स्यूंराजी बोरा और भ्यूरांजी  बोरा
उत्तराखंड की लोककथाएँ

कुमाऊं के वीर स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा की लोककथा भाग – 02

{ मित्रों  इस लोक कथा के पहले भाग में आपने पढ़ा स्यूंराजी बोरा और भ्यूंराजी बोरा का परिचय और स्यूंराजी बोरा ने माल भाबर में बहु मोतिमा लुलानी की मदद से गुज्जरहंस लूल को हराकर ,माल भाबर में अपना कब्ज़ा जमाया। इधर भ्यूंराजी बोरा अपनी पत्नी गंगा उर्फ़ गंगुली की चाल में फसकर जैंत भाइयों के हाथों अपनी जान गवा देते है  ……. }

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अब पढ़े भाग दो ——-

इधर भ्यूंराजी बोरा के प्राण तोते का रूप लेकर माल भाबर अपने भाई स्यूंराजी बोरा के पास पहुंच गए। और वहां जाकर अपने भाई से सपने में बोला,” हे  भाई ! मैं जैंतो के हाथ मारा गया हूँ ! जैंत  हमारे बोरिकोट को लूट कर ले गए हैं। और हमारे माता पिता को बंदी बना कर अपने साथ जैंतिकोट ले गए है। वहां पिता जी उनके गायों के ग्वाला जा रहें हैं। और माँ जैंतों के बच्चों का पालन पोषण कर रही है। तोते द्वारा ये बात बताये जाने के बाद , अचानक स्यूंराजी की नींद  खुल गई ! उसने तोते से कहाँ यदि तुम सत्य हो तो , मेरी गोद में आकर बैठ जाओ।  उसी समय प्राण रुपी तोता स्यूंराजी की गोद में आकर बैठ गया। 

अब स्यूंराजी को अपने घर की याद सताने लगी। वह आसूं बहाकर रोने लगा। मोतिमा ने उठकर उसके रोने का कारण पूछा ,तो स्यूंराजी ने सारी बात बता दी। स्यूंराजी की रात की नींद दिन का चैन उड़ गया। मोतिमा ने उसको समझाया ,” स्वामी स्वप्न की बात सत्य नहीं होती है। आप इतनी चिंता मत कीजिये !”  किन्तु स्यूंराजी की चिंता काम नहीं हुई। वह घर जाने की बात करने लगा। मोतिमा ने अपनी गर्भवती होने का हवाला दिया ,लेकिन वह नहीं माना। मोतिमा को समझा बुझा कर वह बोरिकोट जाने की  तैयारी  करने लगा। मोतिमा ने उसके लिए रस्ते का खाना तैयार किया। स्यूंराजी राजा भारतीचंद की माल भाबर की रकम घोड़ो पर लाद कर ,कुमु -चम्पावत के लिए चल दिया। 

स्यूंराजी के चम्पावत पहुँचने पर राजा भारतीचंद बहुत खुश हुवा। उसने स्यूंराजी के चाचा हरसिंह की पदोनत्ति कर दी। चम्पावत पहुच के उसने उघाई का पाई पाई का हिसाब राजा को सौप दिया। फिर उसने अपने चाचा हर सिंह से अपने घर के हाल समाचार पूछे। तब उसके चाचा ने कहा कि उसके घर में सब ठीक है ,और उससे कहा कि वो कुछ दिन यहीं आराम करे। तोते की योनि में उसके बड़े भाई के प्राण ,कुमु चम्पावत में आ गए और स्यूंराजी के स्वप्न में आकर कहने लगा , ” भाई तू चाचा की बात का विश्वाश मत करना। ये कहते कुछ और हैं ,और इनके मन में कुछ और रहता है। वहां हमारे माता -पिता जैंतों के घर नौकरी कर रहें हैं। स्यूंराजी की आधो रात में नींद  खुल जाती है। वह चिंतित हो जाता है। जैसे -तैसे उसने रात बिताई। सुबह राजा से अनुमति लेकर बोरिकोट के लिए निकल पड़ा। एक दिन का रास्ता तय करने के बाद वो अपने घर पहुँच गया। वहाँ पहुंच कर देखा तो उसके महल रुपी घर के चारों ओर बिच्छू खास और बासिंग के पेड़ उग गए थे। वह महल के भीतर गया ,उसने अन्न और धन की कोठियां देखी सब खाली पड़ी थी। फिर वह नगाड़े वाली कोठी में गया। जैत भाई नगाड़े नहीं उठा पाए। इसलिए उन्हें वहीँ छोड़कर गए थे। स्यूंराजी गुस्से में आकर नगाड़े बजाने लगा। धरती हिलने लगी! बोरिकोट हिलने लगा ! गंगुली  जैंतो से कहने लगी , ” जैतों लगता है तुम्हारे बुरे दिन आ गए हैं। ये जो जिन नगाड़ों की आवाज से जैतिकोट हिल रहा है।  वो नगाड़े निश्चित रूप से मेरा देवर स्यूंराजी बोरा बजा रहा है। क्युकि ऐसा नगाड़ा दूसरा कोई नहीं बजा सकता है। बचपन में उसने एक बार ऐसा ही नगाड़ा बजाय था। बोरिकोट के गाभिन भैसों के गर्भ गिरने लगे थे। मेरे ससुर के कहने पर उन्होंने नगाड़ा बजाना ब्नद किया। आज फिर वो ऐसा ही नगाड़ा बजा रहा है ! इसकी ध्वनि से जैतों की औरतों के गर्भ गिरने लगें हैं। ”

