Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

उत्तराखंड की गोद में बसा एक अलौकिक अंचल — दानपुर, न केवल हिमालय की अद्भुत सुंदरता से सजा हुआ है, बल्कि यह इतिहास, लोकमान्यताओं, और सांस्कृतिक विरासत का भी जीवंत उदाहरण है। यह क्षेत्र वर्तमान में बागेश्वर ज़िले में आता है और अपने भीतर पिंडारी ग्लेशियर से लेकर कव्वालेख जैसी दुर्लभ मान्यताओं तक, कई रहस्यमयी और रोचक तथ्य समेटे हुए है। दानपुर की सीमाएँ जोहार, गढ़वाल, पाली, बारामंडल और गंगोली जैसे क्षेत्रों से मिलती हैं। इसके उत्तर में बर्फ से ढकी पहाड़ियाँ और दक्षिण में ऊँचे पर्वत शिखर हैं। यहाँ के प्रमुख हिमालयी शिखरों में नंदाकोट, नंदाखाट, नंदादेवी, सुन्दरढुंगा और…

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गंगा दशहरा पूरे देश मे मनाया जाता है। गंगा दशहरा जेष्ठ शुक्ल दशमी को मनाया जाता है। जेष्ठ शुक्ल दशमी के दिन गंगा माता स्वर्ग से पृथ्वी लोक को आगमन हुआ था। माँ गंगा के धरती के आगमन के उपलक्ष्य में इस दिन को मनाया जाता हैं। उत्तराखंड कुमाउनी लोग इस दिन अपने द्वार पर विशेष अभिमंत्रित पत्र लगाते हैं। जिसे गंगा दशहरा द्वार पत्र कहते हैं। गंगा अवतरण की कथा जेष्ठ शुक्ल दशमी के दिन भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने मा गंगा को धरती पर अवतरण के आदेश पर माँ गंगा धरती पर अवतरण के…

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कुमाऊनी भड़ गाथा : मित्रों आपने इस कहानी से पहले इस कहानी के पहले 2 भाग भ्यूराजी और स्यूंराजी बोरा पढ़ लिए हैं। आज आपके लिए लाएं हैं इस वीर भड़ गाथा सीरीज का तीसरा भाग रणजीत बोरा और दलजीत बोरा। इस कहानी के पहले 2 भागों का लिंक इस कहानी के अंत में दिया है , जिसने नहीं पढ़ा वे इन भागों को जरूर पढ़े :- बोरीकोट के दो राजकुंवर-रणजीत बोरा और दलजीत बोरा भ्यूराजी और स्यूंराजी बोरा के पुत्र थे। कुमाऊं -चंपावत के राजा भारतीचंद को ध्यानीकोट के बाईस भाई झिमौड़ों ने तंग कर रखा था। भारतीचंद के…

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श्री सिद्धेश्वर महादेव कालीगाड़ बुबुधाम रानीखेत (‘Bubu Dham Ranikhet’) भगवान शिव और माता पार्वती का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जो रानीखेत से लगभग 7 किमी दूर घिंगारी खाल के पास, रानीखेत-मजखाली रोड पर स्थित है। नैनी गांव के मोड़ पर, चारों ओर चीड़ के लंबे-लंबे पेड़ों से घिरा यह मंदिर अभूतपूर्व शांति और आध्यात्मिकता का अहसास कराता है। यह प्राचीन मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि अपनी पौराणिक कथाओं और चमत्कारों के लिए भी जाना जाता है। बुबुधाम की शांति और सुंदरता चारों ओर ऊंचे चीड़ के पेड़ों से घिरा यह मंदिर (‘Bubu Dham Ranikhet’) रोजमर्रा की जिंदगी…

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तिलाड़ी कांड (tiladi kand ) : उत्तराखंड, एक ऐसा क्षेत्र जो अपनी दुर्गम पहाड़ियों और साहसी लोगों के लिए जाना जाता है, का इतिहास अधिकारों, संसाधनों, और सम्मान की लड़ाई से भरा पड़ा है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक समय तक, उत्तराखंड के निवासियों को अपने हक और सुविधाओं के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ा है। इस क्षेत्र का इतिहास अनेक आंदोलनों की गाथाओं से सजा है, जिनमें स्थानीय लोगों ने अपनी आवाज उठाने के लिए अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। इन आंदोलनों में से एक, तिलाड़ी कांड (tiladi kand ) या तिलाड़ी आंदोलन, अपने हक की मांग करते…

