जौनसार – हिमाचल क्षेत्र का वीर नंतराम नेगी ,( नाती राम ) की वीरता की कहानी किताबों में नहीं बल्कि यहाँ के लोगों की जुबान पर हारुल के रूप में आज भी अमर है। जौनसार क्षेत्र और सिरमौर राज्य के इतिहास में अपनी वीरता और साहस के बलबूते पर अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अमर करवाने वाले नंतराम नेगी ,( नाती राम ) उर्फ़ गुलदार का जन्म १७वी शाताब्दी के आस पास ,ग्राम मलेथा ,कैम्प मोहराड में हुवा था। उस समय यह क्षेत्र सिरमौर रियासत में था। और इस रियासत की राजधानी नाहन में थी। सिरमौर और नाहन वर्तमान में हिमाचल…
Author: Bikram Singh Bhandari
गढ़ कन्या – उत्तराखंड में गोरखा शाशन से पहले तक ,हिमालयी क्षेत्रों ( गढ़वाल ,कुमाऊं और हिमाचल ) के राजघरानो के न केवल आपस में वैवाहिक सम्बन्ध थे ,अपितु इन राज्यों ( गढ़वाल ,कुमाऊं और हिमाचल ) में परस्पर एक दूसरे राज्यों से आने वाले सैनिकों को भी अपने राज्य में वरीयता से भर्ती किया जाता था। दूसरे राज्यों से आने वाले सैनिक और सेनानायक अपने आश्रयदाता राजाओं के प्रति निष्ठावान रहते थे और राज्य के स्थानीय सेनानायको की दलबंदी और षणयंत्रों से मुक्त रहते थे। कुमाऊं का नरशाही मंगल हत्याकांड में मारे गए नगरकोटिये सैनिक हिमाचल प्रदेश के थे। गढ़वाल में…
बाबा मोहन उत्तराखंडी का जीवन परिचय – बाबा मोहन उत्तराखंडी के नाम से विख्यात मोहन सिंह नेगी का जन्म उत्तराखंड पौड़ी गढ़वाल जिले के एकेश्वेर ब्लॉक के बैठोली गांव मे सन 1948 को हुवा था। इनके पिता का नाम श्री मनवर सिंह नेगी और माता जी नाम श्रीमती कमला देवी था। १२वी की परीक्षा पास करने के बाद मोहन सिंह नेगी सेना के बंगाल इंजीयरिंग ग्रुप में ,क्लर्क के रूप में भर्ती हो गए। सेना की नौकरी में वे ज्यादा दिन नहीं रहे। उसका प्रमुख कारण था। उत्तराखंड की पृथक मांग के लिए आंदोलन शुरू हो गया। अपने राज्य के…
उत्तराखंड के नागदेवता हिमालयी क्षेत्रों और उत्तराखंड में नागदेवता की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से बहुप्रचलित रहा है। उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल की अपेक्षा गढ़वाल मंडल में ज्यादा प्रचार देखा जाता है। टिहरी गढ़वाल में स्थित सेम -मुखेम नामक नागराजा का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण को नागराजा के नाम से पूजते हैं। इसके अलावा नागेलो और नागदेव के भी अनेक पूजा स्थल हैं , जिसमे से पौड़ी उफल्टागांव में है , जिसमे गेहूं की तराई के बाद हर तीसरे वर्ष जून के महीने ४० किलो का रोट चढ़ाया जाता है। इसके अलावा उत्तरकाशी के रवाई घाटी…
शेषनाग देवता मंदिर – श्रवण मास की पंचमी को समस्त देश में सनातन धर्म के लोग नागपंचमी योहार के रूप में मानते हैं। उत्तराखंड में नागों को विशेष महत्व दिया जाता है। उत्तराखंड के सभी मंडलों में नागदेवता को लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। यहाँ शेषनाग देवता से लेकर कालियानाग और उसके समस्त परिवार की पूजा होती है। सावन की पंचमी के दिन पड़ने वाली नागपंचमी को भी उत्तराखंड बड़े उत्त्साह और श्रद्धा भक्ति से मनाया जाता है। उत्तराखंड के शेषनाग देवता मंदिर में नागपंचमी के दिन भव्य मेला लगता है। उत्तराखंड में कहाँ है शेषनाग देवता मंदिर- उत्तराखंड…
