स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा
उत्तराखंड की लोककथाएँ

कुमाऊं के वीर योद्धा स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा की रोमांचक लोक कथा।

मित्रों बचपन में हमने अपने दादा दादी नाना नानी से कई कुमाउनी और गढ़वाली लोकथाएँ सुनी हैं। उन्ही में से एक कुमाऊं के द्वाराहाट  क्षेत्र के आस पास की  स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा की लोक कथा है। यह कहानी इतनी रोमांचक है ,यदि कोई इस लोक कथा पर फिल्म बनाना चाहें तो ,बाहुबली और कांतारा से अच्छी फिल्म बन सकती है ,एक्शन रोमांच ,सस्पेंस सब कुछ है इस लोक कथा में। ..तो शुरू करते हैं ….

स्यूंराजी बोरा के पिता का नाम झुपुवा बोरा , माँ का नाम झुपुली बौराणी और भाई का नाम भ्यूंराजी बोरा और चाचा का नाम हरक सिंह बोरा था। यह बोरिकोट में रहता था। स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा दोनों भाई बोरिकोट के जंगलों में गाय भैंस चराते और शिकार खेलते थे। रामगंगा की मछलियां ,दुनागिरि की दही और हाट के पापड़ खाते थे। दोनों भाई बचपन से ही बड़े पराक्रमी थे। लड़ते हुए भैंसो को अलग -अलग कर देते थे। बाघ के शावकों को पकड़ कर घर ले आते थे। उनकी वीरता की खबर चारों तरफ फ़ैल चुकी थी। इनका चाचा हरक सिंह बोरा चम्पावत के चंद राजा भारतीचंद का दीवान था। हरक सिंह मन ही मन उनके फैलते यश और कीर्ति से उदास हो गया। और दोनों भाइयों को अपने रस्ते से हटाने का मौका ढूढ़ने लगा। एक दिन उसके शैतानी दिमाग में एक विचार आया , क्यों ना इन दोनों भाइयों को माल -भाभर भेज कर मरवा दिया जाय ! उसने राजा भारतीचंद से कहा ,” महाराज हमे माल भाबर में लगान उसूलने के लिए किसी योद्धा को वहां भेजा जाए। और इस काम के लिए मेरे भतीजे स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा उपयुक्त होंगे। तब राजा ने हरक सिंह को कहा कि तुम जल्द से जल्द अपने भतीजो को चम्पावत बुला लो।

हरक सिंह स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा  को लेने के लिए बोरिकोट पंहुचा और उन्हें राजा का सन्देश सुनाया तो , दोनों भाइयों ने अपने चाचा को टका सा जवाब देते हुए कहा ,”हम अपना कमाते खाते हैं ,अपनी मेहनत करते हैं। तुम्हारे राजा की कोई कृपा नहीं चाहिए ! हमे नहीं आना चम्पावत। हरकसिंह वापस आ गया। आकर उसने राजा से कहा कि मेरे कहने पर वे यहाँ नहीं आ रहें है , आप अपने हिसाब से उन्हें यहाँ बुलाइये ..

तब राजा ने एक संदेशवाहक द्वारा सन्देश पत्र भेजा। राजा का सन्देश पत्र पाकर स्यूंराजी बोरा खुश हुवा ,अब उसे वास्तव में विश्वास हुवा कि राजा हमे बुला रहा है ..उसने चम्पावत राजदरबार में जाने का मन बना लिया। उसकी भाभी और माँ ने उसे मना किया लेकिन स्यूंराजी नहीं माना। चम्पावत जाने से पहले उसने अपने बड़े भाई भ्यूंराजी बोरा को सावधान करते हुए कहा ,” दाज्यू तुम सोमनाथ -बमोरी के मेले में मत जाना ,भाभी कितना भी जिद करे ,फिर भी तुम मत जाना। मै कुमु चम्पावत जाकर आता हूँ। ”

