Author: Bikram Singh Bhandari

बिक्रम सिंह भंडारी उत्तराखंड की लोक संस्कृति, पर्व, देव परंपराओं और इतिहास पर लिखने वाले स्वतंत्र लेखक हैं। वे वर्षों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को प्रामाणिक स्रोतों, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से डिजिटल रूप में दस्तावेज़ करने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति, पर्व और लोक परंपराओं पर 700 से अधिक लेख लिखे हैं।

उत्तराखंड की भूमि अपने विशेष लोकपर्वों के लिए प्रसिद्ध है। इन्ही लोक पर्वों में से एक पर्व है सातो आठो लोक पर्व। भगवान् के साथ मानवीय रिश्ते बनाकर, उनकी पूजा अर्चना और उनके साथ आनंद मानाने का त्यौहार है सातू आठू त्यौहार। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ व कुमाऊँ के सीमांत क्षेत्र में मनाया जाने वाला यह त्यौहार प्रतिवर्ष भाद्रपद की पंचमी से शुरू होकर अष्टमी तक चलता है। सातो आठो 2025 में  28 अगस्त 2025 बिरुड़ पंचमी ( birud panchami 2025) से शुरू होगा। 30 अगस्त 2025 को सातो और 31 अगस्त को आठो मनाया जाएगा। सातू आठू पर्व में महादेव…

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गढ़वाली लोक कथा – उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के निवासियों का प्रकृति के साथ विशेष स्नेह रहा है। यही स्नेह यहाँ के निवासियों की लोक कथाओं में भी झलकता है पहाड़ी क्षेत्र की लोक कथाओं के पात्र अमूनन विभिन्न स्वर निकालने वाली चिड़िया या पेड़ पौधे या जगली जानवर होते हैं। प्रस्तुत गढ़वाली लोक कथा की पात्र भी एक चिड़िया है। जिसे हिंदी में चातक पक्षी कहते हैं। और जैसा की हमको पता है चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र में आसमान से पड़ी पानी की बूंद को पीता है। और उस बूंद को प्राप्त करने वो जंगलो में निरंतर एक विशेष…

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कुमाऊनी जागर ( Kumauni jagar ) : जागर उत्तराखंड की समृद्ध संस्कृति की एक अद्वितीय पहचान है। उत्तराखंड में जागर विधा उत्तराखंड के दोनों मंडलों कुमाऊं और गढ़वाल में अलग तरीके से गायी और संपादित की जाती है। प्रस्तुत आलेख में जागर का अर्थ और कुमाऊनी जागर की संपादन पर प्रकाश डालने की कोशिश की गई है। इस लेख को सम्पादित करने में स्थानीय जानकारियों के साथ साथ उत्तराखंड ज्ञानकोष पुस्तक का सहयोग लिया गया है। जागर का अर्थ – जागर का अर्थ है घर परिवार में सुख शांति और मंगल हेतु दैवी शक्ति को जागृत करना। उत्तराखंड में देवी-देवताओं…

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कचड़ू देवता ( kachdu devta ) – देवभूमी उत्तराखंड मे सनातन धर्म के देवताओं के साथ-साथ स्थानीय लोक देवी देवताओं को पूजन की परंम्परा भी पुरानी है। पहाड़ो पर रहने वाले वे प्राचीन निवासी जो कोई कारणवश देवत्त्व को प्राप्त हुए थे उन्होने अपने जीवनकाल में अच्छे कार्य किए जिसकी स्मृति में उन्हे आज भी पूजा जाता है। और कई देवता ऐसे हैं जिन्हें उस समय अनिष्ट के भय से पूजने लगे और धीरे-धीरे वे पूरे समाज के लोक देवता बन गए। उत्तराखंड के प्रत्येक क्षेत्र में अपने अपने क्षेत्रानुसार अनेक लोक देवता पूजे जाते है। उत्तराखंड के इन्ही लोक…

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त्रिनेत्रेश्वर मंदिर और एकादश रूद्र के नाम से प्रसिद्ध मंदिरो का ये समूह उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिला मुख्यालय से लगभग 48 किलोमीटर दूर लमगड़ा ब्लॉक से 6 किलोमीटर दूर बमनसुयाल मल्ला लखनपुर में स्थित है। यह मंदिरों का समूह थमिया और सुयाल। नदी के संगम पर स्थित है। यहाँ थामिया गधेरे ( छोटी नदी ) के उत्तरी किनारे पर पांच मंदिरों का समूह है। इसके अलावा इसके दक्षिणी छोर के समतल मैदान पर ग्यारह मंदिरों का समूह है। इन सोलह मंदिरों की स्थापत्य कला बेजोड़ है। त्रिनेत्रेश्वर मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर समूह के पांच मंदिरों में पहला…

