उत्तराखंड में हर पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन, प्रकृति और लोकसंस्कृति से गहराई से जुड़ा उत्सव होता है। यहां मनाए जाने वाले पर्व-त्योहार न केवल ऋतु परिवर्तन के संकेतक हैं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों और सामाजिक एकता के प्रतीक भी हैं। उत्तराखंड में मकर संक्रांति 2026 भी ऐसा ही एक महत्त्वपूर्ण पर्व है, जिसे राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ बड़े उल्लास से मनाया जाता है। मकर संक्रांति का खगोलीय और धार्मिक महत्व – पौष मास के समाप्त होने और माघ मास की संक्रांति के दिन भगवान सूर्य धनु…
Author: Bikram Singh Bhandari
आजकल उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में एक अलग ही चर्चा जोरो पर है। चर्चा यह है कि पहाड़ में लड़को को शादी के लिए लड़किया नहीं मिल रही है। और लड़को की बिना शादी के उम्र जा रही है। इसका कारण है पहाड़ की लड़कियों और उनके माता -पिता की अनोखी शर्तें। प्राप्त जानकारी के अनुसार आजकल पहाड़ के माता पिता उसी लड़के से अपनी बेटी का विवाह करने को राजी हैं जिसकी सरकारी नौकरी हो या फिर हल्द्वानी /देहरादून जैसे मैदानी एरिया में प्लाट या मकान हो। अचानक समाज में फैली इस कुप्रथा के खिलाप कई लेखक ,समाचार पत्र…
इंद्रमणि बडोनी का जीवन परिचय पर आधारित विस्तृत जानकारी इस वीडियो में भी देख सकते हैं -(Indramani Badoni Biography in Hindi) https://youtu.be/KY5_semJj24?si=tQhfy4X2mA6kCh6j उत्तराखंड सदैव महापुरुषों, वीरों और समाज-सुधारकों की जननी रहा है। इस देवभूमि ने न केवल भारत की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक चेतना को दिशा दी, बल्कि अपनी लोक-संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए भी अनगिनत संघर्ष किए। ऐसे ही संघर्षशील महापुरुषों में इंद्रमणि बडोनी का नाम उत्तराखंड के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। उन्हें प्रेमपूर्वक “उत्तराखंड का गांधी” कहा जाता है। वे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के पुरोधा, लोक-संस्कृति के संवाहक और जनआंदोलनों के नैतिक…
कुमाऊनी होली गीत (Kumaoni Holi Geet lyrics) | कुमाऊनी होली लिरिक्स – देश की प्रसिद्ध होलियों में से एक है कुमाऊनी होली (Kumaoni Holi)। डेढ़ से दो महीने तक चलने वाला यह त्यौहार उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। पौष माह से बैठकी होली (Baithki Holi) और रंग एकादशी से खड़ी होली (Khadi Holi) की रौनक शुरू हो जाती है। कुमाऊनी खड़ी होली (Kumaoni Khadi Holi) ब्रज और कुमाऊनी मिश्रित भाषा में गाई जाती है, जबकि बैठकी होली (Baithki Holi) में उर्दू का प्रभाव भी देखने को मिलता है। हमने पहले ही कुमाऊनी होली…
लोक संस्कृति दिवस – संस्कृति का अर्थ है सम्यक रूप से किया जाने वाला आचार ,व्यवहार ! सामान्य व्यवहार या बोलचाल में संस्कृति का अर्थ होता है सुन्दर ,रुचिकर और कल्याणकारी परिस्कृत व्यवहार। श्री देव सिंह पोखरिया अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लोक संस्कृति के विविध आयाम में संस्कृति की सरल शब्दों में परिभाषा देते हुए लिखते हैं ,” परम्परा से प्राप्त किसी मानव समूह की निरंतर उन्नत मानसिक अवस्था ,उत्कृष्ट वैचारिक प्रक्रिया ,व्याहारिक शिष्टता ,आचरण पवित्रता , सौंदर्याभिरुचि आदि की परिस्कृत , कलात्मक तथा सामुहिक अभिव्यक्ति ही संस्कृति है। संस्कृति पुरे समाज का प्रतिबिम्ब होती है। कोई जन्मजात सुसंस्कृत नहीं होता…