अगले दिन स्यूंराजी कुमु चम्पावत के लिए चला गया। राजदरबार में पंहुचा तो राजा बोला ,”हरक सिंह ये बच्चे को कहाँ से पकड़ कर ले आया ?? ! ये माल भाबर में क्या उगाही करेगा !! इसे छह महीने अच्छी खुराक दो ,फिर मेरे पास लाना। स्यूंराजी को बारह अंडे दो किलो दूध और अच्छा खाना रोज मिलने लगा।  और इस भोजन में से हरक सिंह अपने बच्चों को भी खिला देता था। मात्र चार महीने में ही स्यूंराजीबोरा पूरा पहलवान बन गया। छह गज की छाती और नौ गज की पीठ और गठीली भुजाओं वाला स्यूंराजी राजदरबार में गया और बोला , “महाराज मुझे आपने यहाँ किस कार्य हेतु रखा है ? मुझे मेरा काम बताइये  ….. मै आपके सब काम करूँगा! ” राजा बोला ,” तुम्हे कल माल भाबर के लिए प्रस्थान करना है। और वहां जाकर गुज्जरहंस लूल से हमारी लगान की रकम उसूल करके लानी है। अगले दिन स्यूंराजी माल भाबर के लिए चल पड़ा और एक दिन की घोड़े से यात्रा करके माल भाबर पहुंच गया। वहां जोगी का वेश धारण करके ,पानी की बावड़ी पर बैठ गया। शाम को वहां गुज्जरहंस लूल की बाइस बहुएं पानी भरने के लिए आई। उनमे से सबसे छोटी बहु ,जिसका नाम मोतिमा लुलाणी था वो पूछने लगी ,” हे जोगी तुम कौन हो ? तुम्हे ऐसा कौन सा दुःख लग गया जो इस भरी जवानी में जोग ले लिया ! तुम मुझे आकर्षक लगे ,तूम अपने मन की बात मुझे बताओ ! तुम धरम के जोगी हो या करम के जोगी हो ?”

तब स्यूंराजी बोरा बोलता है,” हे सूंदर नारी ! न मै जन्म का जोगी हूँ ,और न कर्म का जोगी हूँ।  तुम मुझे वचन दो कि किसी को नहीं बताओगी मेरे बारे में ! तब मै अपनी मन की बात तुम्हे बताऊंगा !”

तब मोतिमा लुलाणी कहने लगी ,” जोगी ! मैं गुज्जरहंस लूल की छोटी बहु मोतिमा लुलानी हूँ। मेरा लूल गाय भैसों का ग्वाला है। यदि तुम ठग जोगी हो तो मैं तुम्हारे साथ आउंगी ! और यदि धर्म के जोगी हो तो मुझे अपनी जोगन बना लेना  …..” स्यूंराजी बोला , ” हे सूंदर नारी मैं स्यूंराजी सिंह बोरा नामक योद्धा हूँ। मैं यहाँ गुज्जरहंस लूल से युद्ध करने यहाँ आया हूँ। विजय प्राप्त करूँगा तो तुम्हे भी अपने साथ  बोरिकोट ले जाऊँगा ! ” इतना वार्तालाप होने के बाद स्यूंराजी सबसे छोटी बहु के पीछे -पीछे चल पड़ा।  घर पहुंचकर वो अपने ससुर को बोली ,” ससुर जी ! मेरे मायके के जोगी आये हैं।,आपकी धर्म कर्म में रूचि होने के कारण मैं इनको यहाँ ले आई। ये बड़े धर्मात्मा है ,हमारे घर के मंदिर में रोज पूजा पाठ करेंगे। ” गुज्जरहंस लूल बहुत खुश हो गया। उसने जोगी को आसन दिया ,उसके लिए फलाहार की व्यवस्था की। हर प्रकार से जोगी की सेवा की। इसी तरह जोगी के रूप में रहते हुए स्यूंराजी को को चार माह बीत गए। इस बीच मोतिमा लूलाणी ने स्यूंराजी को गुज्जरहंस लूल की चमत्कारी तलवार ( खंडा ) के बारे में बता दिया ,और यह भी बता दिया कि इस तलवार को हासिल किये बिना तुम गुज्जरहंस को नहीं हरा सकते।

