Wednesday, April 2, 2025
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संतला देवी मंदिर देहरादून की कहानी, इतिहास तथा पौराणिक महत्त्व

देहरादून बस अड्डे  (ISBT)  से लगभग 15 किलोमीटर दूर पंजाबीवाला  में 02 किलोमीटर की उचाई पर स्थित है ,देहरादून का प्रसिद्ध देवी मंदिर सन्तला देवी का मंदिर। संतला देवी का मंदिर देहरादून का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर को संतोला देवी या संतुला देवी के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर देहरादून में घूमने ,देखने और समय बिताने तथा सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक कार्यों हेतु सबसे उपयुक्त है। संतोला देवी मंदिर भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। प्रतिदिन सैकड़ो भक्त यहां माता के दर्शनों के लिए आते हैं।

संतोलादेवी मंदिर में शनिवार का विशेष महत्व है। यह माना जाता है ,कि इस दिन माँ संतोलादेवी पत्थर में परिवर्तित हुई थी। कई लोग यह भी मानते हैं कि आज भी, माँ संतला देवी की मूर्ति पत्थर में परिवर्तित होती है। इस कारण यहाँ शनिवार को भीड़ अधिक होती है।

संतला देवी की कहानी , इतिहास –

मा संतला देवी का इतिहास 11 वी शताब्दी पूर्व का माना जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार , 11 वी शताब्दी में नेपाल के एक राजा की पुत्री पर  एक मुगल मोहित होकर , उनसे जबरदस्ती विवाह करने की कोशिश करने लगा। तब उससे बचने के लिए राजकुमारी संतला देवी नेपाल से पहाड़ी रास्तों से चलकर देहरादून पहुँच गई। और देहरादून में वर्तमान के पंजाबीवाला से लगभग 2 किलोमीटर ऊची पहाड़ी पर अपने भाई के साथ रहने लगी।

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मुगल भी राजकुमारी संतोला देवी को ढूढ़ते -ढूढ़ते देहरादून आ गए। मुगलों ने संतोला देवी और उनके भाई संतोर सिंह पर आक्रमण कर दिया। दोनो भाई बहीनों ने पूरी बहादुरी के साथ मुगलों का सामना किया। लेकिन फिर भी वे मुगलों के बीच मे घिर गए।  तब अंततः उन्होंने हाथ जोड़ के ईश्वर को याद किया। कहते हैं कि अचानक एक प्रकाश चमका और ,सारे मुगल अंधे हो गए व संतला देवी व उसका भाई पत्थर की मूर्ति में बदल गए।

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संतला देवी

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कालांतर में संतला देवी के किले के स्थान पर मंदिर बना दिया गया। उसके बाद यह देहरादून के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक मे गिना जाने लगा। और श्रद्धालु यहां आकर पूजा अर्चना करने लगे।

संतान प्राप्ति के लिए संतोला देवी का विशेष महात्म्य है :-

देहरादून का प्रसिद्ध संतुला देवी मंदिर , के बारे में कहा जाता है कि यहाँ निसंतान दंपतियों को माँ संतान सुख से परिपूर्ण करती है। इस संदर्भ में संतला देवी की कहानी भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है, कि 16 वी शताब्दी में कई सैनिक यहाँ नित्य पूजा पाठ के लिए आते रहते थे। उस समय एक अंग्रेज अफसर की कोई संतान नही थी।

वह बहुत परेशान रहता था। एक दिन उसे अपने सैनिकों द्वारा संतला के महत्व के बारे में ज्ञात हुआ । उसने विधि विधान से वहां पूजा अर्चना की तो वह अंग्रेज 1 वर्ष के अंदर संतान प्राप्त हो गई। कहते हैं, यहाँ देवी माँ अपने भक्तों का पूरा  ध्यान रखती है। यह मंदिर भाई बहीनों के प्यार और एकता का प्रतीक माना जाता है।

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संतला देवी मंदिर देहरादून कैसे जाएं –

संतला देवी देहरादून जाने के लिए , देहरादून शहर से जैतूनवाला तक सार्वजनिक बस का उपयोग करके वहां से आगे को 2 किलोमीटर रिक्सा से जाकर ,उसके आगे पंजबिवाला से आगे 2 किलोमीटर पैदल ट्रैक है।

अर्थात 2 किलोमीटर पैदल जाना पड़ेगा। संतोलादेवी का निकटतम रेलवे स्टेशन 13 किलोमीटर दूर देहरादून रेलवे स्टेशन है। देहरादून जौलीग्रांट हवाई अड्डे से संतला देवी 37 किलोमीटर दूर है। तथा देहरादून बस अड्डे से संतोला देवी मंदिर 15 किलोमीटर दूर है।

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Bikram Singh Bhandari
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बिक्रम सिंह भंडारी, देवभूमि दर्शन के संस्थापक और प्रमुख लेखक हैं। उत्तराखंड की पावन भूमि से गहराई से जुड़े बिक्रम की लेखनी में इस क्षेत्र की समृद्ध संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर, और प्राकृतिक सौंदर्य की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ उत्तराखंड के खूबसूरत पर्यटन स्थलों और प्राचीन मंदिरों का सजीव चित्रण करती हैं, जिससे पाठक इस भूमि की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक विरासत से परिचित होते हैं। साथ ही, वे उत्तराखंड की अद्भुत लोककथाओं और धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। बिक्रम का लेखन केवल सांस्कृतिक विरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे स्वरोजगार और स्थानीय विकास जैसे विषयों को भी प्रमुखता से उठाते हैं। उनके विचार युवाओं को उत्तराखंड की पारंपरिक धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ आर्थिक विकास के नए मार्ग तलाशने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी लेखनी भावनात्मक गहराई और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण है। बिक्रम सिंह भंडारी के शब्द पाठकों को उत्तराखंड की दिव्य सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत की अविस्मरणीय यात्रा पर ले जाते हैं, जिससे वे इस देवभूमि से आत्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं।
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