Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

मलयनाथ स्वामी उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के लोकदेवता हैं। यह उत्तराखंड के कुमाऊं के पूर्वी क्षेत्र सीरा एवं अस्कोट के लोकदेवता हैं। इनका मंदिर डीडीहाट के नजदीक सीराकोट दुर्ग के पुराने खंडहरों के बीच स्थित है। मलयनाथ देवता के बारे में कहा जाता है कि मलयनाथ सम्भवतः कोई मल्ल राजकुमार था। इनके मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ ब्राह्मणों का प्रवेश निषिद्ध है। मलयनाथ स्वामी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहाँ पूजा केवल क्षत्रिय और जागर गान करने वाले करते हैं। इनकी जागर चार दिन की होती है , जिसे चौरास कहते हैं। मलयनाथ…

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पद्म का वृक्ष को उत्तराखंड के पहाड़ों की लोक संस्कृति में देव वृक्ष कहा जाता है। पहाड़ों में इस वृक्ष का बहुत महत्व है। पद्म के पेड़ की लकड़ी पहाड़ो में चन्दन की लकड़ी के बराबर पवित्र मानी जाती है। पद्म का वृक्ष का वैज्ञानिक परिचय – पद्म का वृक्ष का वानस्पतिक नाम प्रुन्नस सीरासोइडिस है। यह रोजेसी कुल का पौधा है। इस पेड़ का हिंदी नाम पद्म या पदखम है। अंग्रेजी में पद्म के पेड़ को बर्ड चेरी (Bird cherry ) के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों में इसे पयाँ ,पया ,पयों आदि नामो से जाना…

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हरिबोधिनी एकादशी – मुख्य दीपावली के बाद जो एकादशी आती है उसे हरिबोधनी एकादशी कहते है। सनातन धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान् विष्णु चार माह की योगनिद्रा के बाद उठते हैं। इस दिन को उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में इगास बग्वाल और कुमाऊं में बुढ़ दियाई यानि बूढी दीपावली मनाई जाती है। बग्वाल का अर्थ जहाँ पत्थर युद्ध या उसका अभ्यास होता है। प्राचीन काल में पहाड़ों के राजा महाराज ,सामंत अपनी पत्थर आयुध टुकड़ी से बरसात बाद के त्योहारों पर पत्थर युद्ध का अभ्यास करवाते थे ,संभवतः इसलिए कालान्तर में पत्थर युद्ध का अभ्यास तो…

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पहाड़ की बेटी को न्याय : आज उत्तराखंड की एक ऐसी बेटी की कहानी बताने जा रहे हैं ,जिसकी पूरी कहानी पढ़ने के बाद आप उसके हौसले ,उसके संघर्ष को नमन किये बिना नहीं रह पाओगे ! आजकल गढ़ी चंपावती के सर्वोच्च न्यायधीश यानी गोल्ज्यू महाराज उत्तराखंड की यात्रा पर हैं। गोल्ज्यू सन्देश यात्रा के अंतर्गत पूरे उत्तराखंड का भ्रमण कर रहे हैं। बात है 06 नवंबर 2024 की ,आज गोल्ज्यू की यात्रा का पड़ाव होना था धर्म नगरी हरिद्वार में। इधर हरिद्वार के एक न्यायालय में एक पहाड़ की बेटी न्याय की प्रतीक्षा कर रही थी , आठ साल…

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उत्तराखंड स्थापना दिवस की शुभकामनाएं : मित्रों 09 नवंबर 2000 उत्तराखंड राज्य की स्थापना भारत के 27 वे राज्य के रूप में हुई। जैसा की हमने अपने पूर्व लेखों में बताया की आजादी के बाद उत्तराखंड के पहाड़वासियों को यह बात धीरे धीरे समझ में आने लगी थी की हम सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से धीरे धीरे पिछड़ते जा रहे हैं। पहाड़ी समाज लगातार उपेक्षा का शिकार हो रहा था। इन्ही सब चीजों को मध्यनजर रखते हुए , पहाड़ के निवासियों ने एक सपनो के राज्य उत्तराखंड की कल्पना की। और इसी कल्पना को सार्थक रूप देने के लिए पहाड़…