एक दिन गुज्जरहंस और स्यूंराजी के बीच बड़ी अंतरंग बातचीत चल रही थी। स्यूंराजी को गुज्जरहंस के घर के बारे में सब पता चल चूका था। उचित अवसर पर स्यूंराजी गुज्जरहंस को बोले, “आप सयाने हो ,मुझे अपने जीवन का अनुभव बताइये ….. तब गुज्जरहंस लूल बताने लगा ,” मेरे बाइस  बेटे और चौवालीस पोते हैं। मैं जिंदगी भर युद्ध ही करता आया हूँ।  मेरे पास एक चमत्कारी तलवार है। जिसे हाथ में लेते ही दुश्मन का आधा बल मुझमे आ जाता है। मैं बाइस गावों का थोकदार और चौवालीस गावों का प्रधान हूँ। मैं जीवन में कभी नहीं हारा ” दलजीत तलवार का जिक्र आते ही जोगी बोला ,” हे गुज्जरहंस मै ज्यादा अब कुम्भ नजदीक आ रहा है , मैं ज्यादा समय तक तुम्हारे पास नहीं रुक पाउँगा। मन में तुम्हारे चमत्कारी तलवार देखने की बड़ी इच्छा हो रही है। इस पर गुज्जरहंस बोला ,” बेटे कहीं बाहर गए हैं ,चाबी का गुच्छा भी उन्ही के पास है। इस पर मोतिमा चुपके से दोनों की बात सुन रही थी ,उसने तपाक से बोला , ‘पिता जी चाबी का गुच्छा घर पर ही है !” गुज्जरहंस बोला ,”वो तो ठीक है ,लेकिन जिस संदूक में दलजीत तलवार रखी है ,उसके ऊपर कई भरी भरकम संदूक रखें है। तुम और मै उन्हें आसानी से नहीं हटा पाएंगे ! चलो फिर भी कोशिश करते हैं।  ” स्यूंराजी ने बाइस भरी भरकम संदूको को आसानी से हटा दिया …. गुज्जरहंस को शक हो गया ! दलजीत तलवार वाली संदूक खोलते ही ,स्यूंराजी ने जल्दी तलवार उठा ली और गुज्जरहंस का आधा बल स्यूंराजी के पास आ गया।  वो तलवार और मोतिमा को लेकर बाहर चला गया।  और गुज्जरहंस को ललकारते हुए बोला ,” हे गुज्जरहंस मै कुमु चम्पावत से महाराज भारतीचंद का भेजा योद्धा स्यूंराजी सिंह बोरा हूँ। तुमने महाराज को लगान नहीं भेजा ! इसलिए मैं तुमसे युद्ध करके लगान उसूलने आया हूँ। अगर तुम जीवित माँ के बेटे होंगे तो कल मुझसे युद्ध करने आ जाना ! नहीं तो मुई माँ के  बेटों की तरह माल भाबर में पड़े रहना !” गुज्जरहंस हतप्रभ हो गया ! जमीन में गिरकर विलाप करने लगा। ” ये मोतिमा और जोगी ने मुझे ठग लिया !!'” कुछ देर में उसके बेटे और पोते घर आ गए। गुज्जर ने उन्हें सारी घटना बता दी ..गुज्जरहंस के बेटे और पोतों ने स्यूंराजी बोरा को खूब ढूंढा ,लेकिन वो नहीं मिला।

दूसरे दिन  सुबह स्यूंराजी नाह धो कर अपने ईष्ट देवो को याद करके और अपने माता पिता के सत्य धर्म को याद करके विजय के संकल्प के साथ रणभूमि में आ गया। उधर से गुज्जरहंस लूल अपने लावलश्कर के साथ युद्ध भूमि में आ डटा  …….  एकतरफ अकेला दलजीत तलवार थामे स्यूंराजी बोरा और दूसरी तरफ लूलों की फ़ौज ! स्यूंराजी ने लूलों को ललकारते हुए कहा ,’अगर जीवित मा के बेटे हो तो एक एक करके लड़ने आना ! और मुई माँ के बच्चे हो तो सियार के बच्चों की तरह मुझसे लड़ने आना ! पहले फेरे में ही  स्यूंराजी बोरा ने सौ योद्धाओं को मार दिया और सौ को बांध लिया। गुज्जरहंस के बाइस भाई लूलों में से ग्यारह भाई मारे गए। उसके बाद ग्यारह भाई एक साथ मिलकर स्यूंराजी से युद्ध करने लगे ,उसमे से  भी  छह भाई फिर मारे गए ! इसके साथ ही गुज्जरहंस की लूल सेना के पाव उखड गए। लूल सेना भागने लगी ! गुज्जरहंस ने रोकने का बहुत प्रयास किया लेकिन सेना भाग गई ! अकेला गुज्जरहंस और उसके 5 बेटे रह गए। गुज्जरहंस ने स्यूंराजी बोरा को बोला ,”मैं तुम्हे आधे घंटे की मोहलत देता हूँ ,तब तक तुम कुछ खा पी लो …..”

