राहुल सांकृतायन जी ने अपनी किताब हिमालय परिचय में बद्रीनाथ के स्थानीय निवासी गंगा सिंह दुरियाल के संदर्भ से बद्रीनाथ जी के बारे में एक रोचक लोककथा का वर्णन किया है। बद्रीनाथ जी की इस लोक कथा का संबंध इतिहास से भी जुड़ता है। आभासी रूप से यह लोक कथा सत्य प्रतीत होती है। माणा क्षेत्र के मारछा समुदाय के लोगों का विश्वास है कि पहले बद्रीनाथ जी तिब्बतियों के देवता थे। और बद्रीनाथ से लगभग आठ किलोमीटर दूर थोलिंग मठ में रहते थे। उनका बद्रीनाथ जी को तिब्बती देवता मानने का मुख्य कारण यह था कि बद्रीनाथ जी यहाँ योग मुद्रा में स्थापित हैं , इसलिए बद्रीनाथ जी की मूर्ति थोड़ी -थोड़ी महात्मा बुध की तरह लगती है।
आठवीं शताब्दी से पहले इस क्षेत्र में बौद्ध धर्म का बोलबाला था। आठवीं शताब्दी में हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध संत शंकराचार्य जी ने बद्रीनाथ जी की इस मूर्ति को नारदकुंड से निकाल कर यहाँ स्थापित किया था। तभी बद्रीनाथ धाम में नियमित बद्रीनाथ जी की पूजा अर्चना और दर्शन होते हैं। मान्यताओं के अनुसार यहाँ 6 माह नारद जी पूजा करते हैं और छह माह मानवो के लिए कपाट खुलते हैं।
बद्रीनाथ जी की कहानी –
लोक कथा के अनुसार पहले बद्रीनाथ जी सतलज किनारे थोलिंग मठ में रहते थे। वहां लामा लोग उनकी पूजा अर्चना करते थे। लेकिन लामा लोग मांसाहारी थे। यह बात बद्रीनाथ जी को बुरी लगती थी। वे शुद्ध आचरण वाले थे और मांसाहार से कोसो दूर थे। इसलिए बद्रीनाथ लामा लोगो के साथ परेशान रहते थे। एक दिन जब लामा लोग द्वार बंद करके सो रहे थे ,तब बद्रीनाथ जी ने थोलिंग मठ के ऊपरी भाग में छेद किया और वहां से निकल भागे। बताते हैं थोलिंग मठ के ऊपरी भाग में आज भी वह छेद है।
बद्रीनाथ जी ज्यादा दूर नहीं गए थे कि लामा लोगो को उनके भागने का पता चल गया। लामा लोग भी उनके पीछे पीछे आ गए। बद्रीनाथ भगवान् ने उनको अपने पीछे आते देखा तो छोटा रूप बनाकर पास में चर रही चवर गाय की पूँछ में छुप गए। लामा लोगो ने उन्हें इधर उधर बहुत ढूंढा लेकिन उन्हें बद्रीनाथ का पता नहीं चला। चवर गाय के इस उपकार से खुश होकर बद्रीनाथ ने उसे वरदान दिया कि आज से उसकी पूंछ पवित्र मानी जाएगी और उसकी पूजा होगी। और वास्तव में चवर गाय की पूँछ पहाड़ों में दैवीय कार्यों में प्रयुक्त की जाती है। और इतने पवित्र माने जाते हैं कि देवताओं के ऊपर ढुलाए जाते हैं।
लामाओं के वापस जाने के बाद बद्रीनाथ जी अपने असली रूप में आगे बढे ! लेकिन कुछ दूर जाते ही उन्हें अहसास हुवा कि लामा फिर से उनके पीछे आ रहे हैं तो बद्रीनाथ भगवान ने एक अग्नि रेखा बना दी। लेकिन लामा बिना घबराये आगे बढ़ते गए और आग की रेखा भी लाँघ गए। कहते है इस आग को लांघने में उनके शरीर के बाल जल गए और आज भी उनकी दाढ़ी मूंछ नहीं आती है। लामा लोग उनका पीछा करते जा रहे थे।
संयोग से बद्रीनाथ जी को श्यामकर्ण घोडा मिल गया। और वे उसमे बैठ कर बहुत आगे निकल गए। लामा पीछे ही रह गए। माणा गावं के पास आकर बद्रीनाथ ने वह घोडा छोड़ दिया है। कहते हैं आज भी चट्टान के रूप में उसकी स्मृति माणा गांव में है।
