चंद्रशेखर लोहुमी उत्तराखंड के लोक वैज्ञानिक : उत्तराखंड की धरती ने समय-समय पर ऐसी महान विभूतियों को जन्म दिया है, जिनकी प्रतिभा और योगदान ने देश-दुनिया को चौंकाया। ऐसी ही एक असाधारण शख्सियत थे चंद्रशेखर लोहुमी, जिन्हें “लोक-वैज्ञानिक” के नाम से जाना गया। उनकी खोज और मेहनत से प्रभावित होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने उन्हें अपने आवास पर बुलाकर सम्मानित किया था।
दिलचस्प बात यह है कि उत्तराखंड में आज भी बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं, जबकि पंजाब बोर्ड की कक्षा 12 की अंग्रेजी पाठ्यपुस्तक में उनके जीवन और कार्य पर पूरा अध्याय शामिल किया गया है।
अल्मोड़ा जिले के ताकुला क्षेत्र स्थित पंत गांव (बीना) में वर्ष 1904 में जन्मे चंद्रशेखर लोहुमी एक साधारण किसान परिवार से थे। उनके पिता का नाम बचीराम लोहनी था। आर्थिक परिस्थितियों के कारण वे केवल सातवीं कक्षा तक ही शिक्षा प्राप्त कर सके, लेकिन अपनी जिज्ञासा, अवलोकन क्षमता और मेहनत के बल पर उन्होंने वह कर दिखाया जो उस दौर के बड़े वैज्ञानिकों के लिए भी चुनौती बना हुआ था।
पेशे से शिक्षक रहे लोहुमी जी ने वर्ष 1967 में लैंटाना (जिसे कुमाऊं में “कुरी” कहा जाता है) नामक झाड़ी को नष्ट करने वाले एक विशेष कीट की खोज की। लैंटाना एक विदेशी झाड़ी थी, जिसे अंग्रेज मैक्सिको से भारत लाए थे। धीरे-धीरे यह उत्तराखंड के भाबर और पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से फैल गई और हजारों एकड़ कृषि भूमि को बंजर बना दिया।
लोहुमी जी की इस खोज की शुरुआत एक ग्रामीण सूचना से हुई। किसी व्यक्ति ने उन्हें बताया कि कुछ स्थानों पर लैंटाना की झाड़ियां अपने आप पीली पड़ रही हैं। यह बात सुनकर उन्होंने मौके पर जाकर निरीक्षण किया और लंबे प्रयासों के बाद उन झाड़ियों पर छोटे-छोटे कीटों को देखा। उन्होंने उन कीटों को इकट्ठा कर स्वस्थ लैंटाना झाड़ियों पर छोड़ा, जिसके बाद वे झाड़ियां भी नष्ट होने लगीं। इसके बाद उन्होंने इस प्रयोग को कई स्थानों पर दोहराया।
चंद्रशेखर लोहुमी ने लगभग चार वर्षों तक इस कीट पर लगातार शोध किया। उन्होंने इसका परीक्षण 24 प्रकार के अनाज, 6 प्रकार के फूलों, 18 फलों, 23 सब्जियों, 24 झाड़ियों, 37 वन वृक्षों और 25 जलीय पौधों पर किया। अपने अध्ययन के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह कीट केवल लैंटाना को ही नुकसान पहुंचाता है और अन्य किसी पौधे या फसल को प्रभावित नहीं करता।
उन्होंने इस कीट के जीवनचक्र का भी विस्तार से अध्ययन किया। उनका कहना था कि इस कीट का जीवनकाल लगभग 20 दिन का होता है। उन्होंने इसके जन्म से मृत्यु तक की हर गतिविधि और व्यवहार को बारीकी से दर्ज किया। उनकी यह खोज बाद में देश-विदेश के कीट वैज्ञानिकों और वनस्पति विशेषज्ञों द्वारा स्वीकार की गई।
जब उनकी इस उपलब्धि पर अमेरिका की प्रसिद्ध टाइम्स मैगज़ीन में लेख प्रकाशित हुआ, तो पूरे देश में चर्चा होने लगी कि एक गांव के साधारण शिक्षक ने सीमित संसाधनों और विज्ञान की औपचारिक शिक्षा के बिना इतना बड़ा जैविक शोध कैसे कर दिखाया।
उनके इस योगदान को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने उन्हें उस समय 15,000 रुपये के पुरस्कार से सम्मानित किया। इसके बाद वर्ष 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi ने उन्हें अपने आवास पर आमंत्रित किया। इस दौरान उनके साथ ICAR के कीट विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एन. सी. पंत भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके कार्य से प्रभावित होकर उन्हें 5,000 रुपये का पुरस्कार दिया, जबकि पंतनगर विश्वविद्यालय ने 18,000 रुपये की सम्मान राशि प्रदान की।
दुर्भाग्य की बात यह है कि उत्तराखंड की इतनी प्रेरणादायक और महान शख्सियत के बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। जिनके जीवन और कार्य को प्रदेश के विद्यालयों में पढ़ाया जाना चाहिए था, वे आज जनस्मृति से लगभग ओझल हैं।
चंद्रशेखर लोहुमी केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि यह साबित करने वाले व्यक्तित्व थे कि जिज्ञासा, समर्पण और निरंतर प्रयास के सामने संसाधनों की कमी कभी बाधा नहीं बनती। उनकी कहानी आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित करती है कि सच्ची लगन और मेहनत से असंभव दिखने वाले कार्य भी संभव बनाए जा सकते हैं।
चंद्रशेखर लोहुमी जी के बारे में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्हें वर्ष 1964 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिला था। स्वयं राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्ण जी ने इन्हें यह पुरस्कार प्रदान किया। तब उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा था और वर्तमान उत्तराखंड के सीमा की बात करें तो उस वर्ष यहां से केवल दो शिक्षकों को यह पुरस्कार मिला था एक चन्द्रशेखर लोहुमी जी और दूसरी गंगोत्री गर्ब्याल जी को जोकि पिथौरागढ़ से थीं। यदि आपको लोहुमी के जीवन और जैव विज्ञान के ऊपर किए गए उनके कार्यों के बारे में विस्तृत बातें जाननी हों तो आप उनके बेटे हरिहर लोहुमी जी को फोन कर सकते हैं 👉 9557407611
लेखकः राजेंद्र नेगी ( गांव वाला यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज )
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