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उत्तराखंड की सांस्कृतिक परंपरा में लोक देवताओं का एक विस्तृत संसार है। इनमें अधिष्ठाता देवता, इष्टदेवता, कुलदेवता, ग्रामदेवता, क्षेत्रपाल, कृषिदेवता, पशुदेवता, रथ देवता और पितृदेवता जैसी अनेक श्रेणियाँ आती हैं। इन लोकदेवताओं में कुछ दिव्य और वायवीय शक्तियाँ हैं, जबकि कुछ का सीधा संबंध इस सृष्टि के मानव समाज से है। रथदेवता ऐसे ही लोक देवताओं की श्रेणी में आते हैं, जिनकी उत्पत्ति और पूजा की परंपरा मानवीय जीवन से जुड़ी हुई है। रथ देवता वे महामानवीय आत्माएँ होती हैं जिन्होंने अपने जीवन में लोककल्याण के लिए महान कार्य किए, और जिनकी स्मृति को कृतज्ञतापूर्वक पूजनीय मान लिया गया। वहीं…

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राजा हरूहीत की कहानी: उत्तराखंड, एक ऐसी भूमि जो रहस्यवाद और सांस्कृतिक विरासत से ओतप्रोत है, अपनी जीवंत लोककथाओं और गीतों के लिए प्रसिद्ध है जो इस क्षेत्र की समृद्ध परंपराओं को प्रतिबिंबित करते हैं। अनेक प्रिय कहानियों में से राजा हरु हीत की लोककथा कुमाऊँ की संस्कृति और आस्था का प्रतीक है। एक दैवीय व्यक्तित्व के रूप में पूजे जाने वाले राजा हरुहीत की कहानी न केवल एक कथा है, बल्कि उत्तराखंड के लोगों की अटूट आस्था का प्रमाण है। उनका दो सदी से अधिक पुराना मंदिर दूर-दूर से श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, जो मानते हैं कि यहाँ…

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उत्तराखंड के चमोली जिले के बाण गाँव में स्थित है एक रहस्यमयी मंदिर — लाटू देवता मंदिर, जहाँ स्वयं नागराज अपनी मणि के साथ विराजमान माने जाते हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां साल में केवल एक दिन कपाट खुलते हैं और उस दिन भी पुजारी आंख, मुंह और नाक पर पट्टी बांधकर 80 फीट दूर से पूजा करते हैं। लाटू देवता कौन हैं ? लोककथाओं के अनुसार लाटू देवता माँ नंदा देवी के धर्म भाई माने जाते हैं। उन्हें भगवान भोलेनाथ के प्रमुख गणों में से एक माना गया है। वे सेनापति भी थे…

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उत्तराखंड के नैनीताल जिले की शांत पहाड़ियों में बसा लुखाम ताल और लोहाखाम मंदिर आध्यात्मिक श्रद्धा और प्राकृतिक वैभव का एक अनूठा संगम है। ओखलकांडा ब्लॉक में स्थित यह स्थान नैनीताल मुख्यालय से लगभग 72 किमी और काठगोदाम से 50 किमी की दूरी पर है। कच्चे रास्तों के कारण यह स्थान अभी भी पर्यटकों की भीड़ से अछूता है, लेकिन यहां आने वालों को एक शांत ताल, पवित्र मंदिर और क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का अनुभव प्राप्त होता है। लुखामताल और लोहाखाम मंदिर का आध्यात्मिक महत्व लुखामताल, जिसका अर्थ है “लौहस्तंभ,” अपने नाम के देवता लुखाम देवता से प्रसिद्ध…

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सोमनाथ मेला उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के मासी गांव में रामगंगा नदी के तट पर, सोमेश्वर महादेव मंदिर के सामने आयोजित होने वाला एक प्रसिद्ध उत्सव है। यह मेला चखुटिया कस्बे से लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और उत्तराखंड के सबसे महत्वपूर्ण मेलों में से एक है। यह न केवल सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समृद्ध है, बल्कि व्यावसायिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। पहले यह मेला काशीपुर के चैती मेले की तरह पशुओं के व्यापार के लिए जाना जाता था, लेकिन अब बदलते समय के साथ यहां आधुनिक और पारंपरिक वस्तुओं का व्यापार होता है। मेले की शुरुआत…

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