Saturday, March 2, 2024
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उत्तराखंड का नामकरण के पीछे पौराणिक कहानी

हिमालय की गोद में बसा प्राकृतिक प्रदेश उत्तराखंड का गठन  09  नवंबर 2000 को उत्तराँचल नाम से हुवा किन्तु  दिसम्बर 2006  को इसका पुनः नाम उत्तराखंड कर दिया गया। पौराणिक ग्रंथो में केदारखंड ,मानसखंड और हिमवंत के नाम से प्रसिद्ध इस भू भाग को उत्तराखंड नाम महाभारत काल में मिला। उत्तराखंड के नाम के पीछे ये महाभारतकालीन घटना को  बताया जाता है।

तदनुसार  महाभारत काल में उत्तराखंड के भू भाग में ,राजा विराट राज्य करते थे ,उनकी राजधानी कत्यूरकालीन बैराठ ( गेवाड़ ) थी। महाभारत की कथानुसार हम सबको विदित है कि ,पांच पांडवो और उनकी भार्या द्रौपदी ने ,महाराज विराट के राज्य में रहकर अपना अज्ञातवास पूरा किया था। अज्ञातवास पूर्ण होने के बाद जब पांडव अपने असली रूप में राजा विराट के सम्मुख आये तो सा,राजा ने उनके आदर सत्कार के साथ ,अर्जुन के साथ अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह का प्रस्ताव रखा। किन्तु अर्जुन ने कहा कि अज्ञात वास में बृहनलला के रूप में उत्तरा का संगीत शिक्षक होने के कारन ,वे और उतरा गुरु शिष्या के पवित्र बंधन में बध गए हैं। उत्तरा उनके लिए अब पुत्री सामान है ,और वे उससे विवाह नहीं कर सकते हैं। किन्तु राजा विराट के स्नेह और आग्रह को देखते हुए ,पुत्रवधु रूप में जरूर स्वीकार कर सकते हैं।  ( उत्तराखंड का नाम )

उनके इस सुझाव पर राजा विराट ने अपनी पुत्री उत्तरा का विवाह ,अर्जुन के पुत्र  अभिमन्यु ने कर दिया। और राजा विराट ने हिमालय का यह राज्य अपनी पुत्री उतरा को यौतुक ( दहेज़ ) में दे दिया। इस राज्य या क्षेत्र को उत्तरा का स्त्रीधन माने जाने के कारण इसका नाम उत्तराखंड ( अर्थात उत्तरा का दायभाग ) कहा जाने लगा।

उत्तराखंड का अर्थ कई लोग उत्तर का भाग समझते हैं।  लेकिन यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस राज्य का नाम उत्तरखंड न होकर उत्तराखंड है। अतः उत्तराखंड का अर्थ  उत्तरा का खडं ( उत्तरा का स्त्रीधन या दायभाग ) तार्किक लगता है।

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संदर्भ- प्रो DD शर्मा उत्तराखंड ज्ञान कोष

 

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
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