Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

पहाड़ में अक्टूबर नवंबर में पक कर अंदर से एकदम काले रंग के स्वादिष्ठ मेहल या मेलू सबने देखे है ,और इनका स्वाद भी लिया है। नाशपाती परिवार के इस फल को जंगली हिमालयी  नाशपाती कहते है। मेहल या मेलू को पाइरस पशिया भी कहते हैं। Rosaceae परिवार का यह पेड़ छोटे से मध्यम ऊंचाई का पर्णपाती पेड़ होता है। मेहल के बारीक़ दांतेदार अंडे के आकर के पत्ते और लाल किनारी वाले आकर्षक फूल लगते हैं। इसमें वर्ष में एक बार फल लगते हैं। इस पौधे का मूलस्थान दक्षिण एशिया माना जाता है। https://youtube.com/shorts/KVfBX9ilGBY?si=nVQTokGPTjtwKs0m पाइरस पशिया सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र…

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दीपावली के तीसरे पर्व भाई दूज के शुभावसर पर केदरनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए जायेंगे। केदारनाथ के कपाट भाई दूज की सुबह 8 बजे बंद कर दिए जायेंगे। भाईदूज दीपावली पर्व शृंखला का आखिरी त्यौहार होता है । तथा दीपावली के उपरांत ठंड भी बढ़ जाती है।  और  हिमालय क्षेत्र में  निवास करना  मुश्किल हो जाता  है। इसलिए, भाई दूज पर केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। ज्योतिर्लिंग को समाधि रूप देते हुए भस्म  से ढक देंगे । इस अवसर पर बाबा केदार की पंचमुखी भोग मूर्ति का श्रृंगार करके  चल विग्रह…

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कमलेश्वर महादेव मंदिर नामक भगवान शिव का अतिप्रसिद्ध पौराणिक मंदिर, गढ़वाल की प्राचीन राजधानी श्रीनगर में स्थित है। आबादी से लगभग एक किलोमीटर दूर पक्षिम में रोड और अलकनंदा नदी के बाएं तट पर स्थित है। केदारखंड के अनुसार यह मंदिर हिमालय के पांच प्रमुख महेश्वर पीठों में से एक पीठ है। माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने करवाया था। 1960 ई में इस मंदिर का पूर्निर्माण बिड़ला परिवार ने करवाया था। कमलेश्वर महादेव मंदिर उत्तराखंड में भगवान् शिव के अलावा ,गणेश और आदि गुरु शंकराचार्य जी की मूर्तियां स्थापित हैं। कमलेश्वर मंदिर का…

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हमारे उत्तराखंड का प्राकृतिक सौंदर्य की बानगी तो सर्वविदित तो है ही है, तभी तो प्रसिद्ध लेखक रस्किन बॉन्ड जैसे विदेशी लोग मंसूरी जैसी जगहों पर अपना बसेरा खुद की ही जन्मभूमि को छोड़कर बनाते हैं। इसी तरह हमारे लिए एक गौरव का विषय है कि, देशी-विदेशी पर्यटक यहां आकर के हमारी संस्कृति के कायल हो जाते हैं और हमारे धर्म को स्वीकार कर लेते हैं और हिन्दुत्व को अंगीकार कर लेते हैं । जैसे हमारे जागर सम्राट श्री प्रीतम भरतवाण की सिनसिनाइटी अमेरिका में जहां वे विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर काम करते हैं। और विदेशी अमेरिकन फ्यूलीदास ने…

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आजकल यूट्यूब के जमाने में एक से बढ़कर एक कुमाउनी, गढ़वाली गीत रिलीज हो रहे हैं। इंटरनेट की आसान उपलब्धता के कारण, गीत संगीत मनोरंजन आसान हो गया है। यूट्यूब पर पहाड़ से जुड़े गीत और अन्य प्रकार की मनोरंजक सामग्री की एक भीड़ सी हो गई है। इस भीड़ में कुछ लोग हैं ,जो पहाड़ के असली लोकगीतों और पहाड़ की संस्कृति को उसके वास्तविक रूप में दिखा रहे हैं। उनमे से एक है टीम घुगुती जागर ! बहुत कम समय में टीम घुगुती जागर ने अपने पहाड़ की संस्कृति से जुड़े लोकगीतों और अपने मृदु व्यवहार से लोगों…