इधर स्यूंराजी बोरा नगाड़ा बजाना बंद कर ,द्वाराहाट के रास्ते जैतीकोट की ओर चल पड़ा। द्वाराहाट में उसे रस्ते में बूढ़ा फदुवा दोरयाल  मिला। अपने समय वीर लड़ाकू फादुवा दोरयाल अभी काफी बूढा हो चूका था। उसने स्यूंराजी बोरा को बताया कि जैतों ने उसके वहां भी काफी लूटपाट की। मेरा अन्न धन लूटकर चले गए। मेरे सात बेटों को मार गए ! स्यूंराजी ने अपने बारे में फदुवा दोरयाल को बताया। उस दिन स्यूंराजी फदुवा का मेहमान रहा। अगले दिन फदुवा ने उसे अपना खंडा ( तलवार देते हुए  वापसी में उसी रस्ते आने का वचन लिया, और विजय का आशीर्वाद दिया। स्यूंराजी बोरा के पास अब दो खांडे (तलवार ) हो गए। सोमनाथ बमोरी पहुंचने पर सबसे पहले उसने सोमनाथ बमोरी देवता को नमन किया। घूमते फिरते वो जैंतो की दुकान पर गया। वहां उसने अपने माता पिता को झाड़ू लगाते हुए देखा। स्यूंराजी नजदीक जाकर पिता जी को गली में ले आया। उसके पिता ने उसे रोते -रोते सारी बातें बता दी।  फिर स्यूंराजी ने उन्हें समझा बुझा कर वापस भेज दिया। और कहा माँ को मत बताना। झुपसिंह के वापस आने के बाद जब जैत भाई उसे धमकाने लगे तब झुप सिंह भी उनसे अकड़ कर बात करने लगा। गंगुली भी समझ गई झुप सिंह के जोर से बोलने के पीछे कुछ तो गड़बड़ है। इतने में स्यूंराजी बोरा आ गया उसने अपने माँ बाप को जैतों के चंगुल से छुड़ा कर साइड में ले गया।  इतने में गंगुली ने जैतों को बता दिया कि यही उसका देवर स्यूंराजी बोरा है।  जैंत भाई युद्ध के लिए तैयार हो गए। जैतों और स्यूंराजी बोरा के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। अगले दिन युद्ध की घोषणा करके दोनों योद्धा अपने अपने खेमों में चले गए  ..! खेमे में स्यूंराजी बोरा ने अपने माता -पिता से लूट पाट  वृतांत सुना।  झुपुलि बौराणी यानि स्यूंराजी जी की मा अपने बेटे से बोली , ” बेटा ! कल हम घर चल देंगे ! यौम अब युद्ध मत करो ! मै एक बेटा पहले ही खो चुकी हूँ ,दूसरा नहीं खोना चाहती हूँ। स्यूंराजी बोरा ने अपने माता पिता को आश्स्वस्त कराया कि वे चिंता ना करें। उसने अपने माता पिता को नहलाया -धुलाया और खाना खिलाकर सुला दिया। उसके बाद वो जैतों के अड्डे की तरफ बढ़ गया। सुबह हो गई थी गंगुली को जैंत भाइयों के बीच बैठा देख स्यूंराजी बोरा का खून  खौल  गया। वापस आकर उसने माता पिता से आज्ञा ली। फिर दुबारा जैंतो के पास जाकर उन्हें युद्ध के लिए ललकारा  …….!