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उत्तराखंड स्थापना दिवस पर कविता – 09 नवंबर 2000 को भारत के 27 वे राज्य के रूप में उत्तरांचल राज्य का गठन हुवा था। और 01 जनवरी 2007 से उत्तराँचल का नाम उत्तराखंड कर दिया गया। प्रतिवर्ष 09 नवंबर के दिन उत्तराखंड के निवासी अपने राज्य का स्थापना दिवस मनाते हैं। प्रस्तुत पोस्ट में उत्तराखंड स्थापना दिवस पर कविता का संकलन किया गया है। इस पोस्ट में दो कविताओं का संकलन किया गया है।  इन कविताओं में पहली कविता उत्तराखंड के प्रसिद्ध कवि श्री नारायण सिंह बिष्ट जी का कविता संग्रह धज में से लिया गया है। उत्तराखंड स्थापना दिवस पर…

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बग्वाल का मतलब – उत्तराखंड के कुमाऊं और  गढ़वाल क्षेत्र में बग्वाल नाम से कई लोक उत्सव मनाये जाते हैं। मुख्यतः उत्तराखंड में बग्वाल के नाम से दीपावली और दीपावली से जुड़े त्योहारों को इंगित किया जाता है। उत्तराखंड में बग्वाल का अर्थ होता है पत्थर युद्ध अथवा पत्थर युद्ध का अभ्यास। प्राचीनकाल में पहाड़ो में  राजाओं और सामंतों के पास सेना एक ऐसी टुकड़ी रहती थी ,जो पत्थर युद्ध करती थी। उसे आप वर्तमान भाषा में पत्थर मार टुकड़ी भी कह सकते हैं। जिस प्रकार राजपूत सेना के सैनिक अपनी विजय यात्राओं से पहले युद्धाभ्यास करते थे उसी प्रकार…

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उत्तराखंड स्थापना दिवस प्रतिवर्ष 09 नवंबर को मनाया जाता है। वर्ष 2024 में उत्तराखंड का 25 वां रजत स्थापना दिवस मनाया जायेगा। 09 नवंबर 2000 को भारत के 27वे राज्य के रूप में उत्तरांचल राज्य का गठन किया गया और देहरादून को इसकी अस्थाई राजधानी घोषित किया गया ,जो अब उत्तराखंड की शीतकालीन राजधानी है। उत्तरांचल राज्य बनने से पहले हिमालय का यह भू भाग उत्तरप्रदेश का हिस्सा था। हिमालय की गोद में बसे इस प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर भू भाग को अलग राज्य बनाने की मांग सर्वप्रथम 05 – 06 मई 1938 को श्रीनगर गढ़वाल में आयोजित भारतीय राष्ट्रिय…

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दीपावली के तीसरे दिन जहाँ पूरा देश भाई दूज का त्यौहार मना रहा होता है ,वहीँ उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र के निवासी दुतिया त्यार या दुति त्यार मनाते हैं। हालाँकि यह पर्व यमद्वितीया पर्व का ही एक लोक रूप है। इसको पारम्परिक रूप में मनाया जाता है। पहाड़ो में बरसात के बाद बग्वाल खेलने की परंपरा पुरानी है ,जिसे वर्तमान में त्योहारों और लोकपर्वों के साथ जोड़ दिया है। अब श्रावण पूर्णिमा की बग्वालऔर गोधन पूजा के दिन पाटिया की बग्वाल के अलावा सारी बग्वालें बंद हो गई हैं , कहीं कहीं केवल सांकेतिक रूप से मनाई जाती है। दीपावली…

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कालू सिद्ध बाबा ( kalu sidh mandir haldwani ) – उत्तराखंड का व्यापारिक नगर के नाम से प्रसिद्ध हल्द्वानी आज की तारीख़ में किसी पहचान का मोहताज नहीं है। इसे कुमाऊं का द्वार भी कहते हैं ,उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में जाने का मार्ग भी यहीं से खुलता है। हल्द्वानी नगर उत्तराखंड के नैनीताल जिले में समुद्रतल से 1434 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, हल्द्वानी कुमाऊं क्षेत्र में व्यापार और प्रशासन का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। ​​यह शहर उत्तरी भारत के मैदानों को हिमालय के पहाड़ी स्टेशनों से जोड़ने वाले मार्ग पर एक महत्वपूर्ण…

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