मोतिमा पुरुष वेश धारण करके युद्धभूमि में स्यूंराजी के लिए चिउड़े और खाजे लेकर आई और पानी पिलाया। क्षणिक विश्राम में बाद गुज्जरहंस और स्यूंराजी में भीषण युद्ध शुरू हो गया। स्यूंराजी ने दलजीत तलवार से गुज्जरहंस के सर में वार किया तो वो उसी क्षण स्वर्ग सिधार गया। उसके बाद स्यूंराजी बोरा ने गुज्जरहंस के शेष पुत्रों को भी मार दिया।

गुज्जरहंस की प्रजा ने स्यूंराजी के सामने आकर आत्मसमर्पण कर दिया और उसे अपना राजा मान लिया। मोतिमा स्यूंराजी से कहने लगी , ‘ अब आप भाबर माल के राजा हो और मैं आपकी रानी हूँ। अब चलिए अपने राजमहल में। लूलानी भाबर में लूल की पत्नी ने सुना कि उसका पति और बाइस बेटे और चौवालीस पोते मारे गए है , तो वो विलाप करने लगी  …..तब स्यूंराजी ने उन्हें समझाया , ” जो होना था हो गया ! मैं तुम्हारे बेटे सामान हूँ। मैं तुम्हारा पालन पोषण अपनी माँ की तरह करूँगा ! अब आप विलाप ना करें ”

लूलानी भाबर में स्यूंराजी बोरा सुखपूर्वक राज्य करने लगा।  छः माह बाद उसको घर की याद आने लगी ! वो अपने गांव बोरिकोट में जाना चाहता था , किन्तु मोतिमा ने कहा वो गर्भवती प्रसव के बाद सब लोग जायेंगे गावं।

इधर जिस दिन स्यूंराजी बोरा बोरिकोट से  कुमु- चम्पावत  को गया , भ्यूंराजी की पत्नी गंगा उर्फ़ गंगुली अपने पति से कहने लगी ,” हे स्वामी ! सोमनाथ बमोरी का कौतिक नजदीक आ गया है। हम अपने मायके  कैड़ारो भी जाते हैं और मेला भी देख कर आएंगे। मुझे अपने माँता पिता की बहुत याद आ रही। ” तब भ्यूंराजी बोरा बोला ,” गंगुली मेरा भाई कहकर गया है कि उस मेले में मत जाना ! वहां बाइस भाई जैंत  बड़े अत्याचारी है। ” गंगुली बोली, ” स्वामी जी ! कोई भाई अपने भाई का भला नहीं देख सकता ! वह खुद तो माल -भाबर में मजे कर रहा है   ….और तुम्हे अपने सास ससुर से मिलने के लिए मना कर गया है  ……!! तुम मेरे स्वामी होकर मेरा कहना नहीं मानते। ” गंगुली दुःखी होकर ,पेड़ों की घास काटने जंगल चली गई।वहाँ उदास होकर एक बड़े पत्थर पर बैठ कर बिणई बजाने  लगी।  बिणई का स्वर सुनकर जगती और शगति जैंत भाई उसके नजदीक आये। बैसाख के सूर्य जैसी गर्म ,भादो के भांग जैसी मदहोश कर देने वाली पोष माह के पालक जैसी कमनीय गंगुली के रूप यौवन को देख दोनों भाई जैंत देखते ही रह गए। पास आकर पूछने लगे , ” हे सूंदर नारी तुम कौन हो ? और इस भयानक जंगल में अकेले क्या कर रही हो ? ” तब गंगुली उनके तरफ देख कर, हॅसते हुए बोली ,” मै झुपसिंह बोरा की बहु ,भ्यूंराजी बोरा की पत्नी गंगा हूँ। कैड़ारो में मेरा मायका है। ” तभी तपाक से जैत भाई बोले ,इस रिश्ते से तुम हमारी साली हुई .. …” “हां मैं तुम्हारी साली हुई……और तुम लोग मेरे जीजा हुए ! ” गंगुली मुस्कराते हुए बोली। फिर आगे मायूसी से बोली ,” मेरा पति बकरियों का ग्वाला है। और मेरा देवर चालाक योद्धा है। मै अपने ससुराल में खुश नहीं हूँ….. तब जैंत भाई उसके दिल की बात समझते हुए बोले ,” साली ! तुम हम बाइस भाइयों के दिल की रानी रहोगी ! तुम चैत माह में सोमनाथ के मेले में  हमारी दुकान पर आना वहां हम तुझे अपनी रानी बना लेंगे …….    ( स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा )

शाम हो गई गंगुली और जैंत भाई बातों में रह गए  ……और अपना काम भी नहीं कर पाए , न गंगुली घास काट पाई और न ही जैंत शिकार कर पाए। जैंत भाई गंगुली से सोमनाथ के मेले में आने का वादा लेकर अपने कैड़ारो को चले गए और गंगुली बिना घास लिए घर लौट आई।  घर आकर सास से बहाना बनाते हुए बोली कि जंगल में बाघ आ गया था। जैसे -तैसे छुप छुपाते जान बचाकर आई हूँ। दूसरे दिन सास ने उसे जंगल जाने से मना कर दिया।