दोनों दलों में घमासान युद्ध हो गया। स्यूंराजी बोरा ने एक ही फेरे में अकेले सौ योद्धा मार दिए। दूसरे फेरे में उसने फिर सो सौ से ज्यादा मार दिए। लड़ते – लड़ते दो दिन हो गए। ग्यारह भाई जैंत एक साथ स्यूंराजी पर चिपट गए। स्यूंराजी ने दोनों हाथों से तलवार चलाते हुए आधे जैतों को ढेर कर दिया। लड़ते -लड़ते  तीन दिन बीत गए। स्यूंराजी बोरा को भूख प्यास लगने लगी। स्यूंराजी ने अपने माता -पिता के सत्य धर्म को पुकारा। फिर उसका पेट भरा सा लगने लगा। उसका बल लौट आया। चौथे दिन तक केवल चार जैंत भाई रह गए। 

ठीक उसी दिन लुलानी भाबर में मोतिमा को बेटा हुवा। पैदा होते ही वह बालक अपने पिता को ढूढ़ने लगा। और अपनी माँ से पिता का पता पूछने लगा। और आखों ही आखों में अपनी माँ से पिता का पता पूछने लगा। मोतिमा उससे कहने लगी –  ” बेटे ! तुमने दूध पीना क्यों छोड़ दिया ?  तेरे पिता बोरिकोट के स्यूंराजी बोरा ,कुमु चम्पावत के राजा की रकम देने चम्पावत गए हैं। बालक संतुष्ट नहीं हुवा। मोतिमा को भी कुछ अजीब सा लगा वो बालक के साथ बोरिकोट के लिए चल पड़ी …..

इधर दोपहर तक स्यूंराजी बोरा ने सारे जैंतों को मार डाला। और अंदर छुपी गंगुली को ढूढ़ कर ,गुस्से से उसकी छाती में एक लात मारी तो ,गंगुली दर्द से कराह उठी ! और एक सूंदर से बालक को जन्म देकर उसके प्राण पखेरू उड़ गए ! स्यूंराजी को माता पिता से ज्ञात हुवा कि जैंतो के घर जाने से पहले से गंगुली गर्भवती थी ! अपने बड़े भाई की आखिरी निशानी को देख स्यूंराजी खुश हो गया। उन्हें वहाँ फदुवा दोरयाल की विधवा बहुवें भी मिल गई  ….! जिन्हे जैंत भाइयों ने बंदी बनाया था। गांगुलि का अंतिम संस्कार करके , जैंतो द्वारा बोरिकोट की लूटी हुई रकम लेकर सभी बोरिकोट को चल दिए  ……!

रस्ते में द्वाराहाट के पास फदुवा दोरयाल मिला। उसे उसकी बहुओं को सकुशल पंहुचा कर स्यूंराजी बोरा आगे बड़ा ! हालाँकि फदुवा दोरयाल ने बच्चे का नामकरण यहीं करने और रुकने का बहुत आग्रह किया। किन्तु दुबारा मिलने का वादा लेकर स्यूंराजी बोरा आगे बढ़ गया …..!!