कुमाऊनी में घिंगारू, घिंघारू और गढ़वाली में घिंघरू तथा नेपाली में घंगारू के नाम से विख्यात ये पहाड़ी फल दक्षिणी एशिया, मध्य पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों मे समुद्र तल से 1700 से 3000 मीटर की ऊंचाई में पाया जाता है। इस फल की कटीली झाड़ियां मुख्य रूप से पहाड़ी ढलानों पर, पहाड़ों में रास्तों के किनारे या सड़कों के किनारे या घाटी वाले क्षेत्रों में विशेष रूप से होता है। घिंगारू के पेड़ पर जून जुलाई के आसपास फल लगते हैं। छोटे छोटे लाल सेव जैसे दिखने वाले घिंघरु के फलों को हिमालयन रेड बेरी फायर थोर्न एप्पल या व्हाइट थोर्न…
हमारा उत्तराखंड एक बहुत बड़े संकट से गुजर रहा है , इस समय किसी के भाई, माता ,बहन या उनके परिवार का कोई सदस्य लापता हो जा रहा है! पिछले कुछ समय से देख रहा हूं कि दिन पर दिन ऐसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं ।बच्चे से लेकर बूढ़े व्यक्ति तक कोई भी लापता हो रहा है ।लापता होने की इतनी घटनाएं देखता हूं जिसकी कोई कल्पना नहीं .. और कितने लोगों के अपने लोग मृत मिल रहे हैं। हमारा पहाड़ वर्षों से शांत रहा है और अब कुछ पहाड़ को अशांत कर रहे हैं। समस्या यह है कि…
नौला का अर्थ क्या है? नौला उत्तराखंड में घरनुमा पानी के श्रोत या बावड़ी को कहते हैं। उत्तराखंड में नौले का निर्माण एक खास वस्तुविधान के अंतर्गत किया होता है। प्राचीन काल में पहाड़ो में घरों के आसपास जो भूमिगत जल श्रोत होता था ,उसे वही महत्त्व दिया जाता था, जैसे मंदिरों को दिया जाता था। मंदिरों के वस्तुविधानों की तरह नौलों को भी खास वास्तु विधान बनाया जाता था। मंदिरों के गर्भगृह की तरह नौलों का भी गर्भग़ृह और दो या चार खम्भों पर आधारित वितान हुवा करता था। गर्भगृह में मजबूत तराशे हुए पत्थरों से उल्टे यञकुंड अर्थात…
मित्रों अपने इस लेख में हम आज इस संकलन में प्रसिद्ध लेखिका, गौरा पंत शिवानी की कहानी “पिटी हुई गोट” लेकर आये हैं। शीर्षक-पिटी हुई गोट लेखिका-गौरा पंत शिवानी दिवाली का दिन। चीना पीक की जानलेवा चढ़ाई को पार कर जुआरियों का दल दुर्गम-बीहड़ पर्वत के वक्ष पर दरी बिछाकर बिखर गया था। एक ओर एक बड़े-से हंडे से बेनीनाग की हरी पहाड़ी चाय के भभके उठ रहे थे, दूसरी ओर पेड़ के तने से सात बकरे लटकाकर आग की धूनी में भूने जा रहे थे। जलते पशम से निकलती भयानक दुर्गंध, सिगरेट व सिगार के धुएं से मिलकर अजब…
गढ़वाली गीत लिरिक्स – इस लेख में हम आपके लिए कुछ सदाबहार गढ़वाली गीत लिरिक्स या गढ़वाली गीतों के बोलों का संकलन कर रहे हैं। उम्मीद है कि हमारा यह संकलन आपको अच्छा लगेगा। प्रसिद्ध सदाबहार गढ़वाली गीतों में सर्वप्रथम हम बीना कुकरेती जी द्वारा गाया हुवा ये सास बहु की नोकझोक वाले से कर रहे हैं। यह गढ़वाल का बहुत पुराना लोक गीत है। इसकी रिकॉर्डिंग चंद्र सिंह राही द्वारा करवाई गई थी। गाडो गुलाबंद गुलबंद को नगीना, गढ़वाली गीत लिरिक्स ( Garhwali song lyrics ) – गाडो गुलाबंद, गुलबंद को नगीना, त्वै तैं मेरी सासू ब्वारी युं की…