गंगुली फिर से अपने पति से सोमनाथ के मेले में जाने का आग्रह करने लगी। माता -पिता के बहुत समझाने के बाद भ्यूंराजी बोरा सोमनाथ के मेले में जाने के लिए तैयार हो गया। आखिर भ्यूंराजी बोरा त्रियाचल में फस गया ! सोमनाथ मेले के लिए गंगुली की डोली  तैयार हो कर चल दी। मायके के निकट पहुंच कर गंगुली ने डोली ले जाने वालों को डोली नीचे उतारने को कहा ,बोली ,” अब सोमनाथ बमोरी नजदीक है ,मुझे लघु शंका जाना है ” गंगुली पेशाब करने के लिए झाड़ियों में घुसी। और बहुत देर इंतजार करने के बाद भी वापस नहीं लौटी, तो  भ्यूंराजी और उसके साथी गंगुली को ढूढ़ने मेले की ओर चले गए। गंगुली ने अपनी योजना पहले ही जैंत भाइयों को बता रखी थी। वो झाड़ियों के अंदर से होकर सोमनाथ के मेले में जैतों  के पास चली गई और उनकी दुकान में जाकर बैठ गई। ( स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा )

उसे ढूढ़ते ढूढ़ते भ्यूंराजी बोरा भी वही चला गया , वो गंगुली से बोला ,” अरे गंगा तुम रास्ता भूलकर यहाँ जैतों की दुकान में कैसे पहुंच गई ? इस पर गंगुली बोली , ” हे भले इंसान तुम कहा के रहने वाले हो ? ऐसा क्यों बोलते हो ? लगता है तुम्हे भरम हो गया है ….एक सूरत एक मूरत के कई लोग होते है। मैं बाइस जैंतों की रूपसी हूँ। ऐसे अनर्थकारी वचन मत निकालो भले इंसान ! मेरे बाइस जैंत अभी तुझे मार डालेंगे। हतप्रभ भ्यूंराजी बोला , ” गंगा तुम्हे सोमनाथ का मसाण लग गया क्या ? तुम पगला गई हो क्या ? ऐसा बोलते ही भ्यूंराजी गंगुली का हाथ पकड़ कर खींचने लगा। इसपर बीच पर जगती और शगति जैंत आ गए ! बोलने लगे ,” अरे भाई हमारी पत्नी के साथ ,बत्तमीजी करने वाले तुम कौन हो ? तुम्हे शर्म नहीं आती क्या ? तब भ्यूंराजी कहने लगा ,” यह मेरी पत्नी गंगा है। शायद रास्ता भटक कर यहाँ आ गई है। तब गंगुली कहने लगी , ” हे जैंतो ! एक परपुरुष तुम्हारी पत्नी को ऐसे शब्द कह रहा है ! तुम इसे  मार कर मिट्टी के अंदर क्यों नहीं दबा देते ??”

भ्यूंराजी और जैंतो के बीच युद्ध शुरू हो  गया एक और भ्यूंराजी और उसके साथी और दूसरी तरफ बाईस भाई जैंत ! दोनों पक्षों में लड़ाई शुरू हो गई। भ्यूंराजी बोरा ने उस भीषण युद्ध में  छह भाई जैंतों को मार डाला ! उसके बाद बचे हुए सोलह भाई एक साथ भ्यूंराजी से चिपट गए ! उन्होंने भ्यूंराजी को मार दिया और गंगुली के कहने पर उसे मिटटी के नीचे दबा दिया। उसके ऊपर सौ -सौ मन के बहुत सारे पत्थर रख दिए। और गंगा उर्फ़ गंगुली जैंतो  की पटरानी बन गई……….

अब क्या हुवा होगा ???   आगे की कहानी दूसरे भाग में ……………………………………………..

नम्र निवेदन – मित्रों यह लोककथा बहुत बड़ी होने के कारण हम इसे एक पोस्ट में ख़त्म नहीं कर पा रहें है।  इसलिए इसके आगे की रोमांचक कहानी हम अपने दूसरे भाग में सुनाएंगे  ….असुविधा के लिए क्षमा प्रार्थी हैं। मित्रों जब तक हम इस लोक कथा का दूसरा भाग संकलित करेंगे ,तब तक आप इस पेज में लगे व्हाट्सअप और फेसबुक बटनों के माध्यम से इसे प्रत्येक उत्तराखंडी के फ़ोन तक  पहुंचा दीजिये। यही हमारा नम्र निवेदन है।

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