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित एक प्रसिद्ध धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। यह मंदिर देवी भगवती को समर्पित है, जिन्हें स्थानीय लोग न्याय की देवी के रूप में पूजते हैं। यह मंदिर पिथौरागढ़ मुख्यालय से 55 किमी और डीडीहाट से 23 किमी की दूरी पर थल के निकट पांखू गांव में स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए थल से 2 किमी की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यह स्थान न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि मध्यकालीन व्यवसायिक कस्बे के रूप में भी जाना जाता है। कोटगाड़ी देवी की मान्यताएं – कोटगाड़ी देवी…
कोटिप्रयाग, उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में रुद्रप्रयाग जनपद की कालीमठ घाटी में स्थित एक पवित्र तीर्थ स्थल है। यह स्थान मंदाकिनी और कालीगंगा नदियों के संगम पर बसा है, जिसे इसके पुराणोक्त महत्व के कारण ‘उत्तरगया’ और ‘कोटिप्रयाग’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिकता का भी अनूठा संगम है। इस लेख में हम कोटिप्रयाग के धार्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक महत्व को विस्तार से जानेंगे। कोटिप्रयाग का धार्मिक महत्व – कोटिप्रयाग का उल्लेख स्कंद पुराण के केदार खंड (अध्याय 90) में मिलता है, जहां इसे गंगा के…
हिमालयी राज्य उत्तराखंड की गोद में पलने वाली झूला घास, जिसे वैज्ञानिक भाषा में लाइकेन (Lichen) कहा जाता है, प्रकृति का एक अनोखा चमत्कार है। यह फफूंदी (Fungus) और शैवाल (Algae) के परस्पर लाभकारी (Symbiotic) संबंध से बना एक जीव है, जो पेड़ों की छालों और चट्टानों पर उगता है। सतह पर यह मामूली प्रतीत हो सकता है, किंतु इसके पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व को समझना आवश्यक है। जैविक संरचना और पारिस्थितिक भूमिका – झूला घास लाइकेन एक हेलोटिज्म (Helotism) संबंध का परिणाम है, जिसमें शैवाल प्रकाश संश्लेषण से कार्बोहाइड्रेट बनाता है और फफूंदी उसे जल, खनिज, और सुरक्षा प्रदान…
गुप्तकाशी, उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में रुद्रप्रयाग जनपद की केदारघाटी में मंदाकिनी नदी के तट पर समुद्रतल से 1,319 मीटर (लगभग 4,850 फीट) की ऊंचाई पर बसा एक प्राचीन और पवित्र स्थल है। इसके ठीक सामने ऊखीमठ स्थित है, जो इस क्षेत्र का एक अन्य महत्वपूर्ण स्थान है। यह स्थान अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है। गुप्तकाशी का नाम पौराणिक कथाओं से जुड़ा है, जो इसे ‘गुप्त काशी’ यानी ‘छिपी हुई काशी’ के रूप में पहचान देता है। यह स्थान ऋषिकेश से 185 किलोमीटर और केदारनाथ से मात्र 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भौगोलिक…
उत्तराखंड के इंटरनेट मीडिया में एक उभरते सितारे के रूप में राहुल कोटियाल ने अपनी प्रतिभा और निडर पत्रकारिता से सभी का ध्यान आकर्षित किया है। उनका जन्म 12 मार्च को हुआ, हालांकि उन्होंने सोशल मीडिया पर जन्म का साल छिपा लिया है। इसलिए हम भी यहाँ उनका जन्म वर्ष अपडेट नहीं कर रहे हैं। पुरानी टिहरी में पले-बढ़े राहुल का बचपन कोटी कॉलोनी में बीता, जहाँ उनके पिता, अधिवक्ता राजेंद्र कोटियाल, प्रैक्टिस करते थे। राहुल कोटियाल का प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि – राहुल का बचपन टिहरी बांध के निर्माण के दौरान कोटी कॉलोनी में गुजरा,। उनके पिता राजेंद्र…
सनातन धर्म की सबसे अनोखी विशेषता यह है कि यहाँ देवताओं के साथ-साथ असुरों को भी उतने ही सम्मान और श्रद्धा से पूजा जाता है। यही उदारता और समरसता देवभूमि उत्तराखंड को विशेष बनाती है। यहाँ पांडवों की पूजा होती है, तो वहीं दुर्योधन को भी देवता का दर्जा प्राप्त है। पांडवकालीन हिडिम्बा देवी की भी पूजा होती है। यही कारण है कि उत्तराखंड को “देवभूमि” कहा जाता है — जहाँ शुभ ग्रह ही नहीं, अशुभ ग्रहों की भी पूजा होती है। आज हम आपको एक ऐसे दुर्लभ और पौराणिक मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे भारत…
उत्तराखंड, जहाँ हर चट्टान, हर झरना और हर नदी एक कहानी कहती है — वहीं सरस्वती नदी की कहानी हजारों वर्षों से वेदों, पुराणों और महाभारत जैसे ग्रंथों में जीवित है। अधिकतर लोग मानते हैं कि सरस्वती अब अदृश्य है, लेकिन माणा गांव में यह आज भी दृश्यमान है। सरस्वती नदी का स्थान: माणा गांव, उत्तराखंड यह नदी चमोली जिले के माणा गांव के पास बहती है। यह बद्रीनाथ धाम से 3 किमी दूर स्थित है। नदी का स्रोत हबूतौली बॉक हिमानी (विष्णुनाभि) है। वैदिक और पौराणिक मान्यता “अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति, अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नमस्कृषि।” ऋग्वेद में सरस्वती…