बाखूल: पहाड़ों में हिमालय के ऊंचे और सीमान्त इलाकों में रहने वाले लोगों ने सदियों से प्रकृति और स्थानीय संसाधनों के सहारे अपने जीवन को आसान बनाने के तरीके विकसित किए हैं। इन्हीं पारंपरिक ज्ञान और हुनर की एक अनूठी मिसाल है ‘बाखूल’, जिसे पहाड़ों के मेषपालक और मेषचारक यानी अणवाल बेहद ठंड, बारिश और बर्फबारी से बचने के लिए पहनते थे।
बाखूल विशेष रूप से हिमालयी सीमान्त क्षेत्रों में, खासकर दामपुर (बागेश्वर जनपद) के मेषपालकों के बीच प्रचलित पारंपरिक शरीरावरण रहा है। देखने में यह एक सामान्य जैकेट जैसा लग सकता है, लेकिन इसे बनाने की प्रक्रिया और इसकी उपयोगिता इसे खास बनाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसे किसी आधुनिक सिंथेटिक कपड़े से नहीं, बल्कि भेड़-बकरियों की ऊन से तैयार किया जाता है।
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ऊन से तैयार होता है बाखूल :-
बाखूल बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह पारंपरिक और श्रमसाध्य होती है। सबसे पहले भेड़ की ऊन को हाथ से काता जाता है। इसके बाद इस ऊन को चान यानी पारंपरिक करघे पर बुनकर एक मोटा पट्टा तैयार किया जाता है, जिसे पखवा कहा जाता है।
इसके बाद पखवे को करीब आधे घंटे तक पानी में भिगोकर रखा जाता है। फिर लगभग डेढ़ फीट लंबा और दो फीट चौड़ा एक समतल पत्थर लिया जाता है। उसे गर्म करने के बाद पखवे को उसके ऊपर रखकर करीब दो घंटे तक पैरों से लगातार मथा और मसला जाता है।
यह प्रक्रिया सुनने में जितनी सरल लगती है, वास्तव में उतनी ही मेहनत वाली है। लगातार मसलने की प्रक्रिया से ऊन के रेशे आपस में मजबूती से जुड़ जाते हैं और कपड़ा बेहद घना तथा सख्त हो जाता है।
बारिश और बर्फबारी में भी देता है सुरक्षा
पारंपरिक तरीके से तैयार किया गया यह ऊनी कपड़ा जलरोधक और वायुरोधक बन जाता है। यही कारण है कि हिमालय के कठोर मौसम में यह मेषपालकों के लिए किसी आधुनिक वाटरप्रूफ जैकेट से कम उपयोगी नहीं माना जाता था।
ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में जहां अचानक बारिश, बर्फबारी और तेज ठंडी हवाओं का सामना करना पड़ता है, वहां बाखूल शरीर को गर्म रखने के साथ-साथ बाहरी नमी और हवा से भी सुरक्षा प्रदान करता था।
पहाड़ के पारंपरिक ज्ञान की मिसाल
बाखूल केवल पहनने वाला एक वस्त्र नहीं, बल्कि पहाड़ के लोगों के पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय संसाधनों और आत्मनिर्भर जीवनशैली का उदाहरण है। बिना आधुनिक मशीनों और कृत्रिम सामग्री के, स्थानीय ऊन को एक ऐसे मजबूत और मौसमरोधी वस्त्र में बदल देना उस समय के ग्रामीण तकनीकी कौशल को दर्शाता है।
आज जब आधुनिक बाजार में तरह-तरह के वाटरप्रूफ जैकेट और थर्मल कपड़े उपलब्ध हैं, ऐसे में बाखूल जैसी पारंपरिक वस्तुएं उत्तराखंड की लोक संस्कृति और पुराने जीवन-ज्ञान की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। भेड़ की ऊन से तैयार यह पारंपरिक ‘पहाड़ी जैकेट’ बताती है कि हिमालय के लोगों ने प्रकृति को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि उसके संसाधनों से अपने जीवन की जरूरतों का समाधान भी खोजा।
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