भगवद् गीता के दशम स्कंध के नवें अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं— “पत्रं पुष्पं फलं तोय यो मे भक्त्या प्रयच्छति, तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः।” अर्थात, यदि कोई भक्त सच्ची श्रद्धा और शुद्ध चित्त से मुझे पत्ता, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, तो मैं उसे स्वीकार ही नहीं करता—उसका भोग भी लगाता हूं। यही भाव शिव महापुराण में भी प्रतिध्वनित होता है, जहां भगवान शिव को धतूरा, हरसिंगार, नागकेसर के श्वेत पुष्प, सूखे कमल गट्टे, कनेर, आक, कुश आदि अतिप्रिय बताए गए हैं। संदेश साफ है—ईश्वर धन, ऐश्वर्य या छप्पन भोग के नहीं, भाव के भूखे हैं। विस्तार इस…
उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित सिद्धबली मंदिर, कोटद्वार से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर खोह नदी के बाएँ तट पर एक ऊँचे टीले पर स्थित है। तीजों और रंगों की छटा से आच्छादित यह स्थान केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर एक प्राचीन तपोभूमि है। यह मंदिर श्री सिद्धबाबा के तपोस्थान के रूप में प्रसिद्ध है, जहाँ भक्तों का विश्वास है कि हनुमानजी सदैव उपस्थित रहते हैं और अपने भक्तों का कल्याण करते हैं। खोह नदी का प्राचीन महत्व — कौमुदती नदी का पुराणों में वर्णन – स्थानीय रूप…
Kalika mata mandir uttarakhand : कालिंका मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के बिरोनखाल ब्लॉक में स्थित कालिंका मंदिर का पहाड़ी मंदिर गढ़वाल–कुमाऊँ सीमांत संस्कृति, लोकआस्था और इतिहास का एक अनोखा संगम है। समुद्र तल से लगभग 2100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर अल्मोड़ा जिले की सीमा के बिल्कुल निकट आता है और देवी काली को समर्पित है। कालिंका मंदिर सदियों से अस्तित्व में रहा है, हालांकि पिछले दशक में इसकी संरचना को दो बार नए स्वरूप में पुनर्निर्मित किया गया। कई बार इसे बूंखाल कालिंका से भ्रमित किया जाता है, जो थलीसैंण क्षेत्र के मलुंड गाँव के…
पाला बिसाऊ परंपरा: उत्तराखंड के ऐतिहासिक पन्नों, विशेषकर टिहरी रियासत के कालखंड में कई ऐसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं का जिक्र मिलता है, जो आज के समय में अकल्पनीय लगती हैं। इनमें से एक सबसे चर्चित और दमनकारी व्यवस्था थी— ‘पाला बिसाऊ परंपरा’ (Pala Bisau Tradition)। यह केवल एक कर (Tax) नहीं था, बल्कि शोषण का एक ऐसा माध्यम था, जिससे पहाड़ की भोली-भाली जनता वर्षों तक त्रस्त रही। आइए जानते हैं कि आखिर पाला बिसाऊ परंपरा क्या थी और इसने आम जनजीवन को कैसे प्रभावित किया। पाला बिसाऊ परंपरा क्या थी? (What was Pala Bisau Tradition?) – ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार,…
बूढ़ी दिवाली 2025 – हिमालयी क्षेत्रों में दीपावली एक से अधिक बार मनाने की परम्परा है। उत्तराखंड से लेकर हिमाचल प्रदेश तक पहाड़ी इलाकों में बूढ़ी दिवाली मनाने की परम्परा है। यह बूढ़ी दिवाली हिमालयी क्षेत्रों में अपनी अपनी सुविधानुसार मनाई जाती है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र और गढ़वाल के कुछ हिस्सों में में हरिबोधनी एकादशी के दिन बूढ़ी दिवाली इगास और बूढ़ी दिवाली के रूप में मनाई जाती है। इसके बाद मुख्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद जौनपुर उत्तरकाशी की गंगाघाटी में मंगसीर बग्वाल के रूप में बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। वहीं रवाई घाटी में बूढी दीवाली देवलांग…