Wednesday, April 2, 2025
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सितेसर महादेव मंदिर गोविंपुर अल्मोड़ा के बाज के जंगलों में बसा अनोखा शिव मंदिर !

उत्तराखंड को देवभूमि कहाँ जाता है। यहाँ कण कण में देवताओं का वास है। आज आपको उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में स्थित एक अनोखे शिव मंदिर, सितेसर महादेव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। जिसके शिवलिंग में चोट का निशान  है ?

आइये सर्वप्रथम जानते हैं कि यह मंदिर कहाँ स्थित है ? और एक जनश्रुति कथा, लोक कथा  के माध्यम से बताइयेंगे कि इस मंदिर के शिवलिंग पर चोट का निशान क्यों है ?

इसे पढ़ेपूर्णागिरि मंदिर और पूर्णागिरी मंदिर का इतिहास।

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गोविंदपुर के नजदीक बांज के जंगलों के बीच बसा है सितेसर महादेव मंदिर –

उत्तराखंड अल्मोड़ा जिले के प्रसिद्ध हिल स्टेशन रानीखेत से लगभग 20 से 25  किलोमीटर की दूरी पर रानीखेत मनान रोड पर गोलुछिना नामक एक स्थान है। उसी के पास लगभग एक किलोमीटर अंदर  बाज के शांत  जंगल मे  भगवान भोलेनाथ सिधेश्वर महादेव  के रूप में निवास करते हैं ।

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जिसको स्थानीय भाषा मे सितेसर का मंदिर भी कहा जाता है। इसके पास बसयूरा और चिनोना नामक गाँव भी स्थिति  हैं । इस मंदिर के नजदीक स्थानीय बाजार , एक तो गोलुछिना बाजार है । और दूसरी नजदीकी बाजार गोविंदपुर बाजार है। महादेव का यह मंदिर घने बाज के जंगल मे स्थिति है। यह मंदिर प्रकृृृति की शांत वातावरण मेंं बसा है।यहाँ पहुँच कर आलौकिक शांति एवं सुकून का अहसास होता है।

शिवलिंग पर है चोट का निशान  –

यहाँ सभी पूजा पाठ के साथ ,शिवरात्रि का प्रसिद्ध मेला लगता है।यह मंदिर भगवान शिव के चमत्कारी मंदिरों में से एक है ,यह सितेसर का मंदिर, इस मंदिर की अनेक लोककथाएँ ,जनश्रुतियां प्रसिद्ध हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि,  इसके शिवलिंग पर कुल्हाड़ी की चोट का निशान है। अर्थात शिवलिंग धारदार हथियार से काटा गया है।

सितेसर महादेव मंदिर
सीधेश्वर महादेव, फ़ोटो -संतोष गिरी

आप उपरोक्त फ़ोटो में भी देख सकते हो,कि शिवलिंग पर चोट का निशान है। आखिर यह चोट का निशान कैसे हुआ ? इस पर एक जनश्रुति और लोक कथा प्रसिद्ध है –

सितेसर महादेव पर प्रचलित लोककथा –

“हमारे दादा जी बताते थे, कि पहले जमाने मे, यह क्षेत्र एकदम घना बाज का जंगल था।  जो अभी भी है। स्थानीय गांव के लोग यहाँ  लकड़ी काटने के लिए आते थे। एक बार एक आदमी ने बाज का पेड़ ढाह रखा था, औऱ उसी पर से वो लकड़ी काट रहा था।

लकड़ी काटते हुए अचानक उसकी कुल्हाड़ी छिटक कर जमीन में धस गई। और जहॉ उसकी कुल्हाड़ी धसी वही से खून की धारा फूट गई। यह घटना देख कर वह आदमी एकदम डर गया, आश्चर्य चकित हो गया। उसकी समझ मे नही आ रहा था,कि आखिर जमीन के अंदर से खून क्यों और कैसे आ रहा है?  उसने जल्दी जल्दी अपने आस पास लकड़ी काट रहे अन्य लोगो को बुलाकर वह घटना दिखाई।

सभी लोग आश्चर्य चकित हो गए।फिर सब लोगो ने उस स्थान पर ,जहॉ जमीन से खून आ रहा था,वहाँ खोद कर देखा तो ,वहां एक शिवलिंग निकला, कुल्हाड़ी की चोट की वजह से ,उस शिवलिंग का कुछ भाग कट चुका था, और उसी कटे भाग से खून निकल रहा था।

भगवान भोलेनाथ का यह अनोखा चमत्कार देख सबकी आंखे फटी की फटी रह गई। धीरे धीरे यह बात सारे क्षेत्र में फैल गई। फिर उसी स्थान पर भगवान शिव का चमत्कारी मंदिर सिधेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की गई। जिसको स्थानीय भाषा मे सितेसर का मंदिर  भी कहते हैं।

कैसे जाए सितेसर महादेव मंदिर या सितेसर मंदिर –

प्रसिद्ध सितेसर महादेव मंदिर या सितेसर मंदिर जाने के लिए हल्द्वानी द्वारा जाया जा सकता है। हल्द्वानी से अल्मोड़ा बाजार और अल्मोड़ा से स्थानीय बाजार गोविंपुर तक टैक्सी या बस से जा सकते हैं। गोविंदपुर से थोड़ा पैदल जाना पड़ सकता है।

­सितेसर महादेव मंदिर जाने के लिए सबसे आसान रास्ता है , रानीखेत का रास्ता । आप अलमोड़ा या हल्द्वानी से रानीखेत बाजार पहुच जाइये वहाँ से गोलुछिना नामक स्थान के लिए टैक्सी पकड़ ले। गोलुछिना से बस 1 से आधा किमी अंदर प्रकृति की शांत गोद मे बसा है। भगवान भोले का सिधेश्वर मंदिर या सितेसर मंदिर।

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Bikram Singh Bhandari
Bikram Singh Bhandarihttps://devbhoomidarshan.in/
बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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