अगस्त्य मुनि (Agastmuni) : उत्तराखंड के केदारखण्ड का यह पवित्र तीर्थस्थल गढ़वाल मण्डल के रुद्रप्रयाग जनपद में इसकी तहसील इकाई मुख्यालय से 18 कि.मी. आगे मन्दाकिनी के तट पर प्रकृति के मनोरम अंक में स्थित है।उत्तराखंड के प्राचीन धार्मिक भूगोल से गहराई से जुड़ा हुआ है। केदारखण्ड (197:8,10 में कहा गया है–
मन्दाकिन्या पूर्वतीरे कुम्भजन्माश्रयः प्रियः।
अगस्त्येश्वरो तत्र महादेवस्त्रणासित भवमोचकः॥
इस श्लोक के अनुसार मन्दाकिनी नदी के पूर्वी तट पर स्थित यह स्थल कुम्भजन्मा अगस्त्य मुनि (Agastmuni) का प्रिय आश्रय है, जहाँ अगस्त्येश्वर महादेव भवबंधन से मुक्ति प्रदान करने वाले माने जाते हैं।
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तपस्थली का भौगोलिक व आध्यात्मिक स्वरूप –
सिन्धु तट से 3000 फिट की ऊँचाई पर स्थित तल्लवाड़ा से 11 कि.मी. आगे यह समुद्र का पान करने वाले अगस्त्य ऋषि (Agastya Rishi) की तपस्थली है। अगस्त्य मुनि का इतिहास (Agastmuni history) बताता है कि यह स्थान कठोर तप और साधना का प्रमुख केन्द्र रहा है।उनके इस तपस्थल में उन्हें समर्पित एक छत्र रेखा शिखर शैली का बहुत भव्य गर्भगृह देवालय है, जिसमें महर्षि अगस्त्य मुनि की एक अष्टधातु की द्विभुजी मूर्ति तथा उनकी पत्नी लोपामुद्रा की मूर्ति प्रतिष्ठापित है।
प्रार्थनास्थल के पास ही मुख्य प्रांगण में अगस्त्य मुनि की प्रतिमा विद्यमान है। केन्द्र में एक बड़ी तथा उसी के पार्श्व दो छोटी गद्दियां बनी हुई हैं, जिनमें से बड़ी गद्दी को राम का सिंहासन कहा जाता है। लोगों की मान्यता है कि वनवास काल में भगवान राम अगस्त्य मुनि से मिलने यहाँ आये थे।
अगस्त्य मुनि का इतिहास : मंदिर परिसर और देवी-देवता –
परिसर के बाहर द्वार पर एक नृसिंह की प्रतिमा स्थापित है। मुख्य मंदिर में नारद, गणेश आदि देवी-देवताओं के साथ ही पाषाण पट्टिका पर नवग्रहों को भी उत्कीर्ण किया गया है। महाभारत काल से भी जुड़ा हुआ दिखाई देता है। महाभारत के आदिपर्व में उल्लिखित श्रृंगी ऋषि को समर्पित एक लघु मंदिर भी यहाँ स्थित है। इसके चोकर अत्रिगौणी जलकुण्ड से संलग्न एक शिवालय भी है। इसके बाहर एक स्तम्भ पर ‘धर्मचक्र’ का प्रतीक भी अवस्थित है।
विषुवत संक्रांति के रोज यहाँ पर एक पर्वोत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में चमोली एवं टिहरी की जनता की भागीदारी रहती है। यह पर्व अगस्त्य मुनि की लोक आस्था को दर्शाता है।
लोकदेवता स्वरूप और सामाजिक मान्यता ( Agastmuni Ka Itihaas ) –
एक पौराणिक देवशक्ति के अतिरिक्त अगस्त्य मुनि को लोकदेवता की मान्यता भी प्राप्त है। यह यहाँ के कुंजवाल नामक ब्राह्मणों का इष्टदेव है और वही इसके पुजारी भी हैं। इसके अतिरिक्त टिहरी गढ़वाल की भरदार पट्टी के स्वारी/स्यारी नामक गांव में भी अगस्त्य मुनि का देवस्थल है। यहाँ पर इसके पुजारी जोशी व कुंजवाल जाति के ब्राह्मण होते हैं।
अगस्त्य मुनि का इतिहास : 12 वर्षीय यज्ञ परंपरा
स्यारी में प्रत्येक 12 वर्षों बाद एक वृहत यज्ञ का आयोजन होता है। अगस्त्य मुनि का इतिहास बताता है कि इस यज्ञ से जुड़ी गहरी लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं। 12 वर्ष के बाद होने वाले यज्ञ के बारे में माना जाता है कि इसके प्रांगण में बने यज्ञकुण्ड के आवरण (ढक्कन) को खोलने वाले व्यक्ति की 6 महीने में मृत्यु हो जाती है। इसलिए इसके लिए ऐसे व्यक्ति को चुना जाता है जो स्वेच्छा से इसके लिए तत्पर हो। कुंजवाल ब्राह्मणों के अतिरिक्त रावत, बर्त्वाल, नेगी आदि क्षत्रिय जातियां भी अगस्त्य मुनि को अपना इष्टदेव मानती हैं।
धन-समृद्धि, वर्षा और देवयात्रा –
अगस्त्य मुनि को धन-समृद्धि के देवता के अतिरिक्त वर्षा एवं प्राकृतिक शक्तियों के नियंत्रक देवता के रूप में भी पूजा जाता है। बैशाखी के अवसर पर यहाँ एक मेले का आयोजन होता है। 12 वर्ष के बाद इनके डिवरा (देवयात्रा) का आयोजन किया जाता है, जिसमें अगस्त्य मुनि की उत्सव मूर्ति को विभिन्न ग्रामों एवं तीर्थस्थलों में ले जाया जाता है। मंदिर के प्रांगण में भगवान शिव तथा इनके परम पराक्रमी सैनिक भोगादित्य का मंदिर भी है, जिसमें भोगादित्य की ढाल तथा शृंगी की कवचयुक्त अष्टधातु की मूर्ति है। इसके अतिरिक्त यहाँ क्षेत्रपाल देवता का भी देवस्थल है।
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