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पांडव नृत्य उत्तराखंड –
पाण्डव नृत्य उत्तराखण्ड के साथ पांडवों का दीर्घकालीन व्यापक सम्बन्ध माना जाने के कारण सम्पूर्ण उ.ख. में जहां पर्वत शिखरों, स्थाननामों, तीर्थस्थलों, जलस्रोतों, विशिष्टि शिलाखण्डों के रूप में उनके स्मारक अंकित हैं वहीं विभिन्न रूपों में उनसे तथा उनके जीवनवृत्तों से सम्बद्ध अनेक गाथाएं व नृत्याभिनय भी पाये जाते हैं, जिनमें से प्रमुख है पण्डवार्त (पांडवनृत्य) एवं महाभारत । गढ़वाल एवं कुमाऊं मण्डल में इनकी स्थिति जिन रूपों में पायी जाती है उसकी संक्षिप्त रूपरेखा को निम्न रूपों में देखा जा सकता है।
पाण्डवलीला या पांडव नृत्य का महत्व और धार्मिक स्वरूप –
नृत्याभिनय के माध्यम से प्रस्तुत की जाने वाली पाण्डवलीला, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘पण्डवर्त’ के नाम से तथा बाह्य स्तर पर ‘पाण्डवनृत्य’ के नाम से जाना जाता है, का प्रचार-प्रसार मुख्य रूप से उत्तराखण्ड के गढ़वाल मण्डल में एक धार्मिक कृत्य के रूप में देखा जाता है।
पांडव नृत्य आयोजन का समय, अवधि और परम्परा –
पांडव नृत्य स्थानीय विभेदों के साथ विभिन्न समयावधियों में व रूपों में मनाया जाता है। फलतः इसका आयोजन कहीं प्रतिवर्ष तो कहीं तीन वर्षों के बाद तथा कहीं अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी आदि विपत्तियों के अवसरों पर उनके परिहारार्थ किया जाता है। यह आयोजन सामान्यत: शीतकाल में माघ मास में किया जाता है। जिसकी अवधि कहीं नौ दिन की तथा कहीं पूरे महीने की होती है। इसकी अभिव्यक्ति कथोपकथन के स्थान पर अंगाभिनयों के रूप में किये जाने से लोग इसे नृत्य कह डालते हैं।
आयोजन का शुभारम्भ और चाणबाण स्थापना –
ग्रामवासियों द्वारा इसका शुभारम्भ ग्राम पुरोहित के द्वारा चयित शुभ दिन तथा शुभ मुहूर्त में किया जाता है । एतदर्थग्राम पंचायत के प्रमुखों द्वारा इसमें होने वाले व्यय का आकलन भोजन, धूना जलाने के लिए बालन (बारी/बीड़ा) की व्यवस्था किये जाने के उपरान्त नियत तिथि को इस आयोजन में भाग लेने वाले सभी पात्र (एरोला=अभिनेता),
पुरोहित एवं ग्रामवासियों के द्वारा स्नान करके व्रती रहते हुए वाद्य-वादनों के साथ नियत स्थान, (ग्राम के किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर में, पंचायतघर अथवा मंदिर में रखे हुए उनके ‘निशानी’ (प्रतीकों), जिन्हें लोकभाषा में ‘चाणवाण’ कहा जाता है, को बाहर निकाला जाता है एवं अर्जुन का अभिनय करने वाला पात्र इन्हें एक वस्त्र में लपेटकर मन्नाण (सामूहिक स्थान), जहां पर कि देवी-देवताओं से सम्बद्ध सभी धार्मिक कृत्य सम्पन्न किये जाते हैं, में लाकर रखता है।
चाणबाण: पांडवों व अन्य देवताओं के अस्त्र-शस्त्र और प्रतीक –
‘चाणबाण’ में प्रत्येक पाण्डव देवता के अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र होते हैं, यथा युधिष्ठिर का धर्मचक्र (तलवार / भाला), अर्जुन का धनुष (गाण्डीव), भीम की गदा, नकुल की छड़ी, सहदेव की लिखने की तख्ती (विद्वता की प्रतीक), द्रोपदी का खड्ग खप्पर (दोनों हाथों में), कुन्ती की चांदी की सुई व माला (चवल्यांसी-सौणी), श्रीकृष्ण का शंख, हनुमान की लाल गदा, नागार्जुन का धनुषतीर, बबूवाहन (बभ्रुवाहन) की भीम की गदा से छोटी गदा, माता फुलारी की फूलों की टोकरी आदि। पात्रों का चयन वंशपरम्परा रूप उनमें अवतरित होने वाली उपर्युक्त भिन्न-भिन्न देवशक्तियों के आधार पर होता है। कभी-कभी एक से अधिक पात्रों में भी एकाधिक देवशक्तियों का अवतरण हो जाता है।
