गढ़ कन्या
इतिहास

‘ गढ़ कन्या ‘ उत्तराखंड गढ़वाल की एक वीरांगना नारी की वीर गाथा।

उत्तराखंड में गोरखा शाशन से पहले तक ,हिमालयी क्षेत्रों ( गढ़वाल ,कुमाऊं और हिमाचल ) के राजघरानो के न केवल आपस में वैवाहिक सम्बन्ध थे ,अपितु इन राज्यों ( गढ़वाल ,कुमाऊं और हिमाचल ) में परस्पर एक दूसरे राज्यों से आने वाले सैनिकों को भी अपने राज्य में वरीयता से भर्ती किया जाता था। दूसरे राज्यों से आने वाले सैनिक और सेनानायक अपने आश्रयदाता राजाओं के प्रति निष्ठावान रहते थे और राज्य के स्थानीय सेनानायको की दलबंदी और षणयंत्रों से मुक्त रहते थे। कुमाऊं का नरशाही मंगल हत्याकांड में मारे गए नगरकोटिये सैनिक हिमाचल प्रदेश के थे। गढ़वाल में खंडूरी कठैत और नगरकोटिये कुमाऊं गढ़वाल की सेना में महत्वपूर्ण  पदों पर रहें। प्रस्तुत लेख में एक ऐसी ही वीर गढ़ कन्या की ऐतिहासिक वीर गाथा प्रस्तुत कर रहे हैं।

सन 1804 में खुड़बुड़ा के युद्ध में तत्कालीन राजा प्रद्युम्नशाह की वीरगति को प्राप्त करते ही समस्त गढ़वाल गोरखों के आधीन हो गया। गोरखों ने गढ़वाल जीतने के बाद  हिमांचल के कांगड़ा पर विजय पाने की दृष्टि से उनकी ओर प्रस्थान किया। तब कांगड़ा के तत्कालीन शासक राजा संसारचंद के गढ़वाली सेनानायक कीर्तिसिंह के नेतृत्व में कांगड़ा की राजधानी तीरा में कांगड़ी और गोर्ख्याली सेना का भीषण युद्ध हुवा। इस युद्ध में कांगड़ा का सेनापति कीर्ति सिंह वीरगति को प्राप्त हुवा।

कहते हैं जब विजय की ख़ुशी में मगन गोर्ख्याली सेनानायक नैन सिंह हाथी में बैठकर नगर में प्रवेश करके दरबार के द्वार पर पंहुचा ,तो उसके नजदीक के दो मंजिल भवन से सनसनाती हुई बंदूक की एक गोली उसकी छाती पर आकर लगी। नैन सिंह अचेत होकर हाथी से नीचे गिर गया। इस घटना के साथ गोर्ख्याली सेना में भगदड़ मच गई। उप सेनानायक दलबंशाह अचानक हुए इस हमले में सचेत होकर सैनिको को रोकने का प्रयास कर ही रहा था कि, इतने में एक सनसनाती हुई गोली उसकी दाहिनी कमर में आकर लगी और वो भी मूर्छित हो गया। इन घातक गोलियों के श्रोत का पता लगाने के लिए जब सैनिक उस दो मंजिला घर में घुसे तो वहाँ बंदूक थामे एक कोमलांगी युवती चंडिका रूप में खड़ी थी। अब वे उस युवती को पकड़ने के लिए आगे बड़े ही थे कि उसने गोलियों की बौछार कर दी ,लगभग 10 -15 सैनिको को मृत्यु निद्रा में सुला दिया।  लेकिन अकेली युवती और उसके सामने पूरी गोर्ख्याली सेना। आखिर उस युवती को बंदी बना लिया।

सांकेतिक चित्र ,गूगल के सहयोग से

छाती पर गोली लगने से बिहोश हुए नैन सिंह को जैसे ही होश आया ,उसे गोली चलाने वाली वीरांगना के बंदी बनाने का समाचार मिला तो ,उसने उस युवती को अपने सामने उपस्थित करने का आदेश दिया। आज्ञानुसार उस वीरांगना को उसके सम्मुख पेश किया गया। कहते हैं कि उस समय उस वीरांगना के चेहरे से अप्रतिम शौर्य और प्रतिहिंसा का भाव टपक रहा था। जब उस वीरांगना से उसका परिचय और अकारण गोली चलाने के बारे में पूछा ,तब उसने बड़े गर्व से उत्तर दिया ,’वह सुजानपुर तीरा के युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले गढ़वाली सेनानायक कीर्तिसिंह की पत्नी है। एक वीर सेनानायक की अर्धांगनी होने के नाते मुझे अपने पति के हत्यारों पर वार करने का धर्मसंगत अधिकार है। उसी अधिकार के अंतर्गत मैंने अपने पति के हत्यारों पर गोली चलाई। मैंने वही किया जो एक वीरांगना को करना चाहिए। मुझे संतोष है कि मैंने अपने पति के हत्यारों को हमला करके घायल किया। आप मुझे जो भी दंड देंगे वो मुझे स्वीकार्य है।

इस आघात से क्रुद्ध दलबमशाह उस युवती को तुरंत प्राणदंड देने के पक्ष में था। किन्तु नैन सिंह के ह्रदय में उसके वीरतापूर्ण कार्य ने सम्मान जाग्रत कर दिया। नैन सिंह ने उस वीरांगना से कहा कि , तुमने हम पर गोली चलाकर अपने पतिव्रत धर्म का पालन किया। मै चाहता हूँ कि ,नेपाल सरकार ऐसी वीरांगनाओं को सम्मानित करे और उन्हें प्रसस्ति पत्र के साथ आजीवन भत्ता देने की व्यवस्था करे। किन्तु वीरांगना गढ़ कन्या ने नैन सिंह की इस उदारता का सम्मान करते हुए ,उसके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। और कहा ,’मेरे पति स्वर्ग में मेरा इंतजार कर रहे होंगे ! मै उनके शव के साथ सती होकर जल्द से जल्द अपने पति के पास पहुंचना चाहती हूँ। यदि आप मुझपर इतने कृपालु हैं तो जल्द से जल्द मेरे पति का शव ढुँढ़वा दीजिये।

उस वीर गढ़ कन्या के दृढ़ संकल्प को देखकर ,नैनसिंह ने युद्धस्थल से कीर्तिसिंह के शव को ढुँढ़वा कर ,उस वीरांगना को सौप कर ,अपने सैनिको को आदेश दिया कि सेनानायक कीर्तिसिंह का दाह संस्कार पूरे राजकीय सम्मान से किया जाय। और उस वीरांगना को सती होते समय ,आपेक्षित दान दक्षिणा और सती  होने के लिए जरुरी सामान उपलब्ध कराया जाय। अगले दिन वह वीर गढ़ कन्या अपने पति की चिता में आरोहण करके स्वर्ग सिधार गई। इसके 15 दिन बाद  घायल गोर्ख्याली सेनानायक नैन सिंह की जीवनलीला  भी समाप्त हो गई।

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नोट – इस ऐतिहासिक गाथा का सन्दर्भ  प्रो DD शर्मा जी की ,उत्तराखंड ज्ञानकोष पुस्तक से लिया गया है।