Wednesday, June 19, 2024
Homeसंस्कृतिकुमाऊनी महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान "नाखक टुकम बे लंबा पिठ्या"कुमाऊनी रोली टीका!

कुमाऊनी महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान “नाखक टुकम बे लंबा पिठ्या”कुमाऊनी रोली टीका!

बचपन में हमारी अम्मा (दादी जी) जाड़ों में हल्दी ,सुहागा,आदि के मिश्रण से घर का पिठ्या रोली तिलक बनाती थी। फिर घर के शुभ कार्यों में वहीं तिलक प्रयोग में लाया जाता था। ब्राह्मण ज्यू आते थे, पाठ मंत्रोच्चार के साथ सभी को तिलक करते थे। और घर कि महिलाओं को नाख से माथे तक एक लंबा पिठ्या रोली तिलक लगाते थे।

पहले हमारी समझ मे नही आता कि इनको, इतना लंबा तिलक क्यों ?बाद में जब रोजी रोटी के लिए परदेश गए, तब देखा,वहां की महिलाएं तो छोटा सा तिलक लगा रही। तब मेरी  समझ में आया कि कुमाउनी महिलायें ही लंबा तिलक ,जिसको नाखः टुकम बे पिठ्या बोलते हैं, वो हमारी सांस्कृतिक पहचान है। जैसे रंगीन  कुमाऊनी पिछोड़ा हमारी यूनिक पहचान हैं , वैसे ही हमारी मातृशक्ति का लंबा तिलक हमारी शान है।

मगर हमारी यह अब हमारी यह सांस्कृतिक पहचान विलुप्ति की ओर अग्रसर है। आधुनिक पीढ़ी की माताएं बहिने,अपने घर मे नही परदेस में रहती हैं, तो वहाँ के परिवेश के अनुसार उनको हमारा पारम्परिक तिलक ,लंबा पिठ्या लगाने में शर्म आती है।

और जो बहिने गांव में हैं वो भी लंबा पिठ्या नही लगाती। कारण एक ही है, आधुनिक चका चौध की अधूरी समझ।

Best Taxi Services in haldwani

“आजकल तो यही चलता है, “जा चेला दुकानम बैटी 5 रुपे टिका पूड़ी ले आ, और प्लेट में घोई ,शीश मे देखि गोल टिकक लगे ली”

मगर यह परम्परा विलुप्ति की कगार पर जरूर है,मगर कुछ क्षेत्रों की माताएं बहिने, इसे अभी भी जीवंत किये हुए है। कुमाऊं के कुछ क्षेत्रों में ,विवाह आदि शुभ अवसरों पर ,महिलाएं नाखम बे पिठ्या लगाई हुई मिल जाती हैं।

2 महीने पहले कि बात है, जब मगशीष के व्याह लग्न चल रहे थे। एक भूली है, मेरी मित्रता सूची में जो बचपन से दिल्ली रहती है। उसकी शादी भी थी ,उसकी शादी की दुल्हन के रूप में फ़ोटो देख कर मैं चौक गया! पहाड़ी पिछोड़े में,सिर पर राधा कृष्ण वाला मुकुट, नाख में टिहरी की चन्द्रहार नाथ, और सबसे विशेष नाखः टुकम बे पिठ्या! सच्ची उजई जयूनी जैसी लग रही थी भूली हमारी।

कहने का मतलब ये है कि कई लोग बाहर रहते हुए भी अपनी सांस्कृतिक जड़ो से जुड़े हैं। और इन्ही लोगो के कारण ये परम्पराएं बची हुई हैं। ये जो हमारा कुमाउनी परिधान है, यह एक यूनिक परिधान है, इसके साथ नाखः टुकम पे पिठ्या,का कॉम्बिनेशन है, इसमे हमारी बहिनो का सौंदर्य अलग ही तेजपूर्ण हो जाता है।

इसे भी पढ़ेशुभकामनाएं कुमाऊनी और गढवाली में l Best wishes in Kumaoni and Gadwali

 

पिठ्या
फ़ोटो साभार -प्रिंटसेट

कुमाऊँ की महिलाएं क्यों लगाती हैं, लंबा पिठ्या रोली तिलक –

अब आप को तो पता ही होगा, पहले की पीढ़ी इस परंपरा को निभाती आई है,लेकिन आधुनिक पीढ़ी की रुचि केवल कुमाउनी क्लचर को, सोशल मीडिया में लाइक पाने का जरिया बना रही हैं। वास्तविक जीवन मे इसका प्रयोग कम ही रह गया है।

किशोरावस्था मे मैंने पंडित ज्यूँ से उत्सुकतावश पूछ ही लिया, पाने ज्यूँ आमा और ईजा ,काखी को नाखम बे पिठ्या क्यों लगाते हो ? तो पंडित ज्यूँ ने मुझे निम्न बिन्दुओं के माध्यम से इसका महत्व समझाया।

नाखम बे टीका लगाने से महिला के सुहाग स्वस्थ ,तंदुरुस्त ,ओजपूर्ण एवं दिर्घायु होता है। और लंबा पिठ्या रोली तिलक केवल सुहागिन महिलाएं ही लगाती हैं। नाखे टुकम बे टीका लगाने वाली महिलाएं, सकारत्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहती हैं। आस पास सभी पर सकारात्मक प्रभाव डालती हैं। पारम्परिक टीका लगाने वाली, सुन्दर लगती है।

यहां भी देखें  –उत्तराखंड के लोकल उत्पादों का पहला ऑनलाइन पोर्टल

उत्तराखंड में गर्मियों में घूमने लायक कुछ खास स्थान

कुमाऊनी कहावत द्वाराहाट के बैल भी चालाक होते हैं पर आधारित लोककथा।

छमना पातर – उत्तराखंड के इतिहास की वो नृत्यांगना जिसने कई राज्य तबाह किए।

फ़ोटो – भास्कर भौर्याल और अनिकेत ,

Follow us on Google News Follow us on WhatsApp Channel
Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी देवभूमि दर्शन के संस्थापक और लेखक हैं। बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड के निवासी है । इनको उत्तराखंड की कला संस्कृति, भाषा,पर्यटन स्थल ,मंदिरों और लोककथाओं एवं स्वरोजगार के बारे में लिखना पसंद है।
RELATED ARTICLES
spot_img
Amazon

Most Popular

Recent Comments