माणा से आगे बढ़ते हुए वे इस भूमि ( बद्रीनाथ ) में आ गए। कहते हैं उस समय इस भूमि के स्वामी भगवान शिव और माता पारवती थे। उनका मंदिर तप्तकुण्ड के ऊपर कहीं था और आसपास अच्छे चावल होते थे। बद्रीनाथ जी को इस सुन्दर भूमी को देखकर लालच आ गया किन्तु वह शिव पारवती की भूमि थी बलपूर्वक नहीं छीन सकते थे ,इसलिए उन्होंने एक चाल चली।
उन्होंने एक नवजात बच्चे का रूप धारण करके करुण स्वर में क्रंदन करना शुरू कर दिया। भगवान् शिव और पारवती सुबह सुबह घूमने निकले सुनसान में बद्रीनाथ जी का ह्रदय विचलित हो गया। शिवजी उन्हें रोक रहे थे लेकिन पार्वती का मातृत्व नहीं माना। वे उस बच्चे को लेकर भवन में आ गई। उसे घर में रखकर खुद तप्तकुण्ड में स्नान करने चली गई।
जब स्नान करके वापस आये तो उन्हें पता चला की उनके भवन के किवाड़ अंदर से बंद है। उन्होंने खूब दरवाजा खटखटाया लेकिन अंदर से दरवाजा नहीं खुला। तब शिवजी बोले ,” देखा मैंने पहले इस बालक को ले जाने के लिए मना किया था ,लेकिन तुम नहीं मानी !”
पारवती ने गुस्से से कहा ,” मैं इस तप्त कुंड में बर्फ डालकर इसका पानी ठंडा कर दूंगी। तब ये शैतान ठण्ड से मर जायेगा। तब शिव ने उन्हें रोका ! कहा , इस कृत्य इसको उतनी परेशानी होगी जितनी यहाँ आने वाले यात्रियों को होगी। तब पार्वती ने वह विचार त्याग दिया। लेकिन उनके मन में बदले की भावना इतनी प्रबल थी की उन्होंने उसे श्राप दिया कि अबसे इस क्षेत्र में चावल की पैदावार बंद हो जाएगी। इसके बाद वे भेष बदल अपना बद्रीपुरी वाला घर छोड़कर नीचे की तरफ आ गए। थोड़ा नीचे आने के बाद उन्होंने देखा कि लोग बद्रीपुरी की तरफ पीठ में सामान लादकर ले जा रहे हैं।
पार्वती ने उन्हें पूछा क्या ले जा रहे हो ? तब लोगो ने बताया कि बदरीपुरी में भगवान् के लिए उनका प्रिय बासमती चावल ले जा रहे हैं। यह जानकर पार्वती और दुखी हुई ! बोली ,” मेरा श्राप व्यर्थ गया। यहाँ तो और बढ़िया चावल आ रहा है। ”
उधर बद्रीपुरी में बद्रीनाथ अब मौज से रहने लगे। बढ़िया भोग लगता ,शृंगार के लिए रत्नजड़ित आभूषण आने लगे। इसके अलावा लोग केसर कस्तूरी और बहुमूल्य चीजें चढाने लगे। कुछ समय बाद बद्रीनाथ जी के माता पिता को भी पता चला कि उनका पुत्र बद्रीपुरी में चैन से रहने लगा है।
उन्होंने सोचा चलो बुढ़ापे में हम भी आराम से पुत्र के पास रहें। यह सोच कर दूर की यात्रा करके वे बद्रीनाथ के पास आये। लेकिन उनके बद्रीनाथ अब बदल गए थे। उनकी पत्नी लक्ष्मी उनके पास आ गई थी। उन्होंने सोचा कि माता पिता सामने रहेंगे तो आजादी में खलल पड़ेगा। इसलिए बद्रीनाथ ने अपने पिता को पांच मील दूर वसुधरा प्रपात पर भेज दिया। और माँ को माणा के सामने माता मूर्ति बनाकर बिठा दिया।
सन्दर्भ –
- श्री राहुल सांकृतायन की पुस्तक हिमालय परिचय भाग प्रथम।
- यशपाल जैन जी की पुस्तक उत्तराखंड के पथ पर।
इन्हे पढ़े _
घंटाकर्ण देवता ,भगवान विष्णु के भांजे और बद्रीनाथ के क्षेत्रपाल।
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