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2022  में चार धाम कपाट खुलते ही चारधाम यात्रा पुरे हर्षोउल्लास और उत्साह के साथ शुरू हो गई थी। कोरोना महामारी के बाद ,दो साल बाद  इस साल 2022  में चार धाम यात्रा निर्विघ्न रूप से शुरू  हुई। इस साल  लोगों में चार धाम यात्रा का ऐसा उत्साह जगा कि केदारनाथ धाम के कपाट खुलते ही बीस हजार से अधिक यात्री दर्शन के लिए पहुंच गए। सरकार के इंतजाम भी कम पड़ गए थे। बाद में भीड़ देखते हुए सरकार ने प्रतिदिन दर्शन करने वाले यात्रियों की संख्या नियंत्रित की। उत्तराखंड में चारधाम यात्रा आजकल अपने चरमोत्कर्ष पर है। अब…

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भंडारी गोलू- ग्वेल ज्यू का ये मंदिर बागेश्वर के कांडापड़ाव से लगभग सात किलोमीटर दूर पिथौरागढ़  के सीमांत गांव ढलौनासेरा में स्थित है। यहाँ ग्वेलज्यू को न्यायकारी देवता के रूप में पूजा जाता है। इस पर एक पौराणिक लोकगाथा भी है जो इस प्रकार है। ढलौनासेरा गांव में पहले भंडारी जाती के लोग रहते थे। ढलौनासेरा की  जमीन काफी उपजाउ थी।  वहां उन्नत किस्म के धानों का उत्पादन होता था। अभी भी पहाड़ में सेरा वाली जो भी भूमि काफी उपजाऊ और धानों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध होती है। कहते हैं वहां अधिक उपजाऊ जमीन होने के कारण भंडारी…

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02 अक्टूबर को समस्त देश बापू व् लाल बाहदुर शास्त्री जी की जयंती मनाता है। किन्तु उत्तराखंड इसे काला दिवस के रूप में मनाता है। 02 अक्टूबर 1994 का दिन उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों के लिए काला दिवस साबित हुवा। क्योंकि 1 अक्टूबर 1994 की रात अलग उत्तराखंड की मांग के लिए दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर मुजफ्फर नगर के रामपुर तिराहे पर तत्कालीन प्रशाशन ने गोलियाँ चलाई और कई आंदोलनकारी शहीद हो गए। और तत्कालीन उत्तर प्रदेश की पोलिस पर उत्तराखंड की महिला आंदोलनकारियों के साथ दुराचार के आरोप भी लगे। इस कांड पर आज भी उन पीड़ितों को इंसाफ…

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उत्तराखंड के वासियों की औलोकिक आस्था एवं विश्वास के अनुसार, जब किसी व्यक्ति के अस्वस्थ होने पर, औषधीय उपचारों से कोई लाभ नहीं होता है, तब उसके परिजनों का यह विश्वाश रहता है कि, उसपर किसी ऊपरी छाया या स्थानीय भूत प्रेत का असर हो गया है। या उनके कुलदेवता, लोकदेवता, ग्रामदेवता रुष्ट हो गए हैं। ऐसी आशंका के चलते संभवित देवी देवता या स्थानीय भूत -प्रेत के नाम पर एक कटोरे या हरे पत्ते में थोड़े से चावल और एक रुपया या कुछ पैसे रखकर, उसे प्रभावित व्यक्ति के ऊपर इस वचनबद्धत्ता के साथ घुमाया जाता है, कि वह…

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बीते 23 सितम्बर 2022 को एक कुमाउनी फिल्म माटी पछ्याण ,उत्तराखंड के लगभग सभी सिनेमाघरों में रिलीज की गई। पहाड़ की जन समस्याओं पर बनी इस फिल्म के निर्माता फराज शेर हैं।  और इस फिल्म के निर्देशक अजय बेरी जी हैं। उत्तराखंड के दर्शकों को यह फिल्म कितना पसंद आती है इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा।  युवा लेखक और सामाजिक कार्यों में समर्पित  शंकर भंडारी जी लेखनी के माध्यम से जानिए यह फिल्म कैसी है ? और आपको देखनी चाहिए या नहीं ? कुमाउनी फिल्म माटी पछ्याण का रिव्यू फिल्म “माटी पहचान” (माटी पछ्याण) कुमाऊ की पहली ऐसी…

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