अवतरण (पस्वा) की मान्यता और पात्र स्थापना –
नृत्यानुष्ठान के समय (पांडवलीला के मंचन के समय) सभी अभिनेता (पात्र) अपनी नियत वेषभूषा में अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ उस समारोह में सम्मिलित होते हैं। उल्लेख्य है कि पण्डवार्त में एक बार जिस व्यक्ति (पस्वा) में जिस देवता (पांडव) का अवतरण होता है उसके जीवनकाल में उसी का उसमें अवतरण होता है, अन्य किसी में नहीं।
यथा द्रुपदा (द्रोपदी) का अवतरण जिस स्त्री में होगा, उसके जीवनकाल में वह उसी प्रकार होता रहेगा। उसकी मृत्यु के उपरान्त इसके लिए अगले पण्डवार्त की प्रतीक्षा की जाती है। उसमें जो महिला नृत्यगान-वादन के समय स्वयं कंपित होने लगती है। उसमें इसका अवतरण होता है तथा पूरे धार्मिक अनुष्ठान के साथ उस देवशक्ति को उसमें अभिषिक्त किया जाता है यह अवतरण केवल किसी महिला में ही होगा, पुरुष में नहीं ।
नृत्य का दैनिक क्रम, हवन और धार्मिक अनुशासन –
नृत्य का आयोजन दिन के तीसरे प्रहर से रात्रि के द्वितीय प्रहर तक किया जाता है। नृत्यारम्भ से पूर्व प्रतिदिन मन्नाण को गाय के गोबर-मिट्टी से लीप-पोत कर शुद्ध किया जाता है। फिर चाणबाण को जल से स्नान कराकर पुरोहित द्वारा उनकी पूजा अर्चना की जाती है। हवन कराया जाता है। जौ की हरियाली बोई जाती है।
जिसे समापन के दिन लोग प्रसाद के रूप में अपने घरों को ले जाते हैं। चाणबाण को स्नान कराने, अर्चना व हवन की आनुष्ठानिक प्रक्रिया प्रतिदिन नियमित रूप से सम्पन्न की जाती है। इस स्थान पर पूरे समारोह तक दीपक अविच्छिन्न रूप में प्रज्वलित रखा जाता है। नर्तक मंडल दिन के समय अपने अस्त्र-शस्त्रों के साथ नृत्य करता है। इस काल में इन पात्रों को कई व्रतों व नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, यथा मांसाहार, मंदिरापान, स्त्रीप्रसंग, अस्पृश्य स्पर्श आदि का परिहार।
अन्य देवताओं का अवतरण और नृत्य क्रम –
पांडवों के पस्वाओं (अवतरण के माध्यमों) के अतिरिक्त इसमें महाभारत के अन्य पात्रों, यथा श्रीकृष्ण, माता कुंती, माता फुलारी, नागार्जुन, बब्रूवाहन, हनुमान आदि पात्रों का एवं कुलद्यौ (कुलदेवता), नागरजा (नागराजा), घण्डियाल (घण्डाकर्ण) आदि स्थानीय देवताओं का भी अवतरण होता है। इस नृत्य में माता कुन्ती को छोड़कर अन्य सभी पात्र भाग लेते हैं। नृत्यारम्भ विभिन्न प्रकार के वाद्यवादनों से होता है। इसमें सर्वप्रथम इन वाद्ययंत्रों के द्वारा प्रत्येक नर्तक पात्र में तत्तत् देवांशों को अभिषिक्त किया जाता है।
तदनुसार नृत्य का शुभारम्भ होने पर सर्वप्रथम भीम व अर्जुन एक साथ नृत्य करते हैं, फिर युधिष्ठिर-सहदेव, फिर द्रोपदी -अर्जुन, नकुल-तिलमिल, अर्जुन-नागार्जुन एवं अन्त में बब्रूवाहन (बभ्रुवाहन) व हनुमान्। बीच में श्रीकृष्ण, माता कुंती, माता फुलारी, भी अवतरित होती हैं। इस क्रम में इनके अवतरणों व नृत्यों के उपरान्त वहां पर उपस्थित दर्शक भी इसमें भाग ले सकते हैं। प्रत्येक देवता को अवतरित कराने की अपनी ‘चाली’ होती है।