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गोलू देवता ,ग्वल्ल ,गोरिया आदि नामों से विख्यात कुमाऊं के लोकदेवता गोलू देवता न्यायकारी देव के रूप में पूजित हैं। गोलू देवता कुमाऊं में ही नहीं गढ़वाल में भी पूजित हैं। पौड़ी गढ़वाल में गोलू देवता को कंडोलिया देवता के रूप में पूजा जाता है। आज इस संकलन में हम गोलू देवता के विभिन्न नाम और उनसे जुडी कहानियों पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। गोलू देवता के विभिन्न नाम – उत्तराखंड के लोक देवता गोलू देवता की उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में विशेष मान्यता है। उन्हें न्यायकारी देवता के रूप में पूजा जाता है। कुमाऊं के जनमानस में…

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उत्तराखंड देवभूमि के रूप में पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहाँ सनातन धर्म की प्रसिद्ध नदियों के उद्गम से लेकर चारों धाम यहीं स्थित हैं। अनेक ऋषि मुनियों की तप स्थल केदारखंड और मानसखंड में प्रत्येक क्षेत्रों में लोकदेवता पूजे जाते हैं। लोक देवताओं की पूजा के पहाड़ों में अलग -अलग विधान ,परम्पराएं प्रचलित है। इन्ही अलग -अलग पूजा परम्पराओं में एक परम्परा है बैसी। इसे बैसी जागर ( Baisi jagar) भी कहते हैं। पहाड़ में बैसी परम्परा – उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में लोकदेवताओं के सेवा में देवालय में रहकर नियम धर्म का पालन करके तप साधना करने की…

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नीलकंठ महादेव ऋषिकेश – नीलकंठ महादेव मंदिर को अष्टसिद्धिएवं वाणी की सिद्धि को प्रदान करने वाला पुण्य क्षेत्र कहा गया है। इस प्रकार यह मंदिर उत्तराखंड का एक विशेष तीर्थ है। यह विशेष तीर्थ जनपद पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर ब्लाक के अंतर्गत उत्तुंग पर्वत मणिकूट में स्वयंभू लिङ्ग के रूप में प्रसिद्ध है। यह मंदिर समुंद्रतल से लगभग 4,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मणिकूट, विष्णुकूट, ब्रह्मकूट पर्वतों से निकलने वाली मधुमती (मणिभद्रा) एवं पंकजा (चंद्रभद्रा) नामक पवित्र धाराएँ यहाँ संगम बनाती हैं। ऋषिकेश से नीलकंठ महादेव मंदिर 32 किलोमीटर की दूरी पर है। हालाँकि  पैदल का छोटा रास्ता…

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श्रीदेव सुमन पर एक कविता ,लेखक – प्रदीप बिजलवान विलोचन। श्रीदेव सुमन मात्र 29 वर्ष की छोटी सी उम्र में अपने राज्य, अपने पहाड़ी समाज अपने टिहरी गढ़वाल और अपने उत्तराखंड के लिए ऐसा कार्य कर गए , जिससे उनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में सदा सदा के लिए अमर हो गया। श्री देव सुमन जी ने राजशाही के अत्याचारों के खिलाफ अंदोलन करके शहीद हो गए थे। 25 जुलाई को श्रीदेव सुमन जी की पुण्यतिथि है। इसे उनके शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है। श्री देव सुमन की कहानी को काव्यात्मक लहजे में टिहरी गढ़वाल के…

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फ्यूंलानारायण मंदिर – उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है यहाँ साक्षात् देवो का वास है। उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र अपने आप में कई अद्भुत रहस्यों को समेटे हुए है। और अपनी अनोखी मान्यताओं और समृद्ध संस्कृति के लिए हिमालय का यह भूभाग ( केदारखंड और मानसखंड ) हमेशा चर्चाओं में रहा है। उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ ब्लॉक के उर्गम घाटी में भगवान् नारायण का ऐसा ही एक रहस्यमई मंदिर है जहाँ पुरुष पुजारी के साथ महिला पुजारी भी नियुक्त है और प्रतिदिन भगवान् का शृंगार केवल महिला पुजारी करती है। समुद्रतल से लगभग 10000 फ़ीट की ऊंचाई पर…

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