बोरिकोट के बोरा लोगों ने जब स्यूंराजी बोरा और उसके परिवार के आने की खबर सुनी तो वे खुश होकर  आधे रस्ते में आ गए।  झुपुली बौराणी के लिए बोरिकोट से डोला आ गया। पुरे बोरिकोट में ख़ुशी छा गई। ……

इधर मोतिमा भी अपने बच्चे के साथ बोरिकोट पहुंच गई। मोतिमा को स्यूंराजी बोरा के साथ देख कर झुपसिंह बोरा बोले , ‘ यह औरत कौन है ? ” स्यूंराजी बोरा मंद मंद मुस्कराने लगा। मोतिमा ने सास ससुर को प्रणाम किया।  गंगुली की जगह मोतिमा ने ले ली। दिन बार तय करके दोनों बच्चों का नामकरण किया गया भ्यूरांजी के बेटे का नाम दलजीत बोरा और स्यूंराजी के बेटे का नाम सबरजीत बोरा पड़ा।  माँ का मन माँ का ही होता है ! झुपुलि बौराणी अपने बड़े बेटे को याद करके रोने लगी ! तब स्यूंराजी बोरा ने कहा ,” इजा रो मत दाज्यू की निशानी दलजीत तो हैं ना हमारे पास !”

झुप सिंह बोरा के घर को फिर से खुशहाल देख उनका भाई हर सिंह बोरा फिर से जल भुन गया ! उनको नष्ट करने की नई युक्ति सोचने लगा  ……!! इधर मोतिमा अपनी सास झुपुलि बौराणी के साथ दोनों बालकों का लालन पालन ख़ुशी -ख़ुशी करने लगी। और स्यूंराजी बोरा अपने परिवार और राजा भारतीचंद से आज्ञा लेकर दुबारा माल -भाबर रकम उघाने के लिए चल दिया   ….!

स्यूंराजी बोरा माल भाबर पहुंचा।  वहां लूलों के मामा बाईस भाई झिमोड़े आये थे। जब उनको स्यूंराजी बोरा नामक योद्धा के आने की खबर पता चली तो वे उसे ससम्मान अपने महल में ले गए। स्यूंराजी बोरा ने अपने आने का कारण बताया ,” मैं राजा भारती चंद की ऒर से बची हुई रकम लेने आया हूँ। ” दूसरे दिन झिमोडों ने सारी रकम घोड़े -खच्चरों में लाद के स्यूंराजी बोरा को चम्पावत के लिए सम्मान विदा कर दिया। स्यूंराजी बोरा रकम लेकर  चम्पावत पहुँच गया। राजा बहुत खुश हुवा।  चम्पावत में रहते स्यूंराजी बोरा को पंद्रह दिन बीते थे कि माल भाबर से राजा भारतीचंद के लिए बाईस भाई झिमोडों का पत्र आ गया। उसमे लिखा था ,- ” हे राजा भारतीचंद !!! तुमने अपने योद्धा स्यूंराजी बोरा को भेजकर हमारे जीजा का समूल नाश करवा दिया। अब हम अपने जीजा की मौत का बदला लेने कुमु चम्पवात आ रहे हैं। तुम हमारे जोड़ का योद्धा ढूंढ़ कर रखना। नहीं तो हम तुम्हारे कुमु -चम्पावत का विनाश कर देंगे !!!”

यह सुनकर स्यूंराजी बोरा को कुछ कहना नहीं आया। वह आश्चर्य चकित भाव से राजा से बोला , ‘ हे राजन !! झिमोड़े बड़े सीधे और सरल हैं। नहीं तो तुम्हारी रुकी हुई रकम योहीं नहीं दे देते। यह पत्र जाली है या जरूर कोई दुश्मन बाईस भाई झिमोड़ों को भड़का रहा है। ” इस पर हर सिंह बोला ,” यह पत्र झूठा नहीं हो सकता ! ध्यानिकोट के झिमोड़े भी बड़े योद्धा हैं। उनका वंश भी योद्धाओं के वंश में आता है। स्यूंराजी बोरा बोला , ” हे राजा ! पहले मैं अपने घर बोरिकोट जाता हूँ।  मेरे माता पिता और बच्चे मेरी राह देख रहें होंगे।  जाकर जल्दी वापस आऊंगा।  ” इतना कहकर स्यूंराजी बोरा अपने घर बोरिकोट को चला गया  ………………..

भाग – 2 समाप्त ………….

 निवेदन –

” मित्रों  स्यूंराजी बोरा और भ्यूरांजी  बोरा की लोक कथा यहीं समाप्त होती है।  अब अगले भाग में हम दलजीत बोरा – सबरजीत बोरा और बाईस भाई झिमोडों की कहानी पढ़ेंगे  ………….. 

 

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