Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

कचड़ू देवता ( kachdu devta ) – देवभूमी उत्तराखंड मे सनातन धर्म के देवताओं के साथ-साथ स्थानीय लोक देवी देवताओं को पूजन की परंम्परा भी पुरानी है। पहाड़ो पर रहने वाले वे प्राचीन निवासी जो कोई कारणवश देवत्त्व को प्राप्त हुए थे उन्होने अपने जीवनकाल में अच्छे कार्य किए जिसकी स्मृति में उन्हे आज भी पूजा जाता है। और कई देवता ऐसे हैं जिन्हें उस समय अनिष्ट के भय से पूजने लगे और धीरे-धीरे वे पूरे समाज के लोक देवता बन गए। उत्तराखंड के प्रत्येक क्षेत्र में अपने अपने क्षेत्रानुसार अनेक लोक देवता पूजे जाते है। उत्तराखंड के इन्ही लोक…

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त्रिनेत्रेश्वर मंदिर और एकादश रूद्र के नाम से प्रसिद्ध मंदिरो का ये समूह उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 48 किलोमीटर दूर लमगड़ा ब्लॉक से 6 किलोमीटर दूर बमनसुयाल मल्ला लखनपुर में स्थित है। यह मंदिरों का समूह थमिया और सुयाल। नदी के संगम पर स्थित है। यहाँ थामिया गधेरे ( छोटी नदी ) के उत्तरी किनारे पर पांच मंदिरों का समूह है। इसके अलावा इसके दक्षिणी छोर के समतल मैदान पर ग्यारह मंदिरों का समूह है। इन सोलह मंदिरों की स्थापत्य कला बेजोड़ है। त्रिनेत्रेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर समूह के पांच मंदिरों में पहला…

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गोलू देवता ,ग्वल्ल ,गोरिया आदि नामों से विख्यात कुमाऊं के लोकदेवता गोलू देवता न्यायकारी देव के रूप में पूजित हैं। गोलू देवता कुमाऊं में ही नहीं गढ़वाल में भी पूजित हैं। पौड़ी गढ़वाल में गोलू देवता को कंडोलिया देवता के रूप में पूजा जाता है। आज इस संकलन में हम गोलू देवता के विभिन्न नाम और उनसे जुडी कहानियों पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। गोलू देवता के विभिन्न नाम – उत्तराखंड के लोक देवता गोलू देवता की उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में विशेष मान्यता है। उन्हें न्यायकारी देवता के रूप में पूजा जाता है। कुमाऊं के जनमानस में…

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उत्तराखंड देवभूमि के रूप में पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहाँ सनातन धर्म की प्रसिद्ध नदियों के उद्गम से लेकर चारों धाम यहीं स्थित हैं। अनेक ऋषि मुनियों की तप स्थल केदारखंड और मानसखंड में प्रत्येक क्षेत्रों में लोकदेवता पूजे जाते हैं। लोक देवताओं की पूजा के पहाड़ों में अलग -अलग विधान ,परम्पराएं प्रचलित है। इन्ही अलग -अलग पूजा परम्पराओं में एक परम्परा है बैसी। इसे बैसी जागर ( Baisi jagar) भी कहते हैं। पहाड़ में बैसी परम्परा – उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लोकदेवताओं के सेवा में देवालय में रहकर नियम धर्म का पालन करके तप साधना करने की…

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नीलकंठ महादेव ऋषिकेश – नीलकंठ महादेव मंदिर को अष्टसिद्धिएवं वाणी की सिद्धि को प्रदान करने वाला पुण्य क्षेत्र कहा गया है। इस प्रकार यह मंदिर उत्तराखंड का एक विशेष तीर्थ है। यह विशेष तीर्थ जनपद पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर ब्लाक के अंतर्गत उत्तुंग पर्वत मणिकूट में स्वयंभू लिङ्ग के रूप में प्रसिद्ध है। यह मंदिर समुंद्रतल से लगभग 4,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मणिकूट, विष्णुकूट, ब्रह्मकूट पर्वतों से निकलने वाली मधुमती (मणिभद्रा) एवं पंकजा (चंद्रभद्रा) नामक पवित्र धाराएँ यहाँ संगम बनाती हैं। ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर 32 किलोमीटर की दूरी पर है। हालाँकि  पैदल का छोटा रास्ता…

