सीता वन में अकेली कैसे रहीसीता वन में अकेली कैसे रही – कुमाऊनी होली गीत लिरिक्स (Sita van me akele kaise rahe lyrics in Hindi)
कुमाऊँ की बैठकी होली में गाया जाने वाला यह भावपूर्ण गीत सीता के वनवास के त्याग, धैर्य और संघर्ष को लोक-संगीत के माध्यम से सामने रखता है। यह रचना रामायण की कथा से प्रेरित है, लेकिन कुमाऊनी लोकभाव में ढली हुई — जहाँ भक्ति, विरह और संवेदना एक साथ बहती है। यह गीत खास तौर पर कुमाऊनी होली के दौरान सामूहिक गायन में गाया जाता है, और हर अंतरे के साथ वही सवाल लौटता है —
सीता वन में अकेली कैसे रही?” नीचे पूरे बोल (lyrics) दिए जा रहे हैं —
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सीता वन में अकेली कैसे रही – होली गीत लिरिक्स :
सीता रंग-महल को छोड़ चली है,
हां हां जी सीता रंग-महल को छोड़ चली है,
वन में कुटिया बनाए।
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
सीता षठरस-भोजन छोड़ चली,
हां हां जी सीता षठरस-भोजन छोड़ चली,
वन में कंद मूल फल खाए।
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
सीता सौंड-सफेदा छोड़ चली है,
हां-हां जी सीता सौंड-सफेदा छोड़ चली है,
वन में पतिजा बिछाए।
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
सीता पान-सुपारी छोड़ चली है,
हां-हां जी सीता पान-सुपारी छोड़ चली है,
वन में वन-फल खाए।
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
सीता तेल-फुलेल को छोड़ चली,
हां हां जी सीता तेल-फुलेल को छोड़ चली,
वन में धूल रमाए।
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
सीता कंटकारो छोड़ चली है,
हां हां जी सीता कंटकारो छोड़ चली है,
कंटक चरण लगाए।
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
कैसे रही दिन रात,
सीता वन में अकेली कैसे रही है।
गीत का भावार्थ (संक्षेप में) :
इस कुमाऊनी होली गीत में राजमहल के सुख-वैभव से लेकर स्वादिष्ट भोजन, श्रृंगार, पान-सुपारी तक — हर सांसारिक सुख के त्याग का वर्णन है। कांटों भरे वनपथ, कंद-मूल और धूल भरी ज़िंदगी… और फिर भी सीता का धैर्य। यही कारण है कि यह गीत सुनने वाले के मन को भीतर तक छू जाता है।
कुमाऊनी होली गीत लिरिक्स | Top10 best Kumaoni holi song lyrics
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