Wednesday, April 2, 2025
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उत्तराखंड परीक्षा घोटाले, पर उत्तराखंड में राजनीतिक समर्थकों की स्थिति

“उत्तराखंड परीक्षा घोटाले पे उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति पर खंतोली जी का यह व्यंग एकदम सटीक बैठता है।”
बहुत बडा कलेजा चाहिये साहब चमचा होने के लिए, न सिर्फ कलेजा वरन चमचा बनने के लिए ये कला भी आनी चाहिये कि किस तरह अपने नेताजी के ऐबों को गुणो में तब्दील किया जाय। अपनी अन्तरात्मा को गिरवी रखना पडता है। हालाकि बेचा भी जा सकता है पर वर्तमान हालात में ये काम रिस्की हो जाता है कि कब नेताजी उसी पार्टी में चले जाये जिसको अब तक थोक के भाव गरिया चुके हों।  इसलिए पार्टी बदलने की स्थिति में अन्तरात्मा को गिरवी से छुडवाकर दूसरी जगह गिरवी रखा जा सके।

इस बीच आपको एक नया शब्द सुनने को मिलता होगा – भक्त, अब आपको लगेगा ये क्या है?  मैं बताता हूं भक्त चमचे का अपडेट वर्जन है या यूं कहिये चमचा ही है। जिस प्रकार चमचा अपने कढाई मतलब मालिक के बारे में कुछ नही सुन सकता उसी प्रकार भक्त अपने मालिक के बारे में।  असल में चमचा और भक्त आपस में भाई हैं। इनका काम होता है अपने मालिक का प्रचार करना , कही उसकी बात हो रही हो तो कान लगाकर सुनना और बीच में घुसकर अपना फेसबुकिया ह्वट्सऐपिया ग्यान देकर अपने मालिक के तेज का बखान करना , कोई बात काटे तो जोर जोर से भौककर मेरा मतलब बोलकर भीड को प्रभावित करने का असफल प्रयास करना।

आप चमचों को हल्के में न ले, ये इनका ही हुनर है कि नालायक को लायक और महामूर्ख को महिमामण्डित कर देते हैं। अपने मालिक के असफल काम को भी सफल साबित करने में लगे रहते हैं। इस देश का कुछ नही हो सकता इनका तकिया कलाम होता है।

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इनकी एक विशेषता और होती है ये अपने मालिक से ज्यादा अपने मालिक के विरोधी को ज्यादा फालो करते हैं। मालिक के विरोधी के सोशल एकाउन्ट पर जाकर प्रश्न करते हैं अपना विरोध दर्ज कराते है . हर जगह इनको टैग करते हैं। हालांकि वह एकाउन्ट ठेके पर संचालित होता है।

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चमचों पर अथाह ग्यान का भंडार होता है जबकि ये पढे लिखे नही होते। अगर होते तो चमचागिरी न कर रहे होते। इन्हे सूरीनाम और युगान्डा तक की अर्थव्यवस्था की भी जानकारी होती है।  चन्द्रयान से लेकर चाईनीज खिलौने तक की तकनीक की जानकारी होती है।

रेल बजट हो या तेल बजट, सब पर इनकी राय अहम होती है। ये पाकिस्तान मामलो के जानकार भी होते हैं। खुद इनकी घरवाली तक इनकी न सुनती हो।  ये आई ए एस तक को सलाह सोशल मीडिया के मार्फत पेल आते हैं।

चमचों के जीवन की एक विडम्बना भी है, ये जीवन भर चमचागिरी ही करते रह जाते हैं  लाभ पा जाते है इनके आराध्य देवो के रिश्तेदार। इनका जीवन निस्वार्थ सेवा में ही कट जाता है या यूं कहिये फट जाता है। जिस प्रकार एक शराबी को शराब के रेट बढने पर कोई मलाल नही रहता उसी प्रकार चमचों को भी इस बात से मलाल नही होता कि मलाई कोई और खा रहा है | ये दोगुने जोश से अपने काम में लग जाते हैं।

कभी सोचता हूं काश चमचे भी जागरूप हो पाते सभी दलों के चमचे एक अखिल भारतीय चमचा संगठन (अपार्टी) बनाते , अपने अधिकारो के लिए लडते, सरकार से सर्वश्रेष्ठ चमचे का कडछी पुरस्कार की माग करते। समीक्षा अधिकारी न सही चपरासी का पद सिर्फ अप्लिकेशन देकर पा जाते।

जो भी हो निस्वार्थ सेवा की मिसाल इस प्राणी को  चरण पादुका तल की गहराईयो से नमन।

लेखक – विनोदपन्त खन्तोली।
लेखक परिचय- 
यह लेख श्री विनोद पंत खंतोली जी के फेसबुक वाल से साभार लिया गया है। श्री विनोद पंत खंतोली कुमाउनी भाषाविद और कुमाउनी कवि और प्रसिद्ध व्यंगकार हैं। उत्तराखंड परीक्षा घोटाले पे उत्तराखंड की स्थिति पर  खंतोली जी का यह व्यंग एकदम सटीक बैठता है।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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