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श्रीदेव सुमन पर एक कविता ,लेखक – प्रदीप बिजलवान विलोचन। श्रीदेव सुमन मात्र 29 वर्ष की छोटी सी उम्र में अपने राज्य, अपने पहाड़ी समाज अपने टिहरी गढ़वाल और अपने उत्तराखंड के लिए ऐसा कार्य कर गए , जिससे उनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में सदा सदा के लिए अमर हो गया। श्री देव सुमन जी ने राजशाही के अत्याचारों के खिलाफ अंदोलन करके शहीद हो गए थे। 25 जुलाई को श्रीदेव सुमन जी की पुण्यतिथि है। इसे उनके शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। श्री देव सुमन की कहानी को काव्यात्मक लहजे में टिहरी गढ़वाल के…

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फ्यूंलानारायण मंदिर – उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है यहाँ साक्षात् देवो का वास है। उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र अपने आप में कई अद्भुत रहस्यों को समेटे हुए है। और अपनी अनोखी मान्यताओं और समृद्ध संस्कृति के लिए हिमालय का यह भूभाग ( केदारखंड और मानसखंड ) हमेशा चर्चाओं में रहा है। उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक के उर्गम घाटी में भगवान् नारायण का ऐसा ही एक रहस्यमई मंदिर है जहाँ पुरुष पुजारी के साथ महिला पुजारी भी नियुक्त है और प्रतिदिन भगवान् का शृंगार केवल महिला पुजारी करती है। समुद्रतल से लगभग 10000 फ़ीट की ऊंचाई पर…

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गाती धोती :- गाती धोती गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के परिधान का एक परम उपयोगी अंगवस्त्र होता है, जो मोटी ऊनी चादर के रूप में होता था। इसके आधे भाग को कमर के नीचे पैरों तक एक विशेष ढंग से लपेट कर तथा शेष भाग को ऊपर कंधे तक ले जाकर एक विशेष तरीके की गांठ के रूप में बांधा जाता था। उसे कन्धे पर रोके रखने के लिए लोहे या लकड़ी के सुए या आलपिन का भी उपयोग किया जाता था। इस पर शरीर को चादर से पूरा ढक लेने के बाद कमर पर ऊपर के कपड़े या…

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गोरिल देवता या गोलू देवता को उत्तराखंड के प्रमुख न्यायकारी देवता माना जाता है। उनके बारे में कहा जाता है कि जो उनकी शरण में चला जाता है ,उसकी रक्षा के लिए वे किसी हद तक जा सकते हैं। गोरिल देवता की जागर में गोलू देवता और तम्बोला घुघूती की कहानी गायी जाती है। आज इस पोस्ट में गोरिल देवता और तम्बोला घुघूती की कहानी का हिंदी में संक्षिप्त वर्णन कर रहें हैं। गोरिल देवता और तम्बोला घुघूती की जागर कहानी – कहते हैं एक बार एक तम्बोला नामक घुघुती गोलू देवता के राज्य गढ़ी चम्पावत में आती है। और…

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पंथ्या काला उर्फ़ पंथ्या दादा को राजशाही और निरंकुशता के विरोध में बलिदान देने वाले पहाड़ के पहले बालक के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने पौड़ी के सुमाड़ी गांव में राजा मेदनीशाह के निरंकुशता भरे निर्णय के विरोध में आत्मदाह कर लिया था। इस पोस्ट में हमारे प्रमुख सहयोगी प्रदीप बिल्जवान बिलोचन जी ने पंथ्या दादा की कहानी को काव्यात्मक रूप में लिखा है। उम्मीद है यह कहानी आपको पसंद आएगी। पंथ्या दादा की कहानी काव्यात्मक रूप में – वीर और स्वाभिमानी गाथा पंथ्या दादा की पौड़ी के सुमाड़ी गांव के वे स्वाभिमानी महापुरुष, पंथ्या दादा,अल्पावस्था में ही…

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