रात्रिकालीन पांडवलीला और चाणबाण की सुरक्षा –
रात्रि में नृत्य के पश्चात् रंगमंच पर पांडव लीला भी अभिनीत की जाती है। इस काल में ‘चाणबाग’ की सुरक्षा एवं पवित्रता का भार है। पूरे उत्सवकाल में उनके स्थान पर अविच्छिन्न से दीपक को प्रज्वलित रखा जाता है।
छाका परम्परा : भोजन, पैयाडाली और अनुष्ठानिक प्रक्रिया –
लगभग एक माह तक चलने वाले इस समारोह में नृत्य के समयान्तराल में सभी नर्तक पात्रों को, कभी-कभी गांव की धियाणों (कन्याओं) को एवं ग्रामवासियों को भी, गांवों के विभिन्न आनुवंशिक वर्गों-खोलों अथवा राठों के द्वारा भोजनार्थ आमंत्रि किया जाता है जिसे ‘छाका’ कहा जाता है।
किस दिन किस ‘राठ’ या ‘खोल’ के लोगों की ओर से छाका दिया जायेगा इसका निर्णय पहले से कर लिया जाता है।
छाका के अवसर पर ‘पैयाडाली’ का चयन किया जाता है—एक ऐसा पैंया वृक्ष जिसे इससे पूर्व कभी किसी हथियार से काटा न गया हो। उसे वाद्ययंत्रों के साथ जुलूस में लाकर भूमि में गाड़ा जाता है, पूजा होती है और नृत्य किया जाता है। इसके बाद सभी अपने अस्त्र-शस्त्रों का अर्घ्य देकर भोजन करते हैं।
चक्रव्यूह समारोह : महाभारत प्रसंग का जीवंत नाट्य रूप –
समारोह का एक महत्वपूर्ण अंग होता है चक्रव्यूह समारोह। इसमें चक्रव्यूह की रचना दो दिन पूर्व की जाती है। सात द्वार बनाए जाते हैं—जयद्रथ, द्रोण, कर्ण, दुःशासन, अश्वत्थामा, शल्य और दुर्योधन के। अगले दिन अभिमन्यु अकेला प्रवेश करता है और अंत में दुर्योधन द्वारा छलपूर्वक उसका वध होता है। अभिमन्यु के शव के स्थान पर बकरे की बलि दी जाती है। इसी समय अर्जुन और श्रीकृष्ण का प्रवेश होता है और अर्जुन प्रतिज्ञा करता है।
मोर का दार : द्वार का निर्माण का प्रतीक अनुष्ठान –
कभी-कभी चक्रव्यूह की जगह कमलव्यूह या गरुड़व्यूह भी बनाया जाता है। अगले दिन ‘मोर का दार’ किया जाता है—जिसका सम्बन्ध श्रीकृष्ण द्वारा द्वारका निर्माण के लिए पाण्डवों द्वारा मगध से लकड़ी लाने की कथा से है। भारी खम्भों को पैयां वृक्ष, केले के पत्तों और फूलों से सजाकर नृत्यस्थल तक लाया जाता है।
समापन: चाणबाण विसर्जन और अंतिम अनुष्ठान –
अंतिम दिन पहले दुर्योधन का नृत्य होता है, फिर सभी पांडव पात्र नृत्य करते हैं। शुभ मुहूर्त में चाणबाण को मंदिर या नियत स्थान में वापस रखा जाता है। दीप जलाकर पूजा होती है। शस्त्रों की परिक्रमा बकरे से करवाकर बलि दी जाती है। अंत में अर्जुन का पात्र इन्हें सफेद वस्त्र में लपेटकर वापस रख आता है—और समारोह समाप्त हो जाता है।
स्यूंरात और प्रेत-आगमन की लोकमान्यता –
टिहरी के आचार्य इन्द्रदत्त उनियाल के अनुसार नौ दिनों तक चलने वाले इस आयोजन की नौवीं रात्रि भयावह मानी जाती है। इसे ‘स्यूंरात’ कहते हैं। इसमें देवता नाचते रहते हैं और प्रातः चार बजे ‘भूत’ आते हैं जो रोते-नाचते हुए अपने जीवन की बातें करते हैं। इसके बाद ‘बयाल’ (प्रेतात्माएं) आती हैं जिनसे सामना करना अशुभ माना जाता है। अंतिम दिन को ‘घरेण’ कहा जाता है—देवताओं के घर लौटने का दिन।
संदर्भ – प्रो. डी.डी. शर्मा की पुस्तक “उत्तराखंड ज्ञानकोश” से साभार
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