उत्तराखंड के देवी देवता
संस्कृति

उत्तराखंड के देवी देवता | उत्तराखंड के लोक देवता |गढ़वाल के देवी देवता | कुमाऊं के देवी देवता | Uttarakhand ke devi devta

प्रस्तुत लेख  में उत्तराखंड के देवी देवता  में उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल में पूजे जाने वाले लोक देवताओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी संकलित की है। यह जानकारी अच्छी लगे तो , सोशल मीडिया बटनों का प्रयोग करके शेयर अवश्य करें। और किसी त्रुटि में सुझाव के लिए हमारे फेसबुक पेज देवभूमि दर्शन पर सन्देशभेज कर  हमे बता सकते हैं। आपके सकारात्मक सुझाओं का स्वागत है।

उत्तराखंड के देवी देवता 

कठपुड़िया देवी:

ये  देवी कुमाऊं मंडल के पूर्वी शौका जनजाति द्धारा पथ रक्षिका देवी के रूप मे पूजित है। कठिन  पहाड़ी रास्तों  पर और विशेषकर  दरों में इसकी स्थापना की जाती हैं।

कंडारदेव:

इन  लोक देवता की पूजा  उत्तरकाशी जनपद के उत्तरी क्षेत्र मे की जाती  हैं।  इनका बगियाल गांव के ऊपर ततराली गांव में मानते हैं। 

ऐड़ी:

यह देवता  पूरे उत्तराखंड मे पूजे जाते हैं। इन्हे मुख्य रूप से पशु पालकों का देवता माना जाता हैं। मान्यता है कि यह घने जंगलों में उल्टे पांव वाली आछरियो के साथ विचरण करते हैं।

ओवलिया:

यह देवता पिथौरागढ़ की महर पट्टी के भाटकोट के आसपास पूजा जाते हैं। जागरो मे इन्हें हरु देवता का अनुयायी माना जाता हैं।

उल्का देवी:

इस देवी को कुमाऊं क्षेत्र मे पूजा जाता है।  इनका मन्दिर पिथौरागढ़ के पास हैं 

उज्यारी देवी:

ये कुमाऊं क्षेत्र मे मान्यता प्राप्त  लोक देवी हैं। इन्हें ज्वालामुखी और कोट कांगड़ा की देवी भी कहा जाता हैं। 

आछरी/ मातरी/ परिया

माना जाता है कि जो कुंवारी लड़कियां अतृप्त इच्छाओं के साथ मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। वे आछरी बन जाती हैं ये ऊंचे पहाड़ों, घने जंगलों, नदी के किनारों पर विचरण करते है। जिन्हें लोकदेवी  की मान्यता प्राप्त है।उत्तराखंड के टिहरी जिले में खेट पर्वत इनका प्रमुख स्थान माना जाता है। 

अन्यारी देवी:

जोहार क्षेत्र मे पूजित यह देवी दुर्गा का रूप माना जाती हैं। इस देवी की पूजा नवरात्रों में अष्टमी को रात के अंधेरे मे की जाती। कुछ स्थानों पर गढ़  देवी के एक रूप को अन्यारी  देवी के रूप में पूजा जाता है। 

अटरिया देवी:

ह ऊधम सिंह नगर जनपत के साथ लोगों द्वारा पूजित देवी हैं। इस देवी का मन्दिर  रूद्रपुर मे बस अड्डे के नजदीक में स्थित हैं। 

अकितरि:

जनजातीय क्षेत्र रवाई -जौनपुर मे भेड़ पालकों द्वारा पूजा जानेवाला देवता हैं। इस देवता को भेड़ों का रखवाला माना जाता है। अक्षय तृतीया के दिन रवाई -जौनपुर सीमा के जंगल मे इस देवता की सामूहिक पूजा की जाती हैं। 

कर्ण देवता:

यह भ्रमणशील और उदारमना लोक देवता हैं। इनका मूल स्थान उत्तरकाशी के रवाई क्षेत्र मे नौटवाड के निकट देवरा सिगतुर गांव में हैं। 

कसार देवी:

अल्मोड़ा से 7 किमी उत्तर में इस देवी का मन्दिर है इस क्षेत्र मे इस देवी की अत्यधिक मान्यता है। यह मंदिर दुनिया के तीन रहस्य्मयी स्थलों में से एक है। कसार देवी के बारे में अधिक जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कलबिष्ट:

ये उत्तराखंड के  कुमाऊं क्षेत्र मे पूजित देवता हैं। यह बिनसर के निकट कोट्यूरा गांव का वीर पुरुष था। जिसे षड्यंत्र से मारा गया था। मरणोपरांत इनकी प्रेतात्मा को लोक देवता के रूप मे पूजा जाने लगा। कलविष्ट देवता के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिककरें। ….

कलुवावीर:

यह एक नाथपंथी संत था। जो अन्य कई नागपंथी संतो की तरह परोपकार के कार्यों मे लगा रहता था। बाद मे इन्हे लोक देवता के रूप मे पूजा जाने लगा। 

कालसिण:

इस देवी का प्रभाव पिथौरागढ़ जनपद  का उत्तरी क्षेत्र दानपुर, जोहार, अस्कोट, सोर एव सीरा माना जाता हैं। ये छुरमल देवता की माँ मानी जाती है। 

कुमासेण देवी:

यह देवी उत्तरकाशी जनपद मे पूजी जाती है। इनका मन्दिर कंबिला गांव के ऊपर पहाड़ मे हैं। रुद्रप्रयाग जिले  के कुमेडी गांव मे भी कुष्मांडा देवी की पूजा कुमासेण के नाम से होती हैं। 

कैलापीर या कालावीर:

यह एक मुस्लिम पीर है। इसकी पूजा गढ़वाल  मंडल में लोक देवता के रूप मे की जाती हैं। इसे बहुत शक्तिशाली माना जाता हैं। 

कोकरसी:

यह जौनसार क्षेत्र के खत पशगाव के गबेला गांव मे पूजा जाने वाला बेहद क्रोधी और तामसिक प्रवृति का लोक देवता हैं।

क्यूंसर देवता:

यह टिहरी जिले के जौनपुर क्षेत्र का एक बहुमान्य लोक देवता हैं। इसका देवालय बगसील गांव में हैं। 

गुरना माई:

इस देवी  का मंदिर चंपावत में लोहाघाट के एंचोली गांव मे स्थित हैं। 

गोगा/ घोगा:

यह जौनसार – बाबर क्षेत्र का एक लोक देवता हैं। गढ़वाल मे भी फूलदेइ के मौके पर बच्चे इस देवता की पूजा करते हैं। 

गबला:

इस देवता का मुख्य स्थान दातू (दारमा)  मे हैं। यह पूर्वी शौका क्षेत्र मे पूजित लोक देवता हैं। 

गोलू देवता / गोरिल देवता –

यह उत्तराखंड और मुख्य रूप से कुमाऊं क्षेत्र मे सर्वाधिक पूजित लोक देवता हैं। इसे ग्वेल, ग्वल्ला, गोरिया, भान्या आदि नामो से भी पुकारा जाता हैं। इन्हे अत्यधिक प्रभावशाली और न्याय देने वाले देवता माना जाता हैं। यह एक मात्र ऐसा देवता हैं, जिनके दरबार में मनौती के लिए सादे कागज या स्टाम्प पेपर पर अर्जी लगाई जाती हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर देवता की पूजा करते हैं और घंटी चढ़ाते हैं। इनकाप्रसि अर्जी लगाने वाला प्रसिद्ध मंदिर अल्मोड़ा जनपत के चितई में स्थित है। 

घड़ियाल:

यह उत्तराखंड मे बहुपुजित लोक देवता हैं। यह मूलतः घंटाकर्ण देवता हैं। यह क्षेत्र रक्षक देवता हैं। जागरो में इसे अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का रूप बताया गया है। इन्हे बद्रीनाथ मंदिर का रक्षक क्षेत्रपाल भी बताया गया है। 

गढ़ देवी:

यह पूरे उत्तराखंड में नाथपंथी देवताओं के साथ पूजी जाने वाली न्याय की देवी है। इसे इन सभी देवताओं की धर्म बहिन कहा जाता हैं। गढ़ देवी की कहानी विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें। ..

चंपावती देवी:

यह कुमाऊं के पूर्वी क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं। यह कत्यूर और चन्द्र शासकों की ईष्ट देवी हैं। इनकी पूजा चंपावत के बालेश्वर में चंद शासकों द्वारा स्थापित देवालय में होती है। 

चोफकिया:

इस लोक देवता का मन्दिर पिथौरागढ़ की महर पट्टी में विण के निकट वाड्डा गांव में हैं। 

छिपुला:

यह पिथौरागढ़ जनपद के पूर्वी जनजाति क्षेत्र का बहुमान्य देवता हैं। इसका प्रभाव क्षेत्र धारचूला का नागुरिकोट मे हैं। वहा इनका देवालय भी हैं। 

छुरमल:

यह पिथौरागढ़ के सौर से उत्तरी क्षेत्र मे पूजित लोक देवता हैं। लोक परम्परा मे छुरमल को कालसिण का पुत्र माना जाता हैं।

 जोखई:

यह गढ़वाल के उत्तर- पश्चिम क्षेत्र के जनजातीय लोगों का एक लोक देवता हैं। इसका प्रतीक एक पाषाण खंड  होता हैं। 

जगदेई:

इसका पूजास्थल उत्तरकाशी जनपद के चिन्यालीसौड़ खंड के इंद्र गांव के ऊपर स्थित हैं। स्थानीय लोगों की इस देवी मे अगाध श्रद्धा है।

जाख देवता:

इन्हे यक्ष भूमियाल और शिव का रूप माना जाता हैं। इनका पूजा स्थल गुप्तकाशी के निकट देवशाल गांव के जखधार स्थान पर है। इसके अतिरिक्त कई स्थानों पर जाख अथवा जाखनी की पूजा की जाती हैं।

झाली-माली:

इनका मंदिर  चंपावत जनपत के मुख्यालय के निकट हिंगला देवी के मन्दिर के निकट हैं। कुमाऊं के चम्पावत क्षेत्र में पूजी जाने वाली लोक देवी हैं। 

तिलका देवी:

इनका मंदिर टिहरी जनपत के जौनपुर क्षेत्र मे सिलवाड़ पट्टी के बड़ासारी गांव मे हैं। इसके ऊपर नागटिब्बा मे नाग देवता का मन्दिर है। 

तुरगबलि:

यह जौनपुर क्षेत्र का एक लोक देवता हैं। इनका मंदिर दसजुला के डांगू गांव मे हैं। इन्हे हनुमान का रूप माना जाता हैं।

थात्याल:

यह थाली अथवा पैतक भूमि का देवता माना जाता हैं। इन्हे पिथौरागढ़ जनपद के जोहार क्षेत्र मे सायना तथा पांगती गर्खा उपजातियों द्वारा पूजा जाता हैं। 

दक्षिण काली:

गढ़वाल  क्षेत्र मे देवी की पूजा लोक देवता के रूप में दक्षिण काली के नाम से भी की जाती हैं। इस देवी का मन्दिर चमोली जनपत के दशौली क्षेत्र मे दशौल गड़ी और जोलमंगरी के पास में हैं।

धूरा देवी:

इस देवी को दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों मे उन रास्तों पर पूजा जाता है, जहा से कभी भोटिया लोग व्यापार के लिऐ तिब्बत जाते थे। चमोली और पिथौरागढ़ जनपद मे ऐसे रास्तों पर पत्थर के ढेल पर ध्वजा लगाकर इस देवी को पूजा जाता हैं। धूरा का अर्थ दर्रा होता हैं।

नकुलेश्वर:

पिथौरागढ़  क्षेत्र के लोक देवता हैं।  ये इनका मंदिर पिथौरागढ़ के दक्षिण -पश्चिम में थल केदार नामक पहाड़ी पर है। 

नगेला:

यह नाग देवता का ही एक रूप है। जो गढवाल मे पूजे जाने वाले  लोक देवता हैं। इन्हे नागेंद्र भी कहते हैं।

नाग/ नागर्जा:

ये गढ़वाल  क्षेत्र मे सर्वाधिक पूजित लोक देवता हैं। इस क्षेत्र मे इसे कृष्ण का रूप माना जाता है। और नचाया जाते हैं। इनका मुख्य स्थान टिहरी जनपत के सेम मुखेम में हैं। चमोली जनपत के नागनाथ में पुष्कर नाग, रुद्रप्रयाग के पिल्लू मे कर्माजीत नाग, रेड़ी मे रणजीत नाग और कांदी मे कोलाजीत नाग की भी पूजा की जाती हैं।

नरसिंह/ नारसिंग: 

उत्तराखंड के लोक देवता सम्पूर्ण  उत्तराखंड मे पूजे जाते है। इन्हे किसी मंदिर में नही बल्कि घर में आला बनाकर स्थापित किया जाता हैं। कुछ लोग इन्हे पौराणिक नरसिंह से जोड़ते हैं। लेकिन वास्तव मे यह एक सिद्ध पुरुष थे। जिन्होंने गुरु गोरखनाथ से दीक्षा प्राप्त की थी। नरसिंह के नौ रूप माने जाते है। इन्हे पूजा और नचाया जाता हैं। इनकी पौराणिक मूर्ति जोशीमठ में हैं। यह चिमटा और टिमरू का डंडा रखते थे।

निरंकार:

उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र मे शिव की पूजा लोक देवता  निरंकार के रूप में की जाती है। इन्हे नागपंथ का देवता भी माना जाता हैं। यह सभी कष्टों को हरने वाले देवता माने जाते हैं। 

पांडव या पंडो :

पांच भाई पांडवो को उत्तराखंड मे लोक देवता के रूप मे पूजा और नचाया जाता हैं। कई गावों में इनकी पूजा सामूहिक रूप से की जाती हैं। पांडवो के साथ कुन्ती, द्रोपदी, अभिमन्यु, नगाजुन, बर्बरीक और हनुमान भी नाचते हैं।

 

पोखू:

यह रवाई -जौनपुर तथा जौनसार -बाबर का बहुमान्य लोक देवता हैं इनका मन्दिर भी स्थापित हैं। इन्हे तामसिक प्रवृति का देवता माना जाता हैं। पोखू देवता के बारे में विस्तार से जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

फैला:

यह चमोली जनपत में मार्छा जनजाति के लोगो का देवता हैं। इन्हे तिब्बत से आऐ हुऐ शिव का गण माना जाता हैं। इनका मूल स्थान गमसाली गांव मे है

भद्राज  देवता:

ये गढ़वाल  क्षेत्र का कृषिकीय देवता हैं हैं। इन्हे श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का रूप माना जाता हैं। इनका मंदिर मसूरी की  हैं। खेत -पहाड़ी में है। भद्राज मंदिर के बारे में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भासर:

इनका देवस्थल टिहरी जनपत के कडाकोट पट्टी के कफना गांव मे हैं। इनका प्रतीक लोहे का त्रिशूल या कटार होता हैं। 

भूतेर:

इन्हे रुद्रप्रयाग जनपत के तल्ला नागपुर पट्टी मे क्षेत्रपाल के रूप मे पूजा जाता हैं। इन्हे शंकर और पार्वती माता का एक विशिष्ट गण माना जाता हैं। 

भैरव:

वैसे तो भैरव एक पौराणिक देवता हैं। लेकिन उत्तराखंड मे इसकी स्थति एक लोक देवता की हैं। इन्हे भूत – प्रेत और बेतालो का अधिपति माना जाता हैं। 

मल्लिकाजुर्न:

इन्हे भगवान शिव का ही रूप माना जाता है। इनका पूजास्थल पिथौरागढ़ जनपद के डीडीहाट क्षेत्र मे एक ऊंची पहाडी पर है। 

मणिकनाथ-

 यह टिहरी जनपत में भिलंगना के दर्जनों गांवों का क्षेत्र रक्षक देवता हैं। इनका मंदिर फैगुल पट्टी मे एक पहाड़ी पर है।

महासू:

यह जोनसार -बाबर और रवाई जनजाति क्षेत्रो का सर्वोच्च देवता हैं। इनकी उत्पत्ति को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं। महासू चार भाई माने गए हैं। बासक, पिबासक, बोठा और चालदा। महासू का मुख्य देवस्थल देहरादून जनपत के हनोल नामक स्थान में हैं। 

मेलिया:

यह पिथौरागढ़ जनपद के महर पट्टी के अनेक गावों के लोक देवता हैं। इनका प्रभाव क्षेत्र इन्हीं गावों तक सीमित है। 

देवलाडी:

जौनसार -बाबर जनजाति क्षेत्रो मे पूजित यह देवी चार महासुओ की माता मानी जाती हैं। इनका पूजास्थल देहरादून जनपत के मैन्दथ नामक स्थान पर हैं। जो हनोल से कुछ ही दूरी पर हैं।

मैदानू-सैदानू:

इन लोक देवता का स्थान उत्तरकाशी जनपद में हैं। यह बिनसर देवता का सहयोगी माना जाता हैं। ये टिहरी की बड़ियारगड़ पट्टी के कठेत राजपूतो के कुल देवता हैं। 

मैमन्दापीर:

गड़वाल क्षेत्र मे यह नरसिंह की तरह पूजा जाने वाला लोक देवता हैं। माना जाता हैं कि यह नाथ संप्रदाय का एक सिद्ध संत थे, जो अपने समकक्षो नरसिंह आदि की तरह ही लोक कल्याण के कार्यों से लोक देवता बन गए। 

( उत्तराखंड के देवी देवता )

मोस्टमानु –

पिथौरागढ़ जिले में शक्तिशाली देव के रूप में पूजे जाते हैं मोस्टमानु  देवता।

रंकोची देवी –

इन्हे चंडी देवी के रूप में भी पूजा जाता है।  इनका मंदिर टनकपुर चम्पवात मार्ग पर स्थित है।

रक्षा देवी :-

ये कुमाऊं क्षेत्र की देवी हैं। इनका मंदिर ब्यानधूरा  और देवीधुरा के बीच है।

राजराजेश्वरी नंदा देवी –

राजाजेश्वरी नंदा देवी को उत्तराखंड की  कुल देवी के रूप में पूजा जाता है। नंदा देवी की पूजा कुमाऊं और गढ़वाल में सामान रूप से होती है।

लाटू देवता –

उत्तराखंड के चमोली जिले में लाटू देवता का रहस्य्मयी मंदिर है।  इन्हे माँ नंदा के धर्मभाई  के रूप में पूजा जाता है। लाटू देवता के बारे में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें। ..

समासणी –

यह टिहरी के चमेल गावं के आस पास की लोक देवी मानी जाती है। माना  जाता है कि इस स्थान पर च्वन ऋषि ने तपस्या की थी।

हरु सैम –

यह कुमाऊं के लोक देवता हैं। ये दो भाई माने जाते हैं। ये शांत और सुख समृद्धि के देवता माने जाते हैं। हरु सैम देवता की जन्मकथा पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

गंगनाथ देवता –

ये देवता अल्मोड़ा के आस पास के  लोक देवता माने जाते हैं। लोक कथाओं के अनुसार , ये नेपाल के राजकुमार थे। अल्मोड़ा जोशिखोला की कन्या भाना के प्रेम में वशीभूत होकर अल्मोड़ा आ गए।  और वही इनको और भानमती को मार दिया गया।  गंगनाथ देवता की कहानी को विस्तार से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उपरोक्त देवी देवताओ के अलावा भी अनेको ,उत्तराखंड के लोक देवी देवता के रूप में पूजे जाते हैं। जिसमे से प्रमुख ,- हिंगला देवी , सिद्धनाथ ,हुष्कर देवता ,सूर्यदेवी ,वृषसेन ,लाटेश्वर ,हरियाली देवी ,चमु देवता ,बधाण देवता आदि प्रमुख हैं।  हालांकि  उत्तराखंड को देवभूमि कहा गया है।  यहाँ कण कण में देवताओं का वास होता है। हमने अपनी इस पोस्ट में कुछ प्रमुख उत्तराखंड के देवी देवताओं के नाम